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Organic Farming

ईसबगोल की जैविक खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल, पैदावार

August 20, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

ईसबगोल (Isabgol) एक महत्वपूर्ण नगदी औषधी की फसल है, जो रबी के मौसम में उगाई जाती है| यह फसल प्रमुखतः गुजरात, पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में उगाई जाती है| पिछले कुछ वर्षों से इसका उत्पादन मध्यप्रदेश में भी होने लगा है| ईसबगोल के बीजों पर पाया जाने वाला पतला छिलका ही उसका औषधीय उत्पाद होता है|

इस औषधि को पेट की सफाई, कब्जियत, अल्सर, बवासीर, दस्त तथा आव-पेचिश जैसी शारीरिक बीमारियों को दूर करने में आयुर्वेदिक औषधि के रूप में प्रयुक्त किया जाता है| इसके अतिरिक्त इसका उपयोग प्रिंटिंग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों जैसे आइस्कीम तथा रंगरोगन के काम में भी होता है| भारत इसका सर्वाधिक उत्पादक एवं निर्यातक देश है|

विश्व बाजार में जैविक पद्धति से उगाये गये ईसबगोल की मांग अत्यधिक है| ईसबगोल को कम पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है और इस आवश्यकता की पूर्ति जैविक खादों से आसानी से की जा सकती है| इस लेख में अधिकतम उत्पादन के लिए ईसबगोल की जैविक खेती कैसे करें, की पूरी जानकारी का उल्लेख किया गया है| ईसबगोल की वैज्ञानिक तकनीक से खेती की जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- ईसबगोल की खेती कैसे करें

यह भी पढ़ें- शुष्क क्षेत्र में जैविक खेती कैसे करें, जानिए आधुनिक तकनीक

जैविक ईसबगोल उत्पादन आवश्यक क्यों?

1. ईसबगोल को कम पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है| जिससे इस फसल को आसानी से जैविक पद्धति में रूपान्तरण अवधि के दौरान बिना किसी उपज में कमी के उगाया जा सकता है|

2. विश्व बाजार में ईसबगोल की माँग अत्याधिक है, जब इसका उत्पादन जैविक पद्धति से किया गया हो|

3. जैविक कृषि से भूमि उर्वरता तथा स्वास्थ्य के साथ-साथ मृदा में होने वाली जैविक क्रियाओं मंब सुधार होता है|

4. खादों और कीटों व बीमारियों के रोकथाम में काम आने वाली चीजों का उत्पादन किसानों को अपने खेत पर ही करना चाहिए| जिससे उत्पादन लागत में कमी आती है|

5. किसानों को प्रमाणित जैविक ईसबगोल का उचित मूल्य मिलता है| जिससे उनकी आय में वृद्धि होती है|

6. जैविक कृषि में फार्म अवशिष्ट तथा कचरे के उचित प्रबंधन के कारण प्राकृतिक संतुलन बना रहता है और साथ ही पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आती है|

वर्तमान समय में भारतीय भूमि विज्ञान संस्थान, भोपाल में किये गये शोध कार्य से जैविक ईसबगोल उत्पादन के लिए उत्पादन तकनीकि का प्रारुप तैयार किया गया है| जो इस प्रकार से हैं, जैसे-

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ईसबगोल की जैविक खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

ईसबगोल की खेती के लिए ठंडा व शुष्क मौसम सर्वोत्तम होता है| ईसबगोल की खेती को पकते समय खुला आसमान तथा शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है| पकते समय रात का अधिक तापमान तथा बादल से ढका मौसम होने पर पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है| पकते समय हल्की बौछार भी ईसबगोल की बाली से बीजों को जमीन पर बिखेर कर फसल को नुकसान पहुंचा सकती है|

ईसबगोल की जैविक खेती के लिए भूमि का चयन

ईसबगोल की खेती के लिये हल्की, बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छी तरह होता हो एवं जिसमें ज्यादा पानी न ठहरता हो, अधिक उपयुक्त होती है| ईसबगोल को चिकनी दोमट, हल्की से भारी काली मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, यदि जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो|

ईसबगोल की जैविक खेती के लिए खेत की तैयारी

यदि आप सोयाबीन की खेती कर रहें है, तो सोयाबीन की कटाई एवं ईसबगोल की बुवाई में काफी अन्तराल होता है| सोयाबीन की कटाई के पश्चात् मिट्टी की अवस्था के आधार पर हैरो या कल्टीवेटर से जुताई करके पाटा चलाना चाहिए| ईसबगोल की खेती के लिये मिट्टी भुर-भुरी होनी चाहिए|

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ईसबगोल की जैविक खेती के लिए किस्मों का चयन

जैविक कृषि में ऐसी किस्मों का चयन करना चाहिए, जो कि भूमि एवं जलवायु के अनुकूल होने के साथ-साथ कीटों एवं रोगों के लिये भी प्रतिरोधक हो| किस्मों के चयन में अनुवांशिक विविधता को ध्यान में रखना चाहिए और जैविक प्रमाणित बीजों का प्रयोग करना चाहिए|

यदि जैविक प्रमाणित बीज की उपलब्धता नहीं हो तो रसायन के बिना उपचारित सामान्य बीज का उपयोग कर सकते है| ईसबगोल की खेती के लिए प्रयुक्त की जाने वाली बीज की प्रमुख किस्में गुजरात ईसबगोल- 1 (जी आई- 1), गुजरात ईसबगोल- 2 (जी आई- 2), हरियाणा ईसबगोल- 5 (एच आई- 5) और जवाहर ईसबगोल- 4 (जे आई- 4) हैं|

ईसबगोल की जैविक खेती के लिए बुवाई का समय

इसकी फसल की बुवाई नवम्बर माह के प्रथम सप्ताह से अन्तिम सप्ताह तक की जा सकती है| इसकी देरी से बुवाई करने पर कम उत्पादन के अलावा कीटों एवं रोगों का प्रकोप भी हो सकता हैं|

ईसबगोल का बीजोपचार और बुवाई की विधि

वातावरण की नत्रजन के प्रभावशाली जैव यौगिकीकरण के लिए इसके बीज को एजोटोबेक्टर कल्चर से उपचारित करते हैं| फास्फोरस विलयकारी जीवाणू कल्चर से बीज को उपचारित करके मिट्टी में फास्फोरस की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है| इन कल्चर को बुवाई से पहले बीज और बारीक मिट्टी या रेत या छनी हुई गोबर की खाद के साथ मिलाना चाहिए|

इसकी बीज दर 4 से 6 किलोग्राम प्रति हैक्टर रखते हुए सीड ड्रील हल के पीछे 30 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में तथा 2 से 3 सेंटीमीटर गहराई पर बुवाई करनी चाहिए| इसके बीज हल्के एवं छोटे होने के कारण बुवाई करते समय उनमें बारीक मिट्टी या रेत या छनी हुई गोबर की खाद को मिलाया जाना चाहिए|

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ईसबगोल की जैविक फसल में पोषण प्रबंधन

जैविक खादों एवं अन्य पोषक तत्वों के पोषण प्रबंधन के लिए जैविक साधनों को अधिक से अधिक फार्म (खेत) पर ही बनाकर पोषण प्रबंधन कर चाहिए| गोबर की खाद, देशी खाद, केंचुआ खाद, गोबर गैस की खाद, फसल अवशेष एवं हरी खाद को जैविक कृषि में तभी इस्तेमाल कर सकते, जब इन्हें खेत पर ही तैयार किया गया हो| खेत के बाहर तैयार की गई खादों व प्रयोग नहीं करना चाहिए| कुछ प्रमुख जैविक खादों में विद्यमान पोषक तत्वों के आधार पर ईसबगोल के लिए निर्धारित दर निम्न प्रकार से हैं, जैसे-

खादें नाइट्रोजन की मात्रा (प्रतिशत)निर्धारित दर (टन प्रति हेक्टेयर)
गोबर खाद0.5 से 1.02 से 4
मुर्गी खाने की खाद (खेत में 45 से 60 दिन गलाने के बाद डालें)2.0 से 2.50.8 से 1.0
केंचुआ खाद1.5 से 2.01.0 से 1.4

स्थानीय उपलब्धता के आधार पर उपरोक्त खादों में से कोई एक अथवा दो या तीन खादों को सम्मिलित रूप से उपयोग कर सकते हैं| जब जैविक खादों का सम्मिलित उपयोग हो रहा हो तो इस बात का प्रमुख रूप से ध्यान रखना चाहिए कि फसल को कुल मिलाकर 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हैक्टर मिले| जैविक खादों का उपयोग बुवाई के 10 से 15 दिन पहले करना चाहिए|

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ईसबगोल की जैविक फसल की देखभाल

गर्मी में गहरी जुताई के अलावा स्वस्थ एवं अच्छी पौधों की संख्या एक हद तक खरपतवारों की वृद्धि नहीं होने देती है| इसके अलावा जरूरत पड़ने पर बुवाई के 25 से 30 दिन पश्चात् हाथ से खरपतवार निकालना चाहिए| बुवाई से 7 से 10 दिन पहले सिंचाई (पलेवा) करना चाहिए जिससे कि बीजों का अंकुरण अच्छी तरह से हो, साथ ही बुवाई के ठीक बाद में सिंचाई करने से बीजों के बहने या ढ़कने की समस्या से छुटकारा मिल जाए|

