बादाम की खेती कैसे करें

बादाम की खेती कैसे करें, जानिए किस्में, देखभाल और पैदावार

बादाम की खेती या बागवानी मुख्य रूप से जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में की जाती है| लेकिन इसकी बढती मांग और समय के साथ साथ बादाम की खेती मैदानी क्षत्रों में भी सफलतापुर्वक की जाने लगी है| बादाम मध्यम ऊँचाई का सीधा बढ़ने वाला पेड़ है| एक वर्ष की आयु की शाखाऐं चिकनी, चमकदार एवं पीले हरे से लाल भूरे रंग की होती है| मध्य एशियाई प्रजातियों मे पत्ती वृन्त सहित होती है और पत्ती का आकार लम्बा या अण्डाकार व शीर्ष नुकीला होता है|

बादाम की खेती में फुल एकल अथवा छाते की तरह गुच्छों में पहले या कभी-कभार पत्ती के साथ वृन्त पर लगता है| फल के बाहरी सतह पर रोये होते है और यह चमकीला होता है| इसकी गुठली चपटी, लम्बी, कम मोटी और चिकनी होती है| इसका जड़ तंत्र 3 मीटर गहराई तक पाया जाता है| भारत में बादाम की गिरी को बहुत पसंद किया जाता है| इसकी सभी गिरियों में ज्यादा पोषक और औषधीय गुणयुक्त होती है| इसकी गिरी से महत्तवपूर्ण तेल बादाम रोगन प्राप्त होता है|

जब गिरी पक जाती है, तब तुड़ाई की जाती है| बादाम गिरी ऊर्जा का बहुत अच्छा स्रोत है, 100 ग्राम ताजी गिरी में 598 कैलोरी ऊर्जा, 19 ग्राम प्रोटीन, 59 ग्राम वसा तथा 21 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है| इस लेख में आप जानेगे की बादाम की वैज्ञानिक बागवानी कैसे करें, और इसके लिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार किस प्रकार है| इन जानकारियों के साथ बागान बंधु अपनी बादाम की फसल से गुणवत्ता युक्त और अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते है|

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उपयुक्त जलवायु

बादाम की खेती के लिए सूखी गर्म उष्णकटिबंधीय जलवायु के अनुकूल होती है| फल पकते समय गर्म शुष्क मौसम होना चाहिए, ठण्डा और धुन्ध वाली ग्रीष्म ऋतु बादाम के लिए उपयुक्त नहीं है| इसके लिए न्यूनतम 7 और अधिकतम 24 डिग्री सेल्सियस तक तापमान उत्तम होता है| पुष्प खिलते समय -2 डिग्री सेल्सियस तक तापमान को सहन कर सकते है, लेकिन ज्यादा लम्बे समय तक कम तापमान नुकसान पहुँचाता है| औसत वार्षिक वर्षा 80 से110 सैंटीमीटर सफल उत्पादन के लिए पूरे वर्ष वर्षा का सही से वितरण आवश्यक होता है| बादाम को 750 से 3,210 मीटर समुद्र तल से उंचाई पर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है|

भूमि का चयन 

बादाम की बागवानी के लिए समतल, बलुई दोमट से चिकनी गहरी उपजाऊ मिट्टी, जिसमें जल निकास की सुविधा हो, उपयुक्त रहती है| बादाम की खेत के लिए भरपूर कार्बनिक पदार्थ, उचित जल निकास तथा मिटटी में वायु का मिश्रण वाली सरंचना उपयुक्त होती है| भारी तथा कम जल निकास वाली खेत में विकास कम होता है|

उन्नत किस्में

बादाम की खेती हेतु कुछ व्यावसायिक किस्में इस प्रकार है, जैसे-

शुष्क शीतोष्ण क्षेत्र की किस्में- नी- प्लस – अल्ट्रा, टैक्सास (मिशन), थिनशैल्ड आदि|

ऊँचे तथा मध्य पर्वतीय क्षेत्र की किस्में- मर्सिड, नॉन पेरिल, आई एक्स एल, नौ णी स्लैक्शन, निकितस्काई, व्हाईट ब्रान्डिस, क्रिस्टोमोरटो, वेस्ता और जेन्को आदि|

निचले पर्वतीय तथा घाटी क्षेत्र की किस्में- ड्रेक, काठा, नी- प्लस अल्ट्रा, पीयरलैस आदि|

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कुछ किस्मों का वर्णन इस प्रकार है, जैसे-

निकितस्काई- बादाम की यह किस्म नियमित रूप से फल देने वाला पौधा, मध्यम, ओजस्वी फलावदार, देर से फूल आना, मध्यम उपज देने वाली किस्म, गुठली नरम, कुछ-कुछ छिद्र वाली, मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में शीघ्र जून के चौथे सप्ताह में पककर तैयार, मध्यम से बड़े आकार वाली, गिरी छोटी, भूरे रंग की, कुछ-कुछ झुर्रादार, अच्छी गुणवत्ता वाली, मीठी किस्म, गुठली से 45 से 50 प्रतिशत गिरी प्राप्त होती है|

