डॉ भीमराव अंबेडकर

डॉ भीमराव अंबेडकर का जीवन परिचय ! Biography of B. R. Ambedkar in Hindi

डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर (Dr. B. R. Ambedkar) जिन्हें उनके लाखों प्रशंसक और अनुयायी स्नेहपूर्वक ‘बाबासाहेब’ नाम से पुकारते हैं| उनका जन्म महु, मध्य प्रदेश में 14 अप्रैल, 1891 को हुआ| उनके पिता का नाम रामजी मालोजी संकपाल और माता का भीम बाई था| वे महार समुदाय एक हिन्दू अछूत जाति महार समुदाय के थे| भाई बहनों में सबसे छोटे होने के कारण परिवार के सभी लोग उनसे बड़ा स्नेह रखते थे|

उनके पिता रामजी बड़े उद्यमी, धार्मिक और सज्जन पुरुष थे और माता भीमबाई एक स्वावलंबी और कर्तव्यपरायण महिला थीं| गरीब होते हुए भी उनके परिवार को पडोसी आदर की दृष्टि से देखते थे| सेना में सूबेदार मेजर, रामजी कबीर पंथी भगत थे और सेना के एक केंप से दूसरे केंप में स्थानान्तिरत होते रहते थे|

अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद, रामजी ने अपने बच्चों का सावधानी और प्यार से पालन-पोषण किया और वह उन्हें भक्तिपूर्ण गीत तथा रामायण और महाभारत जैसे काव्य सुनाया करते थे| घर में इस प्रकार के शुद्ध और धार्मिक वातावरण का ही शायद युवा भीमराव के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिसके परिणाम स्वरूप यथा समय उनमें स्वार्थ रहित सेवा, बलिदान, भातृभाव, दृढ़ता और लगन जैसे गुण फलीभूत हुए|

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प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा

सैनिक सेवा से सेवा-निवृत्त होने के बाद, रामजी कुछ समय दापोली तथा सतारा में रहे और अन्त में बम्बई में बस गए| भीमराव ने, जिन्हें पांच वर्ष की आयु में प्राथमिक पाठशाला भेजा गया था, अपनी प्राथमिक शिक्षा सतारा से पूरी की और उच्च शिक्षा जारी रखी| एक अछूत समुदाय से संबंधित बालक होने के नाते, उन्हें सभी प्रकार के कटों, अपमानों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा| उन्हें आम सीत से पानी पीने की अनुमति नहीं थी|

उन्हें फारसी का अध्ययन करने पर मजबूर होना पड़ा था क्योंकि संस्कृत के अध्यापक ने उन्हें संस्कृत पढ़ाने से मना कर दिया था| हालांकि उन्होंने बाद में संस्कृत भाषा सीखी वातावरण दूषित होने के भय से न तो उनकी कापियों की जांच की जाती थी और न ही उनसे कोई प्रश्न ही पूछे जाते थे| इन सभी चुनौतियों से विचलित न होकर वह बम्बई में आए और ऐलफीनस्टोन हाई स्कूल में प्रवेश ले लिया| दुर्भाग्यवश, वहां भी उन पर “मुझे मत छूना” वाली नीतियां लागू की गई|

वर्ष 1955 में, उस समय हिन्दू समाज में व्याप्त परम्परा के अनुसार, भीमराव जिनकी उस समय आयु केवल 14 वर्ष थी, का 9 वर्ष की लड़की रामाबाई से जो कि महार समुदाय से थी, विवाह कर दिया गया| उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन 1938 में रामावाई की मृत्यु हो गई| वर्ष 1948 में भीमराव ने बम्बई के सारस्वत ब्राहमण की लड़की डा. शारदा कबीर (बाद का नाम सवित) से दूसरी शादी की|

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वर्ष 1907 में, भीमराव ने मैट्रिक की परीक्षा पास की “महार लड़के” की इसे एक शानदार सफलता मानते हुए| इस समुदाय ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया और इसके सदस्यों में से एक ने उन्हें “कि लाइफ ऑफ गौतम बुद्ध” की एक प्रति मेंट की| इस पुस्तक से भीमराव के जीवन पर भारी प्रभाव पड़ा जैसा कि उनके जीवन में बाद में हुई घटनाओं से पता चलता है

