सब्जियों की कार्बनिक खेती

सब्जियों की कार्बनिक खेती कैसे करें, जानिए आधुनिक विधि

सब्जियों की कार्बनिक खेती फसल उत्पादन की वह पद्धति है, जिसमें रासायनिक उत्पादों जैसे रासायनिक उर्वरक, कीटनाशी, फफूंदनाशी, खरपतवारनाशी, वृद्धि नियामक आदि के प्रयोग को हतोत्साहित करते हैं तथा कार्बनिक पदार्थों जैसे- कार्बनिक खादें, जैव उर्वरक, हरी खाद, फार्म के उत्पाद, जैविक कीटनाशी और फफूंदनाशी व फसल चक्र आदि के प्रयोग पर ही निर्भर रहते हैं| सब्जियों की कार्बनिक खेती या अन्य फसल की खेती का मुख्य उद्देश्य भूमि, पौधों, पशुओं और मनुष्यों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए फसल की उत्पादकता बढ़ाना है|

सब्जियों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशी के अन्धाधुन्ध प्रयोग से भूमि की उर्वरता तथा मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव देखा गया है| कीटनाशी और फफूंदनाशी के अधिक छिड़काव से इनके हानिकारक अवशेष सब्जियों के माध्यम से मनुष्य के शरीर में बुरा प्रभाव डालते हैं, जिससे अनेक रोग तथा विकार पनप रहे हैं| अतः इनके स्थान पर सब्जियों की कार्बनिक खेती एक विकल्प है, जहाँ जैव कीटनाशी और फफूदनाशी का प्रयोग करके इनके हानिकारक दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है|

सम्पूर्ण रासायनिक उर्वरक का लगभग 10 प्रतिशत भाग अकेले सब्जियों में प्रयोग होता है| सब्जियों में प्रति वर्ष लगभग 12.5 लाख टन रासायनिक उर्वरक प्रयोग किए जा रहे हैं, जिसमें नत्रजन 5.3 लाख टन, फास्फेटिक उर्वरक 3.2 लाख टन और पोटाश उर्वरक का 4 लाख टन प्रयोग किया जा रहा है| इन रासायनिक खादों के प्रयोग से जमीन बंजर होती जा रही है| इसके अतिरिक्त, मिटटी उर्वरता में असंतुलन विशेषकर सल्फर, जिंक तथा मैग्नीशियन की कमी, मिटटी सूक्ष्म जीवों पर हानिकारक प्रभाव, मिटटी जल का प्रदूषित होना एवं मिटटी का लवणीय या क्षारीय होना आदि रासायनिक उर्वरकों के दुष्परिणाम हैं|

इसलिए सब्जियों की कार्बनिक अपनाकर इन हानिकारक रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है| अध्ययनों से पता चला है, कि कार्बनिक खेती अपनाने से शुरवाती 2 से 3 वर्षों में रासायनिक खेती की अपेक्षा कम उपज प्राप्त होती है, लेकिन आगे के वर्षों में अधिक और अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है|

एक विदेशी अध्ययन से निष्कर्ष निकला है, कि कार्बनिक खाद जैसे गोबर की खाद का लगातार 20 वर्षों तक प्रयोग करने से मिटटी में इतने कार्बनिक पदार्थ जमा हो जाते हैं, कि अगले 100 सालों तक मिटटी में कार्बनिक तत्व की पर्याप्त मात्रा पौधों के लिए उपलब्ध रहती है| इसलिए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए कार्बनिक खादें जैसे गोबर की खाद, चीनी मिल की खाद, कम्पोस्ट इत्यादि की 15 से 20 टन मात्रा प्रति हेक्टेयर और हरी खाद को 3 वर्षों में कम से कम एक बार खेत में पलटना चाहिए|

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खेती के मुख्य घटक

प्राथमिक स्रोत-

कार्बन खादें- गोबर की खाद, कम्पोस्ट, मुर्गी की खाद

वानस्पतिक अवशिष्ट- खलियाँ, पुआल, भूसा, फार्म अवशिष्ट

बायोडायनेमिक- गोमूत्र एवं सींग से तैयार खाद

जैव उर्वरक- राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पाइरिलम, फास्फेट को घुलनशील बनाने वाले सूक्ष्म जीव (पी एस एम), न्यूट्रिलिंक (वैम)