अगर बीजों का अंकुरण सही तरह से नहीं हो पाया है तो बुवाई के 6 से 7 दिन पश्चात् एक सिंचाई करनी चाहिए| इसके पश्चात् ईसबगोल में कम से कम 3 सिंचाई क्रमशः 30, 60 व 80 दिन पर करनी चाहिए| ईसबगोल में दुधिया अवस्था पर अन्तिम सिंचाई करनी चाहिए|

कीटों एवं बीमारियों के सफलता पूर्वक प्रबंधन के लिये प्रतिरोधक या सहनशील किस्मों को उगाना चाहिए| ईसबगोल की बुवाई के समय खेत में ट्राइकोडरमा को 5 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर पर उपयोग करने से उकठा बीमारी से बचाव हो जाता है| जैविक तकनीक से कीट एवं रोग नियंत्रण की पूरी जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- ईसबगोल में कीट एवं रोग और उनकी जैविक रोकथाम कैसे करें

ईसबगोल की जैविक फसल की कटाई और गहाई

इसकी फसल 100 से 120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है| जब पत्तियों का रंग पीला तथा बाली लाल पड़कर दाने हाथ से मसलने पर ही निकलने लगे तो इसकी परिपक्वता पूर्ण हो जाती है| इसकी कटाई सुबह के समय की जाती है, जिससे बीज कम से कम झड़ते हैं| फसल की कटाई के पश्चात् एवं गहाई के पूर्व फसल की ढेरियों को 2 से 3 दिन धूप में सुखाते हैं| गहाई के पूर्व ढेरियों पर हल्का सा पानी छिड़क देते हैं, जिससे दाने आसानी से अलग हो जाते हैं| गहाई करने के बाद भूसा अलग करके साफ बीज प्राप्त कर लिये जाते हैं|

ईसबगोल की जैविक खेती से पैदावार

उपरोक्त तकनीक (जैविक) से खेती करने पर ईसबगोल से प्राप्त पैदावार सामान्य (रासायनिक) खेती के बराबर या कभी-कभी अधिक प्राप्त होती है| इसकी फसल से औसतन 800 से 1500 किलोग्राम प्रति हैक्टर उपज प्राप्त होती है|

निष्कर्ष

यदि जैविक पद्धति से ईसबगोल की खेती की जाय तो मृदा स्वास्थ्य सुधार के साथ साथ मृदा उत्पादकता एवं जैविक तकनीक द्वारा उगाये गये उत्पाद की गुणवत्ता में भी बढ़ोत्तरी पाई गयी है| यदि किसान अपने उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करके जैविक खेती करें तो निश्चित ही किसानों को ज्यादा लाभ प्राप्त होगा|

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ईसबगोल में कीट एवं रोग और उनकी जैविक रोकथाम कैसे करें

August 19, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

ईसबगोल एक महत्वपूर्ण नगदी एवं अल्पकालिन औषधीय फसल है| इस फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप यपि कम होता है, परन्तु इसमें मुख्य रूप से कीटों में माहू (मोयला) एवं दीमक नुकसान पहुचाते हैं और रोगों में मृदु रोमिल फफूंद प्रमुख है| इन नाशीजीवों के जीवन चक्र के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर इसे समय पर रोकथाम कर अधिक उच्च गुणवता वाला उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है| ईसबगोल की जैविक खेती कैसे करें की जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- ईसबगोल की जैविक खेती, जानिए किस्में, देखभाल और पैदावार

ईसबगोल की फसल में जैविक कीट रोकथाम

दीमक

यह सर्वभक्षी कीट है, जो उदई के नाम से भी जाना जाता है| इसका प्रकोप मुख्य रूप से रेतीली मिट्टी, कम पानी तथा अधिक तापमान की अवस्थाओं में अधिक होता है| ईसबगोल फसल के विकास की किसी भी अवस्था में नुकसान पहुंचा सकता है| यह कीट जमीन के नीचे मिट्टी में अपना घर बनाकर रहते हैं तथा ईसबगोल की जड़ों को खाकर नुकसान पहुंचाती हैं|

इस वजह से पौधे जगह-जगह झुण्डों में सुख जाते है और खींचने पर आसानी से उखड़ जाते है| खेत में सूखे हुए पौधों की जगह-जगह खोदने पर दीमक आसानी से दिखाई देती है| रानी दीमक अनुकुल परिस्थितियों में प्रतिदिन हजारों अण्डे देती है| शुष्क क्षेत्रों में दीमक का प्रकोप अन्य स्थानों की तुलना में अधिक होता हैं| इस प्रकार ईसबगोल के पौधे सूखने से इसकी पैदावार पर बुरा असर पड़ता हैं|

रोकथाम-

1. खेत में व खेत के आसपास दीमक के घरों तथा खरपतवारों को नष्ट करें|

2. खेत में काम ली जाने वाली गोबर या अन्य खाद पूर्ण रूप से सड़ा कर काम में लेनी चाहिए|

3. खेत में नीम की खली 200 किलोग्राम प्रति हैक्टयर की दर से खेत की अन्तिम जुताई के समय भूमि में मिलावे|

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माहु (ऐफिड)

यह काले एवं हरे पीले रंग का कोमल शरीर वाला सुक्ष्म व अण्डाकार कीट होता है| इस कीट का सामान्यतः आक्रमण पत्तियों पर (फरवरी के प्रथम सप्ताह) में शुरू होता है और पौधे के कोमल भागों पर गुच्छे के रूप में कॉलोनी बनाता है| कई बार वातावरण में नमी व बादल रहने पर इस कीट का प्रकोप दिसम्बर माह से भी शुरू हो जाता है|

फसल पर इस कीट के शिशु व प्रौढ़ दोंनो सर्वाधिक नुकसान फरवरी अन्त से मार्च मध्य तक पहुंचाते है| इस कीट के प्रकोप से फसल में लगभग 20 से 30 प्रतिशत तक पैदावार में हानि आकी गई है| मौसम में नमी (हल्की बुन्दा बान्दी तथा कई दिन तक बादल) होने पर कीटों की संख्या मे तेजी से बढ़ोतरी होती है और प्रकोप उग्र होने पर हानि बहुत अधिक हो जाती है|

कीट के शिशु व प्रोढ़ सैकड़ों की संख्या में पौधों की पत्तियों और बीजों से रस चूसकर हानि पहुचाते हैं| कीट ग्रस्त पौधे कमजोर होकर पीले पड़ जाते हैं एवं उनकी बढवार रूक जाती है| उनमें बीज नही बनता, साथ ही इन कीटों द्वारा स्रावित वाले होने वाले रस पर काली फफूंद पनपने से पैदावार बहुत घट जाती है|

दाने सिकुड़ जाते हैं तथा गुणवता में कमी होने से बाजार भाव कम मिलता हैं| इस कीट का प्रकोप सभी किस्मो पर होता है, परन्तु इसकी संख्या प्रकृति में परभक्षी कीटो (कोकसिनेला, क्राईसोपा आदि), पक्षियो एवं सूक्ष्म रोगाणुओं के द्वारा कुछ सीमा तक नियन्त्रित रहती है|

रोकथाम-

इस कीट की रोकथाम के लिए निम्नलिखित समन्वित प्रबंधन प्रणाली अपनानी चाहिये, जैसे-

1. समय पर फसल की बुआई करें, नवम्बर मध्य के बाद बुवाई करने पर कीट प्रकोप बढ़ने से उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है|

2. ईसबगोल की खेती में सिफारिश की गई किस्म, खाद-उर्वरक की मात्रा एवं बुवाई विधि का अनुसरण करें|

3. प्रकोप का अनुमान ज्ञात करने हेतु पीले रंग के चिपचिपे पाश का प्रयोग करें, ताकि समय पर नियन्त्रण शुरू किया जा सके|

4. कीट द्वारा हानि का अनुमान लगाने के लिए निरन्तर सर्वेक्षण करें तथा कीट प्रकोपित पौधों की संख्या 20 प्रतिशत से बढ़ने पर तुरन्त उपचार करें| उपचार के पूर्व मित्र कीटों की संख्या ज्ञात करें| यदि ये मित्र कीट अधिक सक्रिय हैं तो कीटनाशी उपचार न करें|

5. यदि कीट नाशी उपचार करना आवश्यक हो तो मधुमक्खियों की गतिविधि पर भी ध्यान रखते हुए छिड़काव दोपहर बाद करें ताकि वे विषेले असर से बच सके और केवल विशिष्ठ क्रिया वाले कीटनाशी जैसे जैविक एवं नीम आधारित कीटनाशी का प्रयोग करें| इन दवाईयो के प्रयोग करने से निर्यात हेतु भेजे जाने वाली भूसी में कीटनाशी अवशेषों की मात्रा नगण्य होगी|