व्हाईट ब्रान्डिस- पौधा मध्यम वृद्धि वाला, ऊपर की ओर फैलावदार, नियमित फसल देने वाला, देरी से फूलने वाला, तुलनात्मक अधिक फलदायक, गुठली कागजी छोटे-मध्यम आकार की, कुछ-कुछ छिद्र वाली, मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में जून के तीसरे सप्ताह में पककर तैयार, गिरी छोटी गहरे भूरे रंग की, कुछ-कुछ झुर्रादार, मीठी तथा उत्तम गुणवत्ता वाली, अधिक उत्पादन तथा गिरी के रूप में विपणन योग्य किस्म, गुठली से 60 से 65 प्रतिशत गिरी होती है|

नौणी स्लैक्शन- पौधा मध्यम ओजस्वी, ऊपर की ओर बढ़ने वाला, नियमित फलन, देरी से फूल आना, तुलनात्मक अधिक पैदावार, गुठली  छोटे मध्यम आकार की, छिलका कागजी, कुछ-कुछ छिद्र वाला, मध्य पर्वतीय क्षेत्रों मे बहुत जल्दी जून के तीसरे सप्ताह में पककर तैयार, गिरी भूरे रंग की, छोटी, कुछ-कुछ झुर्रादार, मीठी और अच्छी गुणवत्ता वाली, छिलका आसानी से टूटने के कारण गिरी के रूप में बेचने योग्य किस्म, गुठली से 55 से 60 प्रतिशम गिरी प्राप्त होती है|

थिन शैल्ड- पौधा मध्यम वृद्धि वाला, ऊपर की ओर बढ़ने वाला, घना, जल्दी व नियमित पैदावार देने वाला, गुठली बड़ी, हल्के भूरे रंग की, आकर्षक, तलवार के आकार वाली, गुठली से छिलका आसानी से अलग होले वाला, कागजी, गिरी भूरे रंग की, भरी भरी, मीठी तथा स्वादिष्ट होती है|

नी-प्लस – अल्ट्रा- पौधा अधिक वृद्धि वाला, फलावदार व मध्यम उपज वाला, गुठली बड़ी, आयताकार, कागजी, गिरी की मात्रा 29 प्रतिशत, गिरी हल्के से गहरे भूरे रंग की होती है|

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नॉन पेरिल- यह एक मुख्य किस्म, जो काफी बड़े क्षेत्र में उगाई जाती है, इसके पौधे ओजपूर्ण, मध्यम आकार में फैलने वाले व स्वअनिषेचित होते है, फल अण्डाकार, पील-भूरे रंग का, छिलका मध्यम-कठोर और छिलका व गिरी का अनुपात 1:0.67 होता है|

फेसिओनेलो- पेड़ मध्यम ओजपूर्ण, ऊँचाई में बढ़ने वाला होता है, जो मध्यम फल उत्पादन देता है|

पियरलेस- यह किस्म भी नॉन पेरिल प्रजाति के लिए एक अच्छी परागकर्ता है, इसका छिलका काफी मोटा होता है, यह प्रजाति पाले के प्रति बहुत संवेदनशील है|

क्रिस्टोमोरटो- इस बादाम किस्म का पौधा ओजस्वी, ऊँचाई में बढ़ने वाला और स्वअनिषेचित, फल अण्डाकार तथा सूखे फल का औसत वजन 4 से 5 ग्राम, छिलके का रंग पीला-भूरा, मध्यम कठोर तथा छिलका व गिरी का अनुपात 1:1.8 होता है, गिरी का आकार अण्डाकार, प्रति फल में 2 गिरी, जो अच्छी सुगन्ध वाली होती है|

वेस्ता- पौधा फैलावदार, ओजस्वी, ड्रेक, मारकोना तथा नॉन पेरिल किस्में, इस किस्म की परागकर्ता, कीड़े तथा व्याधियों के प्रति सहिष्णु होती है|

मारकोना- पौधा ओजस्वी तथा शाखायें झुकी, उत्पादन मध्यम, इसके फूल एक वर्ष पुरानी शाखा अथवा स्पर पर आते है|

जेन्को- पछेती किस्म, पेड़ ओजस्वी एवं स्वअनिषेचित, फिलिप्पो सिओ, टेक्सा व ट्यूनो परागकर्ता किस्में, फल गोल-अण्डाकार, शुष्क वजन 3.4 ग्राम, गिरी अण्डाकार, भूरे छिलके वाली, झुर्रीदार और बहुत अच्छी खुशबू, इसकी उत्पादन क्षमता ज्यादा और लगभग सभी बीमारियों के प्रति अवरोधी है|

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पौधे तैयार करना

प्रवर्धन- बादाम के पौधे मुख्यतः बीज और ग्राफ्टिंग विधि से तैयार किये जाते है| इसकी ग्राफ्टिंग के लिए बादाम, आड़ू और आलूबुखारा के बीजू पौधे मूलवृन्त के रूप में प्रयोग किये जाते है| कुछ चुने हुए मूलवृन्त इस प्रकार है, जैसे-