जानवरों के अवशिष्ट- हड्डी का चूरा, मछली की खाद, वर्मीकम्पोस्ट (केंचुए की खाद) कीड़ों तथा रोगों का जैविक नियंत्रण- ट्राइकोग्रामा, एन पी सी, ट्राइकोडर्मा, फेरोमोन, नीम उत्पाद आदि|

पूरक या द्वितीयक स्रोत-

1. चीनी मिल की खाद (प्रेशमड)

2. सीवर की खाद (डाइजेस्टेड स्लज)

3. कार्पेट अवशिष्ट

सस्य तकनीक-

1. फसल चक्र

2. मृदा सूर्य ताप शोधन (भूमि का सोलेराइजेशन)

3. एग्रोनेट का प्रयोग

4. ट्रैप क्राप (आकर्षक फसलें)

5. गर्मी की गहरी जुताई आदि|

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प्रतिबन्धित एवं संस्तुति पोषक पदार्थ

संस्तुति-

राक फास्फेट, फेल्डस्पर, डोलोमाइट, राक पोटाश, मछली का चूरा, लकड़ी की राख, चिप्सम, चूना पत्थर वाला चाक, हड्डी, खुर एवं और की खाद आदि|

सीमित मात्रा में प्रयोग के लिए-

चमड़े की खाद, सुहागा (बोरेक्स), इप्सम, पोटैशियम सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट आदि|

प्रतिबंधित-

खून, मांस, बुझा चूना, यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशी एवं फफूदनाशी आदि|

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संस्तुति कीटनाशी और फफूंदनाशी

वानस्पतिक उत्पाद-

निकोटिन सल्फेट- यह तम्बाकू की पत्तियों से तैयार कीटनाशी है, जो कि सब्जियों में थ्रिप्स, माँहू (एफिड), मकड़ी और अन्य चूसने वाले कीड़ों के नियंत्रण के लिए उपयुक्त है|

सबाडिल्ला- यह सबाडिल्ला नाम लिली के बीज से तैयार कीटनाशी है, जो कि सब्जियों में थ्रिप्स, माँहू (एफिड), मकड़ी तथा अन्य चूसने वाले कीड़ों के नियंत्रण के लिए उपयुक्त है|

रोटीनोन- यह कीटनाशी दो विभिन्न दलहनी फसलों की जड़ों से तैयार किया जाता है| यह विभिन्न सब्जियों में पत्ती खाने वाली सूड़ी एफिड और थ्रिप्स की रोकथाम के लिए उपयोगी है|

नीम उत्पाद- नीम के बीज से तैयार किया गया कीटनाशी सब्जियों में बहुत से कीटों के नियंत्रण के लिए प्रभावी पाया गया है और मनुष्य तथा लाभकारी मधुमक्खियों के लिए सुरक्षित है|

पाईरिथर्म- यह गुलदावदी के फूलों से तैयार किया गया रसायन है, जिसका बहुतायत प्रयोग कीड़ों के नियंत्रण में किया जाता है|

खनिज आधारित कीटनाशी- सल्फर, चूना सल्फर

जैव आधारित कीट और फफूंदनाशी- ट्राइकोग्रामा, ट्राइकोडर्मा, एन पी वी, बैसीलस थुन्जेनेसिस

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श्रेणीकरण और प्रमाणीकरण

कार्बनिक खाद्य का श्रेणीकरण और प्रमाणीकरण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कार्बनिक खाद्य के मापदण्डों के अनुसार सब्जियों की शस्य तकनीकी अपनाई जाती है| भारत में कार्बनिक खाद्य के प्रमाणीकरण (डेमेटर सर्टीफिकेट) के लिए मापदंड एपेडा, नई दिल्ली के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है| भारत में इसके प्रमाणीकरण के लिए एपेडा, आइरिस कार्बनिक उत्पादक एवं किसान संगठन से सहयोग लेता है|

जैव उर्वरक का प्रयोग

जैव उर्वरक उपयुक्त वाहक में तैयार किया गया सूक्ष्म जीव होता जो कि जैविक नत्रजन का स्थिरीकरण करके या अघुलनशील जटिल फास्फोरस को घुलनशील बनाकर या फिर वृद्धि नियामक, विटामिन तथा अन्य वृद्धि कारकों को उत्पन्न करके फसल की उत्पादकता को बढ़ा देते हैं| सब्जियों में एजोटोबैक्टर, एजोस्पाइरिलम और फास्फेट को घुलनशील बनाने वाले जैव उर्वरकों के प्रयोग से सब्जियों की पैदावार एवं गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ नत्रजन तथा फासफोरसधारी उर्वरकों की भी बचत की जा सकती है|