भीमराव की शिक्षा में रुचि और कठिन परिश्रम के प्रति उनकी ईमानदारी और उत्साह को देखते हुए, बड़ौदा के महाराजा, सयाजी राव गायकवाड़ ने न केवल उनके स्नातक तक अध्ययन के दौरान 25 रुपए प्रतिमाह छात्रवृति मंजूर की बल्कि उने स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद अपने राज्य में नौकरी करने के लिए भी आमंत्रित किया|

हालांकि उन्होंने वहां नौकरी शुरु की, लेकिन वह खुश नहीं थे क्योंकि सामाजिक चुनौतियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और उनके लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण था| तब महाराजा ने भीमराव को गायकवाड़ छात्र के रूप में कोलम्बिया विश्वविद्यालय में इस शर्त पर भेजा कि वापसी पर वह इस राज्य में नौकरी करेंगे|

कोलम्बिया में, भीमराव जाति के कलंक से मुक्त थे और वह समानता के आधार पर इधर-उधर आ जा सकते थे| इस विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. सेलिगमैन उनके अध्यापक थे| शैक्षिक माहौल मुक्त वातावरण और पुस्तकों के प्रति लगाव ने भीमराव के मस्तिष्क स्तर को विशाल बना दिया| इस समय के दौरान वह पके राष्ट्रवादी, लाला लाजपतराय के सम्पर्क में आए, जो उस समय अमरीका में निर्वासित जीवन बिता रहे थे|

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वे दोनों भारत में स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में चर्चा किया करते थे| इस तरह भीमराव ने विद्यार्थी होते हुए देशभक्ति के विचारों और आदर्श तथा पश्चिमी उदारवादी लोकतांत्रिक विचारों को आत्मसात कर लिया था जिन्होंने उसे सशक्त राष्ट्रवादी और मानवीय अधिकारों तथा प्रतिष्ठा का प्रबल समर्थक बना दिया|

वर्ष 1915 में उन्होंने अपने शोष विषय “एनसिएंट इंडिया कॉमर्स” के लिए एम. ए. (इकोनॉमिक्स) की डिग्री प्राप्त की| उससे अगले वर्ष उन्होंने एन्थ्रोपोलॉजी सेमिनार में “दि कास्ट्स इन इंडिया”, “देअर मेकेनिज्म”, “जेनेसिस एण्ड डेवलपमेंट” शीर्षक से समाचार पत्र पढ़ा| इस समाचार पत्र में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया था कि संजातीय विवाह ही जातियों का सार था| उन्होंने यह कहा कि “एक जाति’ “एक संलग्र श्रेणी है और यह मनु के पूर्व भी विद्यमान थी|” वर्ष 1916 में उन्हें उनके शोष विषय “नेशनल डिविडेंड फॉर इंडिया” एक हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी” के लिए पी. एच. डी. की उपाधि प्रदान की गई|

उसी वर्ष अम्बेडकर ने “लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एण्ड पोलिटिकल साईस” में प्रवेश ले लिया था| उन्होंने प्रसिद्ध “प्रेज इन फार ला” में भी प्रवेश ले लिया| यद्यपि वह अपना अध्ययन जारी नहीं रख सके क्योंकि महाराजा ने उनको वापस बुला लिया और उन्हें राज्य के वित मंत्री के पद पर तैयार करने की धारणा से अपना सचिव नियुक्त कर दिया था| लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था|

अम्बेडकर में इस बात के लिए व्याकुलता और निराशा थी कि उनके शैक्षिक, विशिष्टता और विद्धता तथा राज्य में उच्च पद पर आसीन होने के बावजूद भी भारत में सामाजिक परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं आया| उनके अपने अधीनस्थ कर्मचारी उनसे अच्छा व्यवहार नहीं करते थे|

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हालाँकि डॉ अम्बेडकर ने यह बात महाराजा को बताई थी लेकिन उनके लिए कुछ नहीं किया जा सका फिर भी, महाराजा उन पर इतने दयालु थे कि डॉ भीमराव अम्बेडकर द्वारा विदेश से अपनी शिक्षा के बाद राज्य में नौकरी करने के लिए दिए गए अनुबन्ध-पत्र के बावजूद भी नौकरी के कुछ महीनों बाद ही उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया था|