जीएफ 677- आडू व बादाम का क्राँस है, जल्दी वृद्धि और शीघ्र फलन की क्षमता, अपेक्षाकृत गीली मृदा के प्रति सहिष्णु है|

जीएफ 557- स्थानीय बादाम व सलील आडू का क्राँस, संकर मूलवृन्त मे उगने वाले वृक्ष पैतृक किस्म की तुलना मे ज्यादा औजस्वी होते है|

मारीयाना आलुबुखारा- मैरीयाना 2624, मूलवृन्त बाँस जड़ फफूँदी (आर्मीलेरिया मीलिया) और फाइटोफथोरा प्रजाति के प्रति सहिष्णु है|

यूरोपियन आलुबुखारा- कुछ किस्मों जैसे- ब्रामटटॉंन, सेण्ट जूलियन और दमास की अपेक्षाकृत बादाम के साथ अच्छा सामन्जस्य है|

बहिमी (प्रुनस किस्म)- किनौर व सरहन (हिमाचल प्रदेश) क्षेत्रों मे इकट्ठी की गयी, बादाम एवं आडू का प्राकृतिक संकर माना गया, यह निमेटोड के प्रति अवरोधी है|

काबुल ग्रीन गेज- कम शीतन वाला आलूबुखारा, मूलवृन्त के रूप में उपयोग लाया जाता है, आडू बीजू पौधे के अपेक्षाकृत कम लेकिन जीएफ 677 की अपेक्षाकृत ज्यादा औजस्वी होता है|

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पौधरोपण

पौधरोपण- बीजू या एक साल पुराना, कलमी पौधा, स्वस्थ जड़ तथा पत्ती रहित होना चाहिए| तैयार गड्ढों में गोबर की खाद, केचुए की खाद मिलाकर गड्ढे भरने चाहिये| तैयार गड्ढों में नवम्बर से दिसम्बर के महीने में पौधे लगाने चाहिये|

दूरी और गहराई- पतझड़ ऋतु में पौधे लगाने के लिए गड्ढे का आकार 1 × 1 × 1 मीटर और पौधे से पौधे और पक्ति से पक्ति की दूरी 6 x 7 मीटर रखनी चाहिये| पौधे को ठीक तरीके से उगाने के लिए 3 पंक्ति मुख्य प्रजाति की और एक पंक्ति परागणकर्ता की लगानी चाहिए तथा एक हैक्टर में 5 से 7 डब्बे मधुमक्खी के रखने चाहिये, जिससे की सुचारू रूप से परागण हो सकें|

खाद और उर्वरक

बादाम की खेती में खाद और उर्वरक आलूबुखारा के अनुसार देनी चाहिए, उसके लिए यहां जाने- आलूबुखारा या प्लम की खेती कैसे करें

सिंचाई प्रबंधन

बादाम के छोटे बगीचे में गर्मियों के समय मे 10 दिन के अन्तराल पर तथा सर्दियों में 20 से 25 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिये| ऊँची-नीची कृन्दाओं में टपक विधि का प्रयोग करना चाहिए| फलत वाले पौधे मे अच्छी फलत के लिये गर्मियों में सिंचाई बहुत आवश्यक होती है| इससे फलों के गिरने की समस्या समाप्त होती है और अगले वर्ष की फलत अच्छी आती है| वृक्षों के चारों तरफ मृदा के ऊपर पत्तियों, भूसा व अन्य कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थो का प्रयोग कर सकते है| इससे पानी का वाष्पोत्सर्जन कम होता है, खरपतवार कम निकलते है|

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निराई गुड़ाई

पहली निराई 10 से 15 दिन बाद, दूसरी निराई 25 से 35 दिन बाद, तीसरी निराई 45 दिन बाद, खरपतवार सघनता के अनुसार, 2-3 बार हाथ से निराई करनी चाहिए|

रोग व कीट रोकथाम 

चूँकि बादाम गुठली वर्गीय फसल है, तो इस पर कीट और रोग आक्रमण आडू के समान होता है, इसलिए कीट और रोकथाम के लिए यहां पढ़ें- आड़ू की खेती कैसे करें

फल तुड़ाई 

बादाम रोपाई के तीसरे साल से फल देना शुरू कर देता है, लेकिन 6 से 7 साल बाद पौधा अच्छे फल देने लगता है, फूल आने के 7 से 8 महीने बाद, पतझड़ के समय बादाम तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है| बादाम के फली के छिलकों का रंग जब हरे से पीला हो जाये और फलिया डंठल से अलग होने लगे|

बादाम के फली की तुड़ाई हाथ से करे या टहनियों पर डंडे से झटके से मार कर फलियों की तुड़ाई की जा सकती है, डंडे से तुड़ाई में टहनियों का ध्यान रखे, तुड़ाई की बाद फलियों को छाया में सुखाये और फिर गिरी को फली से अलग कर लेना चाहिए|

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2 thoughts on “बादाम की खेती कैसे करें, जानिए किस्में, देखभाल और पैदावार”

  1. बहुत अच्छी जानकारी मिली हो सकता है हम इस जानकारी से अच्छे से बादाम की खेती कर सकें।

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