एजोटोवैक्टर और एजोस्पाइरिलम-

ये जीवाणु जनित जैव उर्वरक स्वतंत्र रूप से नत्रजन का 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर स्थिरीकरण करते हैं| इसके अतिरिक्त ये जैव उर्वरक वृद्धि नियामक जैसे आक्जिन और जिबरेलिन तथा विटामिन- बी (बायोटिन, फोलिक एसिड आदि) भी उत्पन्न करते हैं, जो सब्जियों की कार्बनिक खेती हेतु पौधे की वृद्धि एवं विकास के लिए लाभप्रद होते है|

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फास्फोरस को घुलनशील बनाने वाले सूक्ष्म जीव (पी एस एम या पी एस बी)-

मिटटी में कुल फास्फोरस का लगभग 95 से 99 प्रतिशत फास्फोरस अघुलनशील होता है, जो कि पौधों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है| ये सूक्ष्म जीव जो कि जीवाणु या फफूंद होते हैं, अघुलनशील फास्फोरस को कार्बनिक अम्ल उत्पन्न करके घुलनशील बना देते हैं, जिससे ये पौधों द्वारा अवशोषण कर लिया जाता है|

ये सूक्ष्म जीव लगभग 25 प्रतिशत अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील बना देते हैं| जिससे रासायनिक उर्वरक की काफी बचत हो जाती है| बैसीलस पालीमिबसा, एसपरजिलस अवमेरी, पेनिसिलियम डिजीटेटम आदि सूक्ष्म जीव अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील बनाकर फास्फोरस की उपलब्धता को बढ़ा देते हैं|

न्यूट्रिलिंक (वैम)-

वैम फफूंद जन्य जैव उर्वरक होते हैं, जो कि पौधों की जड़ों पर समूह बनाकर रहते हैं| ये फफूंद पौधों को पोषक तत्वों और जल की उपलब्धता तथा मिटटी की जल धारण क्षमता को बढ़ाते हैं| वैम जड़ से संबंधित रोगों और निमैटोड के नियंत्रण के लिए बहुत प्रभावकारी पाया गया है| इसका प्रयोग मुख्यतः सब्जियों की पौघशाला में टीकाकरण के लिए किया जाता है| 50 ग्राम जैव उर्वरक प्रति एक वर्ग मीटर पौधशाला के शोधन के लिए पर्याप्त होता है|

वैम को मिटटी में छिड़कने से पूर्व उसे मिट्टी, सड़ी गोबर की खाद और बालू के बराबर मिश्रण (1:1:1) में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए| वैम के प्रयोग से फास्फोरस, जिंक एवं कापर की उपलब्धता बढ़ जाती है| इसके प्रयोग से सब्जियों की कार्बनिक खेती में 25 से 50 प्रतिशत फास्फेटिक उर्वरक की बचत की जा सकती है|

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जैव उर्वरकों की प्रयोग विधि-

बीजक शोधन द्वारा- जैविक खाद की 200 ग्राम मात्रा 10 से 12 किलोग्राम बीज शोधन के लिए पर्याप्त होती है| 200 ग्राम जैविक खाद को 400 मिलीलीटर पानी में मिलाकर अच्छी तरह मिश्रित करके बीज को इसमें डाल देते हैं| 10 से 15 मिनट बाद बीज को निकालकर 15 मिनट के लिए छाया में सुखाकर बीज की बुवाई कर दी जाती है| ध्यान रहे कि जैविक खाद की एक पतली परत भली-भाँति प्रत्येक बीज के ऊपर सुनिश्चित हो| सब्जियों की कार्बनिक खेती हेतु मटर, भिन्डी, राजमा और कद्दू वर्गीय सब्जियों के बीज इस विधि से शोधित किए जाते हैं|

पौधशोधन द्वारा- टमाटर, मिर्च, प्याज, फूलगोभी, पत्तागोभी, आदि की पौध सब्जियों की कार्बनिक खेती हेतु इस विधि द्वारा शोधित की जाती हैं| इस विधि में में एक किलोग्राम जैव खाद कल्चर को लगभग 10 से 12 लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार किया जाता है| इस प्रकार तैयार घोल एक एकड़ की पौध के शोधन के लिए पर्याप्त होता है| तैयार किए गए घोल में पौध की जड़ को 15 से 20 मिनट तक डुबोने के बाद पौध का रोपण किया जाता है|