6. ईसबगोल की जैविक खेती में नीम + धतुरा + आक की सूखी पत्तियों के पाउडर को 1:1:1 अनुपात में मिलाकर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचारित करें|

7. ईसबगोल की खेती में कीट सर्वेक्षण हेतु 12 पीले चिपचिपे पाश प्रति हैक्टेयर की दर से लगावें|

8. मृदा में बिवेरिया बेसियाना 5 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर बुवाई से पूर्व मिलावें|

9. खड़ी फसल में कीट (माहु) नियंत्रण हेतु नीम + धतुरा + आक 1:1:1 के अनुपात में पत्तियों के घोल (10 प्रतिशत) को गौमूत्र (10 प्रतिशत) में मिलाकर आवश्यकतानुसार पर्णीय छिड़काव करें|

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ईसबगोल की फसल में जैविक रोग रोकथाम

मृदु रोमिल फफूंद

ईसबगोल फसल में लगने वाला प्रमुख रोग मृदु रोमिल फफूंद है| यह रोग ईसबगोल फसल में बालियां बनते समय दिखाई देता है| यह फफूंद सबसे पहले पत्तियों पर धब्बे के रुप में प्रकट होता है तथा धीरे-धीरे पूरी पत्ती पर फैलकर उसे नष्ट कर देता है| अधिक नमी होने पर इस रोग का फैलाव और बढ़ जाता है| इसकी और ईसबगोल में लगने वाले अन्य रोगों की रोकथाम के लिए निम्न उपाय किये जाने चाहिएं|

रोकथाम-

1. रोग ग्रस्त फसल के अवशेषों को खेत से बाहर कर नष्ट कर देवें|

2. गर्मियों में गहरी जुताई कर खेत खाली छोडें|

3. फसल चक्र अपनायें अर्थात बार-बार एक ही खेत में ईसबगोल की खेती नहीं करें|

4. ईसबगोल की खेती में स्वस्थ, प्रमाणित एवं रोग रोधी किस्मों का चयन करें|

5. खेत में प्रयोग की जानें वाली खाद पूर्ण रुप से सड़ी हुई होनी चाहिये|

6. खेत में ट्राइकोडर्मा कल्चर 2.5 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से खेत की अंतिम जुताई के समय भूमि में मिलावें|

7. ईसबगोल की जैविक खेती में नीम .धतुरा . आक की सूखी पत्तियों के पाउडर को 1:1:1 अनुपात में मिलाकर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचारित करें|

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शुष्क क्षेत्र में जैविक खेती कैसे करें; जानिए आधुनिक तकनीक

August 15, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

हमारे देश के लगभग 12 प्रतिशत (32 लाख हैक्टेयर) भू-भाग में औसत वार्षिक वर्षा 400 मिलीमीटर से कम होती है एवं यह शुष्क क्षेत्र कहलाता है| यह क्षेत्र मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी राज्यों राजस्थान, गुजरात व हरियाणा में फैला हुआ है और इसका कुछ भाग आंध्रप्रदेश में भी है| वर्षा की कमी के साथ-साथ वर्षा की अनिश्चितता व तापमान की विस्तृत श्रृंखला अर्थात ग्रीष्मकाल में 48 से 49 डिग्री सेन्टीग्रेड तक व शरदकाल में 0 डिग्री सेन्टीग्रेड तक होने के कारण यह क्षेत्र कृषि के लिये बहुत चुनौतिपूर्ण है|

इन परिस्थितियों के अनुरूप सामंजस्य रखते हुए पारंपरिक कृषि विधियां विकसित हुई जिसमें वृक्ष, फसलें व पशुओं की सम्मिलित उत्पादन पद्धति मुख्य थी| यह पद्धति शुष्क क्षेत्र की परिस्थितियों में उत्पादन में स्थायित्व किन्तु सीमित उत्पादक क्षमता वाली है| आधुनिक विज्ञान के आधार पर रसायनिक आदानों के प्रयोग से उत्पादकता बढ़ाने के अनेक प्रयोग किये गये किन्तु वर्षा की अनिश्चितता में इनका प्रयोग लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ है|

इन परिस्थितियों में पशु व कृषि अवशेष से बनी जैविक खाद का प्रयोग जल संरक्षण व फसल को संतुलित पोषण देने में सहायक होता है, साथ ही अन्य कई पर्यावरण मित्र तकनीकों के समन्वित प्रयोग से न केवल वर्षा की अनिश्चिता में भी उत्पादन में स्थायित्व रखना संभव हो सकता है, वरन् इससे खेती की लागत कम होने व बाजार में जैविक उत्पाद की माँग होने से यह खेती लाभप्रद भी हो सकती है| चूंकि यह क्षेत्र पशुपालन आधारित व्यवस्था पर निर्भर है, जिससे जैविक खाद की उपलब्धता पर्याप्त है|

अतः पारंपरिक कृषि में उपयोग किये जाने वाले जैविक आदानों के उत्पादन व प्रयोग की विधियों में सुधार करके उनके समन्वित प्रयोग से उत्पादकता में सुधार का अध्ययन करने हेतु सन् 2008 में केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान में आदर्श जैविक क्षेत्र की स्थापना की गयी थी| छ: वर्ष के प्रयोगों के आधार पर शुष्क क्षेत्र के लिये उपयुक्त जैविक कृषि प्रबन्धन की तकनीक विकसित की गयी हैं|

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जैविक कृषि क्या है?

स्थानीय रूप से उपलब्ध जैविक व प्राकृतिक संसाधनों जैसे पशु अपशिष्ट, फसल अवशेष, वर्षा जल इत्यादि के सदुपयोग व रसायनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशक आदि का प्रयोग न करके, प्रकृति मित्र तकनीकों से फसल का पोषण व रक्षण प्रबन्धन करने को जैविक कृषि कहते है| इसमें जैविक खाद, जैव कीट नियंत्रक, फसल चक्र, मल्चिंग आदि का प्रयोग किया जाता है|

जैविक खेती में भूमि की उर्वरकता को जैव विधियों जैसे जैविक खाद, हरी खाद, फसल चक्र आदि से निरंतर बनाये रखने के तरीके अपनाये जाते हैं, साथ ही नीम आदि कीटनाशक गुणों वाले पौधों के उत्पादों व मित्र कीट, सूक्ष्मजीवों का प्रयोग कर रोग-कीटों का नियंत्रण किया जाता है|

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जैविक कृषि के लिये अनुकूल शुष्क क्षेत्र-

1. पशु आधारित कृषि व्यवस्था होने से जैविक खाद की पर्याप्त उपलब्धता|

2. रसायनिक उर्वरक कीटनाशक का बहुत कम प्रयोग होने से भूमि में अवशेष न्यूनतम अतः जैविक रूपान्तरण में सुविधा|

3. जैविक खाद, खरपतवार की पलवार (मल्चिग) आदि का जल संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान|

4. जैविक कीट नियन्त्रक जैसे- नीम, आक, धतूरा की पर्याप्त मात्र में उपलब्धता|

5. पारंपरिक कृषि पद्धति का वर्तमान में भी अस्तित्व में होना जिससे संसाधनों का संरक्षण व पुनर्चक्रण सुनिश्चित किया जाता है|

6. निर्यात मांग वाली कुछ विशेष उच्च मूल्य फसलें जिनका उत्पादन शुष्क क्षेत्र में ही होता है, जैसे- जीरा, ग्वार, ईसबगोल, अजवायन आदि|

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जैविक कृषि तकनीक

जैविक कृषि में निम्न तकनीकों का समन्वित उपयोग किया जाता है, जैसे-

फसलें व फसल चक्र

शुष्क क्षेत्र में मुख्यत: बाजरा, ग्वार, मोंठ, तिल व मसाले वाली फसलों का उत्पादन होता है| इनमें से अधिकांश फसलें ऐसी हैं, जिनका गुणवत्तायुक्त उत्पादन सिर्फ शुष्क जलवायु में ही संभव है, जैसे- जीरा, ईसबगोल आदि| इन फसलों की जैविक विधि से उत्पादन प्रमाणित होने पर विश्व बाजार में बहुत मांग है|

यूरोप व अमेरिका में फाइटोसेनेटरी कानून के सख्ती से लागू होने के कारण भविष्य में फसलों के रसायन अवशेष युक्त उत्पाद का निर्यात लगभग असंभव हो जायेगा| अतः शुष्क क्षेत्रों की फसलों का जैविक विधि से उत्पादन करने पर न केवल निश्चित बाजार मिलेगा वरन् स्थानीय संसाधनों का सदुपयोग भी संभव होगा|

फसल चक्र में दलहन जैसे- ग्वार, मोठ, मूंग को अवश्य ही शामिल करना चाहिये, ताकि मृदा की उर्वरता बनी रहे| रबी में जीरा, ईसबगोल व रायड़ा को फसल चक्र में इस प्रकार शामिल करना चाहिये| जिससे की जीरा एक खेत या खेत के एक ही भाग पर लगातार दो वर्ष तक उत्पादित न हो अर्थात जीरा के बाद रायड़ा या ईसबगोल का फसल चक्र अपनाना चाहिये|