एक वर्ष के संघर्ष के बाद डॉ भीमराव ने बम्बई के एक कालेज में राजनीतिक विज्ञान के एक प्रोफेसर के रूप में नौकरी शुरू कर दी| केवल पांच महीने पढ़ाने के बाद, वह अपने अध्ययन को जारी रखने के लिए लन्दन चले गए। उनके इस उदेश्य को पूरा करने में कोल्हापुर के प्रबुद्ध महाराजा ने उनकी सहायता की उन्होंने विधिवक्ता बनने के लिए ‘दि लन्दन स्कूल आफ इकनोमिक्स एण्ड पोलिटिकल साइंस’ और ‘प्रेज इन फार ला” दोनों में पुनः प्रवेश लिया|

उनके शोध विषय “प्रोविंशियल डिसेंट्रलाइजेशन आफ इम्पीरियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया” को लन्दन विश्वविद्यालय द्वारा एम एस सी (इकनोमिक्स) की उपाधि देने के लिए स्वीकार किया गया| वर्ष 1923 में जर्मनी में बोन विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें उनके शोध विषय “दी प्राब्लम ऑफ दी रुपी इट्स ओरिजिन एंड सॉल्यूशन” के लिए डाक्टर आफ साइंस (इकनोमिक्स) की उपाधि से सम्मानित किया गया|

अपने शिक्षा-संबंधी कार्यों में व्यस्त रहने के बावजूद, उनके मन में देश के सामाजिक दृष्टि से पददलित लोगों के प्रति तीव्र भावनाएं होने के कारण उन्होंने अस्पृश्य लोगों की दयनीय स्थिति एवं समस्याओं के बारे में भारत के विदेश मंत्री, श्री ई. एस. मांटेग्यू तथा श्री विट्ठल भाई पटेल से बातचीत के लिए समय निकाला|

वकील के रूप में

अनेक ख्यातिप्राप्त विदेशी विश्वविद्यालयों के क्रमिक शैक्षिक उपलब्धियां ग्रहण करने के पश्चात जून 1923 में डॉ भीमराव अम्बेडकर भारत लौटे तथा बम्बई न्यायपालिका के उच्च न्यायालय में वकालत आरंभ की उन्होंने वकालत इसलिए आरंभ की क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास था कि वे अस्पृश्य लोगों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति के लिए कार्य करने के अपने ध्येय को इसी स्वतंत्र व्यवसाय के माध्यम से पूरा कर सकते थे|

साथ ही, इससे उनकी व्यक्तिगत आजीविका भी सुनिश्चित होती थी| किन्तु उच्च न्यायालय में भी, जिसे न्याय का मन्दिर कहा जाता है, डॉ भीमराव अम्बेडकर को उनकी जाति के कारण अपमानित होना पड़ा| वकीलों में अस्पृश्यता की भावना होने के कारण उनके साथ वे कोई व्यवसाय-संबंधी बातचीत नहीं करते थे|

यहां तक कि कैंटीन में काम करने वाला लड़का भी उन्हें चाय नहीं देता था| इस प्रकार, एक अस्पृश्य व्यक्ति होने के कारण, उनमें असाधारण विधि-संबंधी कुशाग्रता होने के बावजूद, वे वकालत के व्यवसाय में फल-फूल नहीं सके| उन्हें “निर्धनों का बैरिस्टर” कहा जाता था|

सामाजिक असमानता के प्रति विद्रोही के रूप में

अपमान, अनादर और घोर भेदभाव ने उनके इस निश्चय को बल प्रदान किया कि उन्हें अपने लोगों को सामाजिक दासता की बेड़ी से मुक्त कराना है| उनके आगमन से सामाजिक अन्याय और असमानता के विरुद्ध विद्रोह को बढ़ावा मिला| उन्होंने अपने साथियों को अपने मन से ऊंच-नीच की भावना को निकाल देने की अपील की डॉ भीमराव अम्बेडकर ने शोषित वर्ग के लोगों में जागृति पैदा करने के लिए जोरदार प्रयास किए|

उन्होंने संगठन बनाकर, राजनीतिक दल गठित करके तथा समाचार-पत्र और साप्ताहिक लेख आरंभ करके असश्य लोगों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया ताकि उनके लक्ष्य के प्रति समर्थन जुटाया जा सके| 1920 में, उन्होंने एक मराठी पाक्षिक “मूकनायक” (गूंगों का नेता) आरंभ किया|

इससे पहले 1918 में, जब सरकार ने वयस्क मताधिकार संबंधी साउथबोरों रिफामर्ड (फरेन्वाईज) कमेटी का गठन किया, तो डॉ भीमराव अम्बेडकर को साक्ष्य देने के लिए बुलाया गया| उन्होंने दृढ़तापूर्वक शोषित वर्ग के लोगों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल की मांग की, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया|