भूमिशोधन द्वारा- सब्जियों की कार्बनिक खेती हेतु भूमिशोधन के लिए 2 से 3 किलोग्राम जैव उर्वरक को 40 से 60 किलोग्राम बारीक भुरभुरी मिट्टी या कम्पोस्ट के मिलाकर तैयार किया जाता है| इस प्रकार तैयार उर्वरक एक एकड़ में छिड़कने के लिए पर्याप्त होती है| जैविक खाद को बीज की बुवाई या पौध की रोपाई के 24 घंटे पूर्व से लेकर बीज की बुवाई या पौध की रोपाई करते समय तक प्रयोग किया जा सकता है|

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कार्बनिक खेती से लाभ

उपभोक्ता की माँग में वृद्धि- इस समय सम्पूर्ण विश्व में कार्बनिक खाद्य पदार्थों की माँग काफी बढ़ गयी है| वर्तमान में कार्बनिक पद्धति से उगाए गए खाद्य पदार्थों की माँग लगभग 70000 करोड़ रुपए है, जो कि प्रतिवर्ष 20 से 25 प्रतिशत की से बढ़ रही है| कार्बनिक खाद्य पदार्थों की बाजार में कीमत परंपरागत तरीके से उगाए गए उत्पादों की अपेक्षा 10 से 50 प्रतिशत ज्यादा होती है| इस प्रकार सब्जियों की कार्बनिक खेती मिटटी, मनुष्यों और पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होने के अलावा इसके उत्पादों के बाजार मूल्य भी अधिक प्राप्त किए जा सकते हैं|

गुणवता में सुधार- अध्ययनों से पता चला है, कि कार्बनिक खादें और जैव उर्वरक के प्रयोग से सब्जियों में विटामिन- ए व सी और भंडारण क्षमता में वृद्धि हुई है|

उत्पादन में वृद्धि- रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक और कार्बनिक खादं प्रयोग करने से सब्जियों के उत्पादन में 10 से 50 प्रतिशत तक वृद्धि ऑकी गई है|

रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशी में कटौती- कार्बनिक खाद, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट (केंचुए की खाद), जैव उर्वरक, जैविक कीटनाशी आदि के प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशियों की मात्रा में 25 से 50 प्रतिशत तक कमी लायी जा सकती है|

मिटटी की दशा में सुधार- सब्जियों की कार्बनिक या अन्य खेती के माध्यम से मिटटी की भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में सुधार लाया जा सकता है, तथा अधिक उत्पादन के साथ मिटटी की उर्वरता को सत्त बनाए रखा जा सकता है|

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मिटटी जल प्रदूषण से बचाव- कीटनाशी, खरपतवारनाशी और रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिटटी जल प्रदूषित होता है| कार्बनिक कृषि अपनाकर मृदाजल को प्रदूषण से बचाया जा सकता है|

पशुओं और मनुष्यों के स्वास्थ्य की रक्षा- कीटनाशी तथा रासायनिक उर्वरकों के अन्धाधुन्ध प्रयोग से पशुओं और मनुष्यों में हानिकारक रसायनों का प्रवेश हो रहा है| कार्बनिक खेती अपनाकर इन हानिकारक तत्वों के प्रवेश को रोका जा सकता है एवं वातावरण तथा मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकती है|

सारांश

वर्तमान में विश्व में केवल 1.4 प्रतिशत उत्पादक ही कार्बनिक खेती अपना रहे हैं, जो कि सम्पूर्ण कृषि क्षेत्र का मात्र 1.2 प्रतिशत भाग है| सब्जियों की कार्बनिक या अन्य खेती के शुरूआती वर्षों में पैदावार कुछ कम हो सकती है, लेकिन भविष्य में लाभप्रद और अधिक उत्पादकता निरन्तर सुनिश्चित की जा सकती है| वर्तमान परिस्थिति में कार्बनिक खेती के व्यावसायीकरण की सम्भावना कम ही दिखाई देती है|

लेकिन यदि 2 प्रतिशत किसान भी इस तकनीक को अपनाते हैं या प्रत्येक किसान अपने कृषि योग्य भूमि का कम से कम 5 प्रतिशत क्षेत्र अपने परिवार के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर कार्बनिक खेती के लिए समर्पित करता है, तो वे कम से कम अपने परिवार के भविष्य के प्रति न्याय करेंगे| क्योंकि उपरोक्त बातों को हम दोहराएँगे नही की रासायनिक खेती के मानव और पशुओं जीवन पर क्या-क्या दुष्परिणाम होते है|

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