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पोषण प्रबंधन

अक्सर किसान गोबर खाद को बुवाई से काफी पहले खेत में डाल देते हैं| गोबर कई दिनों तक खुली हवा-धूप में पड़ा रहता है, जिससे इसके कई पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं| दूसरे इसका सड़ाव न होने के कारण खेत में कच्चा गोबर जाते ही दीमक (उदई) लग जाती है| कच्चा गोबर सड़ने के लिये खेत की नत्रजन को सोख लेता है| कई खरपतवार के बीज इस बिना सड़े गोबर के साथ खेत में चले जाते हैं और उगकर समस्या पैदा करते हैं|

इन सब समस्याओं का समाधान है, कि गोबर की वैज्ञानिक विधि से जैविक खाद बनाई जाये| शुष्क क्षेत्रों में खाद तैयार करने के लिये 4 से 6 महीने का समय मिल जाता है| वहाँ पशु मल व फसल अवशेष से भूमि के नीचे गड्ढे में खाद बनाना उचित रहता है| जल की मात्रा व गुणवत्ता में कमी, वातावरण में शुष्कता व तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण शुष्क क्षेत्र में केंचुआ खाद निर्माण व्यवहारिक नहीं पाया गया है|

खरपतवार नियन्त्रण

खरपतवार मुख्यत: कच्ची खाद में आये बीजों से व समय पर निराई गुड़ाई न करने से पनपते हैं| खरपतवार नियंत्रण के लिये पकी हुई जैविक खाद व साफ बीज का प्रयोग करना चाहिये| खेत में उगे खरपतवारों को हाथ से उखाड़कर फसल की पंक्तियों के बीच मल्च के रूप में बिछा देना चाहिये|

इससे न केवल खरपतवार नियन्त्रण होता है, वरन् भूमि सतह ढक जाने से नमी संरक्षण व बाद में खरपतवार के गलसड़ जाने से भूमि को जीवांश (लगभग 2.0 से 2.5 टन प्रति हेक्टेयर) भी मिल जाता है| पहली निराई-गुड़ाई फसल बुवाई के 20 से 25 दिन बाद व दूसरी 40 से 45 दिन बाद अवश्य कर देनी चाहिये|

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रोग एवं कीट नियंत्रण

रोग एवं कीट नियंत्रण के लिये निम्न उपायों का समन्वित प्रयोग करना चाहिये, जैसे-

1. स्वस्थ, रोग एवं कीट रहित बीज का चयन कर 4 से 6 ग्राम ट्राइकोडरमा पाउडर से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित कर बुवाई करनी चाहिये|

2. अच्छी पकी हुई जैविक खाद का प्रयोग 5.0 टन प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि तैयारी के समय करना चाहिये|

3. खेत के आसपास या गाँव में उपलब्ध नीम के वृक्षों की पकी हुई निम्बोली पानी में भिगोकर उसका छिलका उतार देना चाहिए व गुठली को सुखाने के पश्चात कूटकर 150 से 200 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से जुताई के समय मृदा में मिला देना चाहिए|

4. खेत में कीट प्रजाति के अनुसार फेरोमोन ट्रेप का प्रयोग करना चाहिये|

5. खेत में प्रतिदिन निरीक्षण करना चाहिये तथा रोग एवं कीट की शुरूआत होने पर नीम बीज गिरी का 5.0 प्रतिशत जल घोल का सायंकाल छिड़काव करना चाहिये|

6. खेत की बाड़ व बीच में पंक्तियों में कई प्रकार के फूलदार वृक्ष-झाड़ी लगाने चाहिये जिससे फसल के लिये लाभकारी कीटों को आश्रय व भोजन मिलता रहे| खेत की बाड़ पर कुछ वृक्ष नीम के भी लगाने चाहिए ताकि जैविक कीट नियंत्रक बनाने हेतु निम्बोली मिल सके|

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प्रमाणीकरण

जैविक उत्पादन को उपभोक्ता व बाजार का विश्वास प्राप्त करने के लिये इसको प्रमाणित कराने की आवश्यकता होती है| इसके लिये भारत सरकार से मान्यता प्राप्त किसी संस्था से पंजीकरण कराना चाहिये| इसके बाद निरीक्षक समय-समय पर आकर निरीक्षण करते हैं व कृषक पुस्तिका में आदानों व उत्पादों के विवरण को सत्यापित करते हैं|

सब कुछ सुचारू रूप से नियमानुसार होने पर तीन वर्ष पूरे होने पर जैविक प्रमाण पत्र मिल जाता है| जिसके आधार पर प्रमाणित जैविक उत्पाद का विक्रय किया जा सकता है| सरकार द्वारा प्रमाणीकरण योजना में शामिल होने वाले कृषकों को रूपये 10000/- तक का अनुदान देने का प्रावधान है|

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

जैविक खेती से निम्न प्रकार से जलवायु परिवर्तन के खेती पर बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, जैसे-

1. जैविक खाद के प्रयोग से भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है जिससे वर्षा की अनियमितता में भी फसल को पानी मिलता रहता है| साथ ही सिंचाई की संख्या भी कम हो जाती है| प्रयोगों से पाया गया है, कि जैविक खाद के प्रयोग से ग्वार-तिल आदि फसलों ने 42 दिन के सूखाकाल के बाद भी उत्पादन दिया जबकि रसायनिक खाद के द्वारा उगाई गई फसल 27 दिन बाद ही नष्ट हो गयी| इसी प्रकार गेहूं में जैविक प्रबंधन से 4 सिंचाई में ही अच्छी पैदावार प्राप्त हुई|

2. जैविक खाद के प्रयोग से संतुलित पोषण मिलने के कारण फसल में सूखा सहने व रोग एवं कीट से लड़ने की ताकत बढ़ती है| साथ ही तापमान की विषमता का भी कम प्रभाव पड़ता हैं|

3. जैविक खेती का जैवविविधता, फसल चक्र आदि के होने से जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक होने वाले ताप, वर्षा, आद्रता आदि के परिवर्तनों का प्रभाव बहुत कम हो जाता है|

4. जैविक खाद के प्रयोगों से भूमि में 200 से 300 किलोग्राम कार्बन का अवशोषण (सीक्रेस्ट्रेशन) होता है, जो कि जलवायु परिवर्तन को कम करने में सहायक होता है| किसान को कार्बन क्रेडिट का रूपया भी मिल सकता है|

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जैविक कृषि की सफलता

इस प्रकार समन्वित पोषण व रक्षण से सफल जैविक उत्पादन संभव हो पाता है| केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के प्रमाणित जैविक फार्म पर किये गये प्रयोगो में ग्वार की 630 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर, तिल की 886 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर, जीरे की 516 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर,व ईसबगोल की 808 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर, तक उपज प्राप्त की गई है| जैविक व्यवस्था को बनाने में 2 से 3 वर्ष का समय लग सकता है|

किन्तु एक बार व्यवस्था बन जाने पर बाहरी साधनों पर निर्भरता बहुत कम हो जाती है व रोग एवं कीट का प्रकोप भी कम हो जाता है| इस व्यवस्था में स्वयं के खेत से तैयार बीज के अलावा खाद, कीट नियंत्रक आदि अधिकांश आदान शुष्क क्षेत्र में बहुतायत से अपनाये जाने वाली मिश्रित कृषि पद्धति (फसल + वृक्ष + पशु) के उपोत्पाद के रूप में मिल जाते है| अतः जैविक पद्धति की लागत कम होती है|

निष्कर्ष

वर्षा की कमी व अनिश्चितता वाले क्षेत्रों में कृषि को स्थायित्व प्रदान करने के लिये जैविक तकनीकों का समन्वित प्रयोग न केवल सीमित संसाधनों का सदुपयोग सुनिश्चित करता है वरन् मृदा स्वास्थ्य व पर्यावरण में सुधार तथा लागत में कमी जैसे कई कृषि के कई ज्वलन्त मुद्दों का व्यवहारिक समाधान भी है| प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है, कि जैविक कृषि से उपज में कमी नहीं होती है| अतः यह पद्धति इन क्षेत्रों के लिये उपयोगी है|

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हल्दी की जैविक खेती: किस्में, बुवाई, खाद, सिंचाई, देखभाल और उपज

June 11, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

हल्दी की जैविक खेती इसके भूमिगत कन्दों, घनकंदों व प्रकंदों के लिए की जाती है| वाणिज्यिक भाषा में इन्हीं कन्दों को हल्दी कहते हैं| हल्दी का मुख्य उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है| परन्तु यह रंग व औषधि के रूप में भी प्रयोग में ली जाती है| मसाले के रूप में हल्दी खाद्य पदार्थों का स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ उनको अपने रंग से आकर्षक भी बनाती है|