अस्पृश्यता के विरुद्ध अपना संघर्ष आरंभ करने के लिए डॉ भीमराव ने 1924 में बम्बई में अस्पृश्य लोगों की नैतिक एवं भौतिक प्रगति के लिए “बहिष्कृत हितकारिणी सभा” नाम से एक संगठन को स्थापना की|

अस्पृश्य लोगों के लिए सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए मात्र उपदेश एवं लेखन से संतुष्ट न होने के कारण डॉ भीमराव ने भी आन्दोलन का रास्ता अपनाया| दिसम्बर, 1927 में उन्होंने कोलाबा जिले के महद में अस्पृश्य लोगों के लिए एक सार्वजनिक तालाब “चावाडोर तलेन” से पानी लेने के नागरिक अधिकार प्राप्त करने के लिए एक सत्याग्रह का नेतृत्व किया|

बाद में, एकत्रित लोगों को सम्बोधित करते हुए डॉ भीमराव ने कहा कि अस्पृश्य लोगों की आत्म-उन्नति केवल अपनी सहायता आप करने, आत्म-सम्मान को पुनः प्राप्त करने एवं आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में ही निहित है| उन्होंने लोगों का सेना, नौसेना और पुलिस में उनके प्रवेश पर सरकारी रोक के विरुद्ध आन्दोलन करने का आह्वान किया तथा स्कूलों, कालेजों और सरकारी सेवाओं में प्रवेश करने की आवश्यकता पर जोर दिया|

लगभग इसी समय से अस्पृश्य लोगों की स्थिति में सुधार सम्बन्धी आन्दोलन ने एक संघर्ष का रास्ता अख्तियार कर लिया| इस प्रकार, शोषित वर्ग के लोगों को डॉ भीमराव अम्बेडकर में एक नये मसीहा और एक विद्रोही की छवि दिखाई दी थी|

वर्ष 1927 में, उन्होंने शोषित वर्ग के लोगों की समस्याओं को जनता के सामने लाने के लिए “बहिष्कृत भारत” नामक एक अन्य मराठी पाक्षिक का आरंभ किया| इसी वर्ष, उन्होंने शोषित वर्ग के लोगों एवं सवर्ण हिन्दुओं के बीच सामाजिक समानता का पाठ पढ़ाने के लिए “समाज समता संघ” नाम से एक संगठन की स्थापना की उक्त संगठन के कार्यक्रम में अन्य बातों के अलावा अन्तर्जातीय विवाह एवं अन्तर्जातीय भोज को भी शामिल किया गया था|

वर्ष 1929 में, जब साइमन कमीशन ने भारत का दौरा किया, यद्यपि कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया, पर डॉ भीमराव ने बम्बई प्रदेश की विधान परिषद के एक सदस्य के रूप में इसके समक्ष साक्ष्य दिया ओर शोषित वर्ग के लोगों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया|

इस कमीशन ने लंदन में एक गोलमेज सम्मेलन आयोजित करने की सिफारिश की जहां विभिन्न पार्टियों के नेता मिलकर विचार-विमर्श कर सकें| डॉ. भीमराव अम्बेडकर को अस्पृश्य लोगों के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया| गोलमेज सम्मेलन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ क्योंकि इसमें भाग लेने वालों में आम राय नहीं बन पाई|

अम्बेडकर का शोषित वर्ग के लोगों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल का सपना उस समय आंशिक रूप से साकार हुआ जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा “कम्यूनल अवार्ड” की घोषणा की गई|

ब्रिटिश सरकार के निर्णय से महात्मा गांधी को सदमा पहुंचा तथा उन्होंने पूना में आगा खां महल में मृत्यु-पर्यन्त उपवास की घोषणा कर दी| महात्मा गांधी के जीवन को बचाने के लिए डॉ भीमराव अम्बेडकर को अलग निर्वाचक मंडल के स्थान पर आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्रों संबंधी बात पर झुकना पड़ा| यद्यपि अस्पृश्य लोगों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उन्नति के उपायों के संबंधों में गांधी और अम्बेडकर के विचार आपस में नहीं मिलते थे, फिर भी, वे एक-दूसरे का बहुत आदर करते थे|

यदि गांधी जी ने अम्बेडकर की विद्वता, निष्कपटता और त्याग की प्रशंसा की और उन्हें एक उत्कृष्ट देशभक्त माना तो अम्बेडकर ने भी गांधी जी की सोद्देश्यता की भावना एवं राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण को स्वीकार किया|