दवाईयों के रूप में हल्दी के अनेक उपयोग है, जैसे शरीर के कटे भाग पर हल्दी का चूर्ण लगाना, सर्दी जुकाम में दूध के साथ पिलाना शरीर के जोड़ों के दर्द में तथा पुरानी खाँसी में हल्दी का पाक बनाकर खिलाना आदि| आयुर्वेद में हल्दी का उपयोग कई दवाईयों के निर्माण में होता है| हल्दी की गुणवत्ता का आधार इसमें पाये जाने वाले रंगीन पदार्थ “क्युरक्युमिन” व वाष्पशील तेल की मात्रा है| सूखी हल्दी या चूर्ण में क्युरक्युमिन की मात्रा 2.6 से 6.6 प्रतिशत तक होती है|

यदि किसान बन्धु हल्दी की खेती जैविक तकनीक से करें, तो अच्छी उपज की साथ-साथ अच्छा लाभ भी ले सकते है| क्योंकि जैविक तकनीक में उत्पादन लागत बहुत कम आती है| लेकिन इसके लिए हल्दी की जैविक खेती तकनीक की जानकारी होना आवश्यक है| इस लेख में हल्दी की जैविक उन्नत खेती कैसे करें की जानकारी का उल्लेख किया गया है|

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हल्दी की जैविक खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

गर्म व नम जलवायु हल्दी की जैविक खेती के लिए उपयुक्त है| समुद्र तल से 1500 मीटर ऊँचाई तक हल्दी की खेती की जा सकती है| प्रकंदों के अंकुरण के लिए 30 से 35 डिग्री सेल्सियस, शाखाओं के फूटने के लिए 25 से 30 डिग्री सेल्सियस, कद बनने के समय 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तथा कदों के विकास के लिए 18 से  20 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है| जिन क्षेत्रों में औसत वार्षिक वर्षा 225 से 250 सेंटीमीटर होती है, उन क्षेत्रों में वर्षाधारित हल्दी की खेती की जा सकती है|

हल्दी की जैविक खेती के लिए भूमि का चयन

हल्दी की जैविक खेती मसालेदार नगदी फसल के अतिरिक्त हर गृह वाटिका में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है| इसकी खेती के लिए 4.5 से 7.5 पी एच मान के बीच और एक प्रतिशत से अधिक जैविक कार्बन युक्त जल निकासी व्यवस्था वाली रेतीली अथवा चिकनी दोमट मिटटी सर्वाधिक उपयुक्त होती है|

हल्दी की जैविक खेती के लिए खेत की तैयारी

हल्दी की जैविक खेती हेतु यदि खेत में जैविक कार्बन की मात्रा एक प्रतिशत से कम है तो 30 से 40 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद का प्रयोग करें और खाद को भली भांति मिलाने के लिए खेत को 2 से 3 बार अच्छी तरह जुताई करें| मानसून के आगमन से पूर्व भूमि तैयार की जाती है| चार बार गहरी जुताई करने के बाद भूमि को अच्छी तरह बुआई के लिए तैयार कर लिया जाता है|

अमलीय भूमि के लिए 500 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जलयोजित चूने का प्रयोग करना होता है और मानसून पूर्व बौछारों के आगमन के तत्काल बाद अच्छी तरह जुताई की जाती है| क्यारियों के बीच 50 सेंटीमीटर का अंतराल देते हुए 1.0 मीटर की चौड़ाई, 15 सेंटीमीटर की ऊंचाई और सुविधाजनक लंबाई वाली क्यारियां बनाई जाती हैं|

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हल्दी की जैविक खेती के लिए उन्नत किस्में

हल्दी की जैविक खेती हेतु किसान बन्धुओं को अपने क्षेत्र की उन्नत और अधिक उपज देने वाली प्रचलित के साथ-साथ विकार रोधी प्रजाति का चयन करना चाहिए| यदि संभव हो सके तो जैविक प्रमाणित बीज का प्रयोग करना चाहिए| कुछ प्रचलित किस्में इस प्रकार है, जैसे- सोरमा, सुगंधम, सगुना, रोमा, पन्त पीतम्भ, बी एस आर- 1, पालम पिताम्बर और पालम लालिमा आदि प्रमुख है| किस्मों की पूरी जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- हल्दी की उन्नत किस्में, जानिए उनकी विशेषताएं और पैदावार

हल्दी की जैविक खेती के लिए बुआई का समय

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में हल्दी की जैविक फसल की बुवाई अप्रेल से जुलाई तक की जा सकती है| लेकिन सिंचाई की व्यवस्था होने पर अप्रेल से मई उपयुक्त समय है| निचले पर्वतीय क्षेत्रों में मई से जून और मध्य पर्वतीय  क्षेत्रों में अप्रैल से मई उपयुक्त समय रहता है|

हल्दी की जैविक खेती हेतु बीज दर और अंतराल

एक हैक्टेयर भूमि में रोपण के लिए 20 से 25 क्विंटल प्रकंदों की आवश्यकता होती है| प्रत्येक कंद पर 2 से 3 सुविकसित आँख अवश्य होनी चाहिए| मेढ़ों और नालियों के लिए उपयुक्त अंतराल 30 से 40 सेंटीमीटर और पंक्ति में पौधे से पौधे के बिच 20 सेंटीमीटर का अंतराल ठीक रहता हैं तथा क्यारियों या समतल जमीन के लिए पंक्ति से पंक्ति का अंतराल 30 सेंटीमीटर और पंक्ति में पौधे से पौधे का 20 से 25 सेंटीमीटर रखते है|

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हल्दी की जैविक खेती के लिए बीज उपचार

हल्दी की जैविक खेती से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए और बीज और मिटटी जनित रोगों से बचाव हेतु ट्राईकोडर्मा या ट्राईकोडर्मा विरडी 5 से 8 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित अवश्य करें| ध्यान रहे लेप पुरे कंद पर लगना चाहिए| लेप चिपकाने के लिए गुड का प्रयोग उचित मात्रा में किया जा सकता है|

हल्दी की जैविक खेती के लिए खाद प्रबंधन

खेत तैयार करते समय या क्यारियों के ऊपर आधारभूत परत के तौर पर या रोपण के समय छितराकर या जुताई द्वारा, गड्ढों में बिछाकर 45 दिन के अंतराल पर 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से केंचुए की खाद और 12 से 15 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से हर पत्ते युक्त मल्चिंग के साथ-साथ 30 से 40 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट का प्रयोग किया जाता है| मिटटी की जांच के आधार पर फास्फोरस और पोटेशियम अनुपूरक की अपेक्षित मात्रा प्राप्त करने के लिए चूने या डोलोमाइट रॉक फास्फेट और लकड़ी की राख का प्रयोग किया जाता है|

रोपण के समय 5 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जिंक का प्रयोग भी किया जा सकता है और 2 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जैविक खाद जैसे खली का प्रयोग भी किया जा सकता है| ऐसे मामलों में गोबर की खाद जैविक उर्वरक (एजोस्पिरिलियम) की मात्रा में कमी की जा सकती है और एन पी के की आधी संस्तुत मात्रा की सिफारिश भी की जाती है| इसके अतिरिक्त खली जैसे नीम खली (2 टन प्रति हेक्टेयर), कम्पोस्टेड विलय जीवाणु के अनुपूरक से भी उर्वरकता और उत्पादकता में बढ़ौतरी होगी|

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हल्दी की जैविक फसल में सिंचाई प्रबंधन

हल्दी की जैविक फसल में थोड़े अंतराल पर बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है, जो भूमि और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करती है| सामान्यतः चिकनी मृदा में 15 से 21 बार सिंचाई की जाती है और रेतीली दोमट मृदा में 35 से 40 बार सिंचाई की जाती है| अपरदन और जलप्रवाह को न्यूनतम करने के लिए ढाल के साथ-साथ क्यारियों के बीच अंतराल में संरक्षण गड्ढे बनाकर जल संरक्षण के उपाय भी किए जा सकते हैं| जल निकास के लिए गहरे गड्ढे बनाकर निचली सतह वाले खेतों में पानी के ठहरने से बचा जा सकता है|

हल्दी की जैविक फसल में खरपतवार प्रबंधन

हल्दी की जैविक फसल में रोपण के 60, 90 और 120 दिन बाद निराई की जाती है| जो खरपतवार की तीव्रता पर निर्भर करती है| हल्दी को फलों के बागीचों में अंतर फसल के तौर पर भी उगाया जा सकता है| इसे मिर्च, अरबी, अदरक, भिंडी, रौंगी जैसे खाद्यान्नो आदि के साथ मिश्रित फसल के तौर पर भी उगाया जा सकता है|

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हल्दी की जैविक फसल में कीट प्रबंधन

तना छेदक- यह कीट तने में छेद करता है और आंतरिक ऊतकों को खा जाता है| जिसके जरिये द्रव्य बाहर निकलता है और मध्य से मुरझाया पौधा कीट प्रकोप का लक्षण है|

प्रबंधन-

1. जुलाई से अक्तूबर के दौरान 21 दिन के अंतराल पर नीमगोल्ड 0.5 प्रतिशत या नीम तेल 0.5 प्रतिशत का छिडकाव तना छेदक कीट के खिलाफ प्रभावी है| छिड़काव की शुरूआत तब करनी चाहिए जब सबसे आंतरिक पत्ते पर कीट के प्रकोप के लक्षण दिखाई देने लगे|