वर्ष 1942 में अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा के लिए अखिल भारतीय राजनीतिक दल के रूप में अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ का गठन किया| हालांकि फरवरी 1946 में हुए आम चुनावों में इस पार्टी ने कोई खास चुनावी सफलता प्राप्त नहीं की|

एक संसदविद् के रूप में

जिस उद्देश्य के लिए डॉ भीमराव प्रयत्नशील थे, उसे ध्यान में रखते हुए बम्बई के गवर्नर ने उन्हें 1926 में बम्बई विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया| इस परिषद के वे 1934 तक सदस्य रहे| उक्त एसेम्बली में वे भू-राजस्व, सरकार की मद्यनिवेष नीति, बजट, शिक्षा आदि विषयों पर विस्तारपूर्वक बोला करते थे|

इस अवधि के दौरान उन्होंने किसानों और कामकाजी वर्गों के कल्याण तथा छुआछूत दूर करने के संबंध में कई विधेयक पुरःस्थापित किए लेकिन रुढ़िवादी वर्ग के कड़ा विरोध होने के कारण इन्हें पारित नहीं किया जा सका| तथापि विधानमंडल में अपने पहले ही कार्यकाल में उन्होंने स्वयं को एक प्रखर संसदविद् के रूप में स्थापित कर लिया|

1936 में डॉ भीमराव ने इन्डेपेन्डेन्ट लेबर पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की भारत सरकार अधिनियम 1935 के उपबन्धों के अनुसरण में देश में 1937 में भारत के पहले लोकप्रिय विधानमंडलों के निर्वाचन हेतु मतदान हुआ| इन्डेपेन्डेन्ट लेबर पार्टी ने बम्बई में 17 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें उसे 15 सीटों पर विजय हासिल हुई|

विपक्षी नेता के रूप में डॉ भीमराव ने बम्बई विधानसभा में बड़ी कारगर और सोद्देश्यपूर्ण भूमिका निभाई और एक अनुभवी संसदविद् के रूप में अपनी विद्वता का परिचय दिया| जब मंत्रियों के वेतन संबंधी विधेयक पर चर्चा चल रही थी तो डॉ. अम्बेडकर ने टिप्पणी की कि वे मंत्रियों के लिए किसी भी मानक वेतन को स्वीकार नहीं करेंगे| उन्होंने अपने प्रखर भाषण में तर्कसंगत तरीके से अपनी दलीलों को प्रस्तुत किया| उन्होंने सुझाव दिया कि किसी मंत्री के वेतन निर्धारण में चार बातों का ध्यान रखना चाहिए:-

” पहला मंत्रियों जोकि निःसन्देह सामाजिक नेता है, के सामाजिक स्तर को ध्यान में रखते हुए दूसरा उनकी क्षमता को ध्यान में रखते हुए तीसरा प्रजातंत्र को ध्यान में रखते हुए, और चौथा प्रशासन संबंधी निष्ठा और निष्कपटता को ध्यान में रखते हुए” उन्होंने आगे टिप्पणी की कि व्यक्तिगत रूप से मैं यह समझता हूं कि देश के मंत्रियों को, जोकि देश के प्रथम नागरिक है, एक ऐसा जीवन यापन करना चाहिए जोकि सुसंस्कृत हो, जिससे कला व ज्ञान को बढ़ावा मिले, जो कि जनसाधारण के लिए एक आदर्श बने|

उन्होंने मंत्री की सक्षमता पर भी बल दिया क्योंकि उनके विचार में “यदि हमें विभिन्न समस्याओं का समाधान करना है तथा संविधान अर्थात भारत सरकार अधिनियम, 1935 से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करना है तो कार्यपालिका को विमण्डल होना ही चाहिए|” अपनी प्रखर भाषण क्षमता और विद्वत्ता के कारण डॉ भीमराव वाद-विवाद में अक्सर कड़ा मुकाबला करते थे| इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब वे सभा में बोलने के लिए खड़े होते थे तो सदस्य बड़े ध्यानपूर्वक उन्हें सुना करते थे|

डॉ भीमराव बंगाल विधान सभा से 1946 में संविधान सभा के लिए पहली बार चुने गए| लेकिन विभाजन होने के कारण बंगाल का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ भीमराव सहित कई व्यक्तियों की संविधान सभा से सदस्