2. यदि तना छेदक कीट की घटना दिखाई देती है, शूट्स को काट कर खोले, लार्वे को पकड़कर बाहर निकालें व नष्ट कर दें|

प्रकन्द कीट- प्रकन्द कीट (एस्पिडिएला हार्टी) खेत में प्रकंदों (फसल की बाद की अवस्था में) और भण्डारण में क्षति पहुंचाता है| ये शिराओं के द्रव्य को खाते हैं और जब प्रकन्दों पर भयंकर प्रकोप होता है, वे रसरहित एवं सूखे हो जाते हैं जिससे इनका अंकुरण प्रभावित होता है|

प्रबंधन- खेत की नियमित निगरानी और भौतिक स्वच्छता के उपायों को अपनाएं|

हल्दी के कीट- हल्दी के कीट (पेन्केटोर्लिप्स इंडिकस) पत्तों को पीड़ित करता है| जिससे वे मुड़ जाते हैं, पीले पड़ते हैं और धीरे-धीरे सूख जाते हैं| मानसून के बाद की अवधि के दौरान कीट का प्रकोप अधिक आम बात है, विशेषकर देश के शुष्क क्षेत्रों में|

प्रबंधन- यदि आवश्यक हो, एक पखवाड़े के अंतराल पर 0.5 प्रतिशत नीम तेल का छिड़काव करें|

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हल्दी की जैविक फसल में रोग प्रबंधन

पत्तों पर धब्बे- यह रोग पत्ते के किसी भी तरफ छोटे, अंडाकार, आयताकार अनियमित भूरे धब्बों के रूप में दिखाई देता है, जो शीघ्र ही भद्दे पीले अथवा गहरे भूरे रंग के बन जाते हैं| कुछ मामलों में, पौधे झुलसाहट का आभास देते हैं और प्रकन्दों की उत्पादकता में कमी आ जाती है|

पत्तों पर दाग- यह रोग विभिन्न आकार के, अनियमित आकृति के और केन्द्र में सफेद अथवा हरे रंग के भूरे धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं| बाद में, ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं और पूरे पत्ते को ढकते हुए एक अनियमित धब्बा बना लेते हैं जो अंतत: सूख जाता है|

कंद सड़न रोग- इस रोग से प्रभावित कंद सड़ जाते हैं और पौधों की पत्तियां भूरी हो जाती हैं|

प्रबंधन-

1. उपरोक्त रोगों को 1 प्रतिशत बोरोडिक्स मिश्रण का छिड़काव कर नियंत्रित किया जा सकता है|

2. तना छेदक के कारण तने का कॉलर क्षेत्र नरम और जल से तर बन जाता है जिसके परिमाणत: पौधा गिर जाता है और प्रकंद का क्षय हो जाता है|

3. रोपण करते समय ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से प्रकंद के सड़ने की घटना को नियंत्रित किया जा सकता है|

4. हल्दी की जैविक खेतु हेतु बुवाई के लिए केवल रोगमुक्त कंदों का प्रयोग करें|

5. हल्दी की जैविक फसल में समय-समय पर गोमूत्र का छिडकाव करते रहें|

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हल्दी की जैविक फसल की खुदाई

फसल रोपण के 7 से 9 माह बाद नवम्बर से दिसम्बर के दौरान कटाई के लिए तैयार हो जाती है| अल्पकालीन किस्में 7 से 8 माह, मध्यम कालीन किस्में 8 से 9 माह और दीर्घकालीन किस्में 9 माह के बाद परिपक्व होती हैं| भूमि की जुताई कल्टीवेटर की जाती है और प्रकन्दों को हाथ से एकत्र किया जाता है अथवा ढेर को खुरपी से सावधानीपूर्वक उठाया जाता है| खुदाई किए प्रकन्दों से मिट्टी और उनसे चिपके अन्य तत्वों को साफ किया जाता है|

हल्दी की जैविक फसल को सुखाना और भण्डारण

इसे बांस की बनी चटाई पर अथवा सूखी सतह पर 5 से 7 सेंटीमीटर मोटी परतों पर फैलाकर धूप में सुखाया जाता है| रात्रि के समय, प्रकंदों को एकत्र किया जाना चाहिए या ऐसी किसी चीज से ढक देना चाहिए जिससे हवा मिलती रहे, जिसे पूरी तरह सूखने में 10 से 15 दिन का समय लगता है| अधिकतम 60 डिग्री सेल्सियस तापमान का प्रयोग कर आर-पार गर्म वायु के प्रयोग से कृत्रिम रूप से सुखाने पर भी संतोषजनक उत्पाद मिलता है|

सामान्यतः बीज प्रयोजन के लिए प्रकंदों को हवादार कमरों में ढेरों में भंडारित किया जाता है और हल्दी के पत्ते से ढक दिया जाता है| बीज प्रकंदों को स्टिकनोस नक्सिवोमिका (कांजीराम) के पत्तों के साथ-साथ बुरादे, रेत के साथ गड्ढों में भी भण्डारित किया जा सकता है|

हल्दी की जैविक खेती से पैदावार

हल्दी की उपरोक्त उन्नत जैविक तकनीक से खेती करने पर ताजा हल्दी की औसत उपज 25 से 50 टन प्रति हैक्टेयर सिंचित क्षेत्रों में और 15 से 30 टन प्रति हेक्टेयर उपज असिंचित क्षेत्रों में प्राप्त की जा सकती है| हल्दी सूखने पर उसकी उपज ताजा की 15 से 25 प्रतिशत के बीच होती है|

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मेथी की जैविक खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल और उत्पादन

June 3, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

मेथी एक महत्वपूर्ण फसल है, मेथी की जैविक खेती का अपना महत्व है| क्योंकि इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी के रूप में तथा बीज का उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है| इसके बीज खाद्य पदार्थों को सरस एवं सुगंधित बनाने के काम में आता है| अचारों एवं सब्जियों को स्वादिष्ट बनाने में भी इसके बीज का व्यवहार होता है| इसके बीजों में मूत्रवर्द्धक, शक्तिवर्द्धक, वायुनाशक, पोषक, मधुमेह, भूख बढ़ाने, पाचन तंत्र नियमित करने, खून की कमी तथा जोड़ों के दर्द को ठीक करने की क्षमता है|

बीजों में डायोजेनिन स्टेराईड के कारण गर्भ निरोधक दवाओं में भी इसे प्रयुक्त किया जाता है| बीजों में नमी 13.7 प्रतिशत, प्रोटीन 26.2 प्रतिशत, वसा 5.8 प्रतिशत, खनिज 3 प्रतिशत, रेशा 7.2 प्रतिशत तथा कार्बोहाईड्रेट 4.4 प्रतिशत पाया जाता है| खनिज लवण और विटामिन में कैल्शियम, फास्फोरस, कैरोटीन, थायमिन, रिबोफ्लेविन तथा नाईसिन पाया जाता है| इसके बीजों से कई तरह के पाकवान बनाकर वृद्धावस्था में भूख बढ़ानें, पाचन तंत्र नियमित करने तथा जोड़ों के दर्द को ठीक करने में उपयोग किया जाता है|

किसान बन्धु यदि मेथी की उन्नत तकनीक से खेती करें तो कम उत्पादन लागत में अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है| लेकिन जानकारी के आभाव में ऐसा करना मुश्किल है| इस लेख में किसानों की जानकारी के लिए मेथी की जैविक उन्नत खेती कैसे करें का विस्तृत उल्लेख किया गया है|

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मेथी की जैविक खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

मैथी ठन्डे मौसम कि फसल है और यह पाले के प्रति काफी सहनशील है| इसकी वानस्पतिक बढ़वार के लिए लम्बे ठन्डे मौसम कि आवश्यकता होती है| अर्थात मैथी को ठंडी जलवायु कि आवश्यकता होती है| यह सामान्य से कम वर्षा वाले क्षेत्र इसके उत्पादन के लिए अच्छे माने गए है और अधिक़ वर्षा वाले क्षेत्र इसके उत्पादन में बाधक माने गए है|

मेथी की जैविक खेती के लिए भूमि का चयन

मैथी को बिभिन्न प्रकार कि मृदाओं में उगाया जा सकता है| परन्तु मेथी की जैविक खेती की अच्छी वृद्धि एवं उपज के लिए जीवांश युक्त दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है| वैसे मैथी कि जैविक खेती के लिए उचित जल निकास वाली रेतीली दोमट भूमि भी अच्छी रहती है| मिटटी का पी एच मान 6 से 7 होना चाहिए क्योंकि इसमें मैथी कि अच्छी वृद्धि एवं विकास होता है| अधिक क्षारीय या अधिक अम्लीय मिटटी इसके सफल उत्पादन में बाधक मानी गई है|

मेथी की जैविक फसल के लिए खेत की तैयारी

इसकी जैविक खेती हेतु खेत की 2 से 3 जुताई करके पाटा लगाकर खरपतवार निकाल देना चाहिये| जुताई से पूर्व दीमक की रोकथाम के लिये नीम या करंज की खली 2 से 3 क्विंटल प्रति हेक्टर के हिसाब से मृदा में मिलाकर बुवाई कर देनी चाहिये| यह ध्यान रहे कि मेथी की जैविक खेती में किसी भी प्रकार के भूमि उपचार के लिए रासायनिक पदार्थों को काम में लेकर नहीं किया जाये| उनकी जगह 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ट्राईकोडर्मा को उचित तकनीक से बुवाई से पूर्व व्यवहार में लायें|

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मेथी की जैविक खेती के लिए उन्नत किस्में

मेथी की जैविक खेती के लिए किसानों को स्थानीय किस्मों की अपेक्षा अपने क्षेत्र की प्रचलित और अधिक उपज देने वाली तथा विकार रोधी उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए| जहां तक संभव हो प्रमाणित जैविक बीज का ही प्रयोग करें| मेथी की कुछ प्रचलित किस्में इस प्रकार है, जैसे- हिसार सोनाली, हिसार सुवर्णा, हिसार मुक्ता, ए एफ जी- 1, 2 व 3, आर एम टी- 1 व 143, राजेन्द्र क्रांति, को- 1 और पूसा कसूरी आदि प्रमुख है| किस्मों की अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- मेथी की उन्नत किस्में, जानिए उनकी विशेषताएं और पैदावार

मेथी की जैविक खेती के लिए बीज की मात्रा

मेथी की जैविक खेती हेतु बीज दर प्रति हेक्टेयर 20 से 25 किलोग्राम उचित मानी गई है| बुवाई के समय और खेत की परिस्थितियों तथा बुवाई की विधि के अनुसार बीज दर कम या ज्यादा रख सकते है|

मेथी की जैविक खेती के लिए बुवाई का समय

मेथी की फसल से अच्छी उपज के लिए अक्टूबर के मध्य से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक बुआई का उपयुक्त समय माना गया है| देर से बुआई करने पर कीटों एवं रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे उपज कम हो जाती है|

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मेथी की जैविक खेती के लिए बीज उपचार

मेथी की जैविक खेती हेतु बीजों को ट्राइकोडर्मा विरिडी 8 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें और प्रत्येक बीज पर दवा का लेप सुनिश्चित करें|

मेथी की जैविक खेती के लिए बुवाई की विधि

हमारे देश में मेथी को बहुत से क्षेत्रों में छिटकवा विधि से भी उगाया जाता है| परन्तु इसकी खेती से अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए कतार विधि अच्छी मानी गई है| बीज की गहराई 5 सेंटीमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए| अंकुरण के लिए बुआई के समय मिटटी में पर्याप्त नमी आवश्यक है| कतार से कतार के बीच 30 सेंटीमीटर तथा कतार में पौधे से पौधे के बीच 10 सेंटीमीटर की दुरी उचित रहती है|

मेथी की जैविक फसल में पोषक तत्व प्रबंधन

मेथी की फसल से अच्छी उपज के लिए 40 किलोग्राम नत्रजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस तथा 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है| इन सब की पूर्ति के लिए  बुवाई से 21 दिन पूर्व गोबर की खाद 15 से 20 टन प्रति हेक्टर खेत में मिलावें साथ में राईजोबियम 500 ग्राम प्रति हेक्टर और फॉस्फोबेक्ट्रीन शाकाणु (पीएसबी) से बीज उपचारित करके बोयें|

यदि बीजोपचार संभव नहीं हो तो 20 से 25 टन गोबर की सड़ी हुई खाद बुवाई से 21 दिन पूर्व खेत में मिलावें| पौधों की सजीवता बढ़ाने के लिए बी डी- 501 का 1 ग्राम प्रति 13 लीटर पानी के घोल से छिड़काव 20 दिन बाद करें|

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मेथी की जैविक फसल में सिंचाई प्रबंधन

इसकी जैविक खेती में पलेवा करके बीज बुवाई के बाद आवश्यकतानुसार 15 से 20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिये| खेत में पानी निकासी का उचित प्रबंध बना के रखें| अच्छी जल धारण क्षमता वाली मिटटी में 4 से 5 सिंचाई की आवश्यकता पडती है|

मेथी की जैविक खेती में निराई-गुड़ाई

खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 30 दिन बाद निराई-गुड़ाई कर पौधों की छटनी कर देनी चाहिये| आवश्यकता हो तो एक छटनी और 10 से 15 दिन बाद करके 50 दिन बाद दूसरी निराई-गुड़ाई करें| खरपतवार नियंत्रण हेतु मेथी की जैविक खेती में किसी भी प्रकार के रसायन को काम में नहीं लेवें|

मेथी की जैविक फसल की देखभाल

मेथी में मुख्य रूप से मोयला कीट व छाछ्या व तुलासिता नामक बीमारियों का प्रकोप होता है| इनकी रोकथाम के लिए बुवाई के 60 व 75 दिन के बाद नीम आधारित घोल (अजेडिरेक्टिन की मात्रा 2 मिलीलीटर प्रति लीटर) पानी के साथ मिलाकर छिड़काव करें| आवश्यकता होने पर 15 दिन बाद पुनः छिड़काव दोहराया जा सकता है|

चूर्णी फफूंद से संरक्षण हेतु बी डी- 501 का 1 ग्राम प्रति 13 लीटर पानी के घोल से छिड़काव (प्रथम रोग दिखने पर, द्वितीय एवं तृतीय 15 दिन अन्तराल पर ) का प्रयोग करें| माहू से संरक्षण हेतु नीम का तेल 10 मिलीलीटर लीटर प्रति 1 लीटर पानी के घोल से छिड़काव (प्रथम कीट प्रकोप दिखने पर एवं द्वितीय 15 दिन के अन्तराल पर) का प्रयोग करें|

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मेथी की जैविक फसल की कटाई

अक्टुबर में बोई गई फसल से पत्तियों की पांच व नवम्बर में बोई गई फसल से पत्तियों की चार कटाई लेनी चाहिए| उसके बाद फसल को बीज के लिए छोड़ देना चाहिये अन्यथा बीज नही बनेगा| पत्तियों की पहली कटाई बुआई के 30 दिन बाद करें फिर 15 दिन के अन्तराल पर कटाई करते रहे|

दाने के लिए उगाई गई मेथी की जैविक फसल के पौधों के ऊपर की पत्तियाँ पीली होने पर बीज के लिए कटाई करें| फल पूरी तरह सूखने पर बीज निकाल कर एवं सूखा कर साफ कर लें तथा भण्डारण करना चाहिए|

मेथी की जैविक खेती से पैदावार

मेथी की जैविक खेती से उपज अनेक कारकों पर निर्भर करती है| लेकिन उपरोक्त उन्नत तकनीक से खेती करने पर हरी पत्ती के लिए उगाई गई फसल से 80 से 100 क्विंटल हरी पत्तियाँ और 6 से 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दाने की उपज प्राप्त होती है और दाने या बीज के लिए उगाई गई फसल से 17 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है| प्रमाणित बीज के लिए किस्मों के बीच 25 मीटर की दूरी रखनी चाहिए|

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सरसों फसल में समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आई पी एम) कैसे करें

May 20, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

सरसों वर्गीय फसल हमारे देश की तिलहन अर्थव्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाती है| इन फसलों की बढ़ोतरी का सीधा असर दुर्लभ विदेशी मुद्रा की बचत में होता है| इन फसलों में तोरिया, पीली व भूरी सरसों, गोभी सरसों, कर्ण राई, राया (भारतीय सरसों) व तारामीरा हैं| सरसों का तेल स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है| सरसों की खेती अधिकतर वर्षा सिंचित नमी अथवा सीमित सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में की जाती है| इन फसलों की पैदावार को बढ़ाने तथा उसको टिकाऊ बनाने के मार्ग में एक प्रमुख समस्या नाशीजीवों का प्रकोप है|

जो कुछ हद तक इन फसलों के अस्थिर उत्पादन के लिए उत्तरदायी है| ये नाशीजीव सरसों में 10 से 96 प्रतिशत तक उत्पादन में हानि पहुँचाते हैं| इन नाशीजीव की समय से रोकथाम कर के कृषक सरसों की फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते है| इस लेख में सरसों फसल में समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) कैसे करें की जानकारी का उल्लेख है|

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सरसों फसल के प्रमुख नाशीजीव

चेपा/माहू- यह कीट छोटा, कोमल, सफेद-हरे रंग का होता है| इस कीट के शिशु और प्रौढ़ दोनों सरसों फसल में पौधों के विभिन्न भागों से रस चूसते हैं| यह प्रायः दिसम्बर के अन्त से लेकर फरवरी के अन्त तक सक्रिय रहता है| इस कीट की आर्थिक हानि की सीमा 10 से 20 माहू मध्य तना के 10 सेंटीमीटर भाग में है| इससे उपज में लगभग 25 से 40 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है|

चितकबरा कीट- इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों ही सरसों फसल को पौध की अवस्था से लेकर, वनस्पति, फली बनने और पकने अवस्था में रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं और बाद में मॅड़ाई के लिए रखे गये सरसों पर भी आक्रमण करते हैं| जिससे दाने सिकुड़ जाते हैं तथा उत्पादन व तेल की मात्रा में भारी कमी हो सकती है|

काले धब्बों का रोग/आल्टरनेरिया पर्ण अंगमारी- यह रोग बड़े पैमाने पर सरसों फसल में लगता है| इसका प्रकोप पत्तियों, तनों, फलियों इत्यादि पर हल्के भूरे रंग के चक्रीय धब्बों के रूप मे प्रदर्शित होता है और बाद में ये धब्बे हल्के काले रंग के बडे आकार के हो जाते है| इससे बीज की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है| जिस कारण इसकी अकुंरण में कमी एवं बाजार भाव कम मिलता है| गीला व गर्म मौसम या अदल-बदल के वर्षा व धूप तथा तेज हवाएँ इस रोग को बढ़ाती हैं|

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सफेद रतुआ- यह रोग सर्वप्रथम पत्तियों पर आता है| जब तना तथा पुष्पक्रमों में दिखाई पड़ता है, इससे सरसों फसल के पुष्पक्रम फूल कर विकृत आकार के हो जाते हैं| जिससे उत्पादन में 17 से 34 प्रतिशत तक कमी आती है| यदि हवा के साथ तेज वर्षा होती है, तो यह रोग तीव्र गति से फैलता है|

स्कलेरोटिनिया विगलन- इस रोग मे सरसों फसल के पत्तों व तनों पर लंबे चिपचिपे धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में कवक की वृद्धि से ढक जाते हैं| इस रोग का प्रकोप फूल आने की अवस्था से शुरू होता है| जब मौसम ठण्डा व नम होता है, तो इस रोग की उग्रता बढ़ती है| इस रोग से सूखे पौधों के तनों में काले रंग वाले पिंड बन जाते हैं|

चूर्णिल आसिता- प्रारंभ में यह रोग सरसों फसल के पौधों के तनों, पत्तियों एवं फलों पर श्वेत, गोल आटे जैसे चूर्णित धब्बों के रूप में दिखाई देता है| तापमान की वृद्धि के साथ-साथ ये धब्बे आकार में बड़े हो जाते हैं|

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सरसों फसल में लाभप्रद जीव

काक्सीनेला- इस के शिशु दुबले एवं इनके वक्षांग एवं पैर अच्छी तरह से विकसित होते हैं| इनके प्रौढ़ चमकीले, पीले, नारंगी या गहरे लाल रंग के होते है|

क्रायसोपरला- प्रौढ़ कीट के लेसविंग हल्के हरे रंग के 12 से 20 मिलीमीटर लम्बे होते हैं| इनके पंख पारदर्शी एवं हरे पीले रंग के होते हैं और शरीर कोमल होता है|

ट्राइकोडर्मा- ट्राइकोडर्मा एक महत्वपूर्ण जैविक नियंत्रण कवक है| इनका समूह (कालोनी) सामान्यतः हरे रंग का होता है| ट्राइकोडर्मा कवक सरसों के विभिन्न रोगों जैसे सफेद रोली, एवं स्कलेरोटिनिया गलन रोग की रोकथाम में प्रयोग किया जाता है|

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सरसों फसल में समेकित नाशीजीव प्रबंधन

सरसों फसल को नाशीजीवों के प्रकोप से बचने और इनसे होने वाली हानि को आर्थिक परिसीमा से नीचे रखने हेतु समेकित नाशीजीव प्रबन्धन अपनायें| इसके अन्तर्गत फसल की अवस्थानुसार निम्न उपाय करें, जैसे-

बिजाई पूर्व प्रबंधन-

ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई- ग्रीष्म ऋतु में मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें|

पानी की निकासी- बोये जाने वाले खेत को अच्छी तरह तैयार करके, पानी की निकासी का उचित प्रबन्ध करें|

फसल के अवशेषों को नष्ट करना- पूर्व की फसल के अवशेषों और रोग ग्रसित पौधों को एकत्र कर जला दे एवं खेत को साफ-सुथरा रखे|

समुचित फसल चक्र- नाशीजीवों की निरन्तरता को समाप्त करने के लिए उपयुक्त फसल चक्र अपनायें|

सन्तुलित उर्वरक- सरसों में अनुमोदित किए गए सन्तुलित उर्वरकों का प्रयोग करें| फसलों में अधिक मात्रा में नाइट्रोजन का प्रयोग करने से चूषक कीटों (माहू इत्यादि) व बिमारियों का आक्रमण बढ़ जाता है| 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक सल्फेट + सल्फर (स्थान विशेष) का मिटटी में अनुप्रयोग करें|

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बिजाई के समय प्रबंधन-

उचित समय पर बिजाई- सरसों की सही समय (01 अक्टूबर से 31 अक्टूबर) के दौरान बुवाई करें|

प्रमाणित बीज- सरसों फसल क्षेत्र के लिए स्वीकृत, उन्नत, स्वस्थ रोग रहित प्रमाणित बीजों का प्रयोग करें|

भूमि उपचार- भूमि में ट्राइकोडरमा कवक उत्पाद 2.5 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर को 50 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर में मिलाकर, सरसों की बुवाई से पूर्व अवश्य मिलाना चाहिए| जिससे बीमारियों का प्रकोप कम होता है|

बीजोपचार- ट्राईकोडरमा आधारित जैविक उत्पादक द्वारा 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से या ताजा बनाये हुये लहसुन सत् से 2 प्रतिशत की दर से बीजोपचार करें|

उचित दूरी- बीज की सिफारिश से ज्यादा मात्रा का प्रयोग न करे व कतार से कतार की व पौधे से पौधे की उचित दूरी बनाये रखें|

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वानस्पतिक अवस्था में प्रबंधन-

1. सरसों फसल के छोटे पौधों में सिंचाई करने से पौधे चितकबरा कीट के आक्रमण को सहन कर पाने में काफी सक्षम हो जाते हैं|

2. सरसों फसल में माहू के प्रकोप से प्रभावित टहनियों को प्रारम्भिक अवस्था में ही तोड़कर नष्ट कर दें|

3. माहू के प्राकृतिक शत्रु (परभक्षी दुश्मन) कीट जैसे क्राइसोपा, सिरफिड, काक्सीनेला आदि की कीटनाशकों से रक्षा करे|

4. सरसों फसल के माहू और पर्यावरण संतुलित प्रबंधन के लिए 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से डाइमिथोएट या आक्सीडेमेटोन मिथाईल का छिडकाव करे तथा तदुपरांत 5000 भृंग प्रति हेक्टेयर की दर से काक्सीनेला सेप्टेमपंक्टाटा को छोड़ें|

5. सरसों फसल में माहू के नियंत्रण के लिए परभक्षी कीट क्राइसोपरला के 45000 से 50000 शिशु प्रति हेक्टेयर की दर से पूरे खेत में छोड़ें|

6. सरसों की फसल में आवश्यकता से अधिक पौधों का विरलीकरण अवश्य करें, कीटों व रोगों से ग्रसित पौधों को खेत से निकालकर नष्ट करें|

7. सरसों फसल की आवश्यकतानुसार 2 से 3 सिंचाई जैसे पहली सिंचाई फूल आते समय, दूसरी सिंचाई फली बनते समय तथा तीसरी सिंचाई दाना भरते समय करें|

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फूल व फली अवस्था में प्रबंधन-

1. सरसों फसल के खेत का रोजाना भ्रमण करें व नाशीजीव दिखने पर नियंत्रण के उपाय तुरंत अपनाए|

2. ताजा बनाये हुये लहसुन सत् से 2 प्रतिशत या ट्राइकोडरमा कवक उत्पाद 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिडकाव करें या कार्बन्डाजिम 0.1 प्रतिशत + मैंकोजेब (गोभी वर्गीय फसलों में लेबल क्लेम है, जबकि सरसों में नहीं है) 0.2 प्रतिशत की दर से जरूरी होने पर पर्णीय छिड़काव या सफेद रतुआ के ज्यादा प्रकोप पर मैटालैक्सिल + मैन्कोजेब कवकनाशी का 2.5 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें|

3. सरसों फसल में स्कलरोटिनिया तना गलन रोग ग्रसित पौधे जो कि सामान्य पौधो से पहले पक जाते है, को पिंड (स्क्लरोशिया) बनने से पूर्व ही जड़ से उखाड़ कर बाहर निकाल दे और बाद में रोग ग्रसित अवशेषों को जला दे|

4. समय-समय पर सरसों के खेत से खरपतवार निकालते रहे व मधुमक्खियों को कीटनाशकों के नुकसान से बचाने के लिए कीटनाशकों का छिड़काव शाम के समय ही करें|

नाशीजीव सहनशील किस्में-

सफेद रतुआ- बायो वाई एस आर और जे एम- 1 प्रमुख है|

स्कलेरोटिनिया गलन- पूसा आदित्य, किरण, पूसा करिश्मा और आर एल एम- 619 प्रमुख है|

चुर्णिल असिता- पूसा सरसों- 26 प्रमुख है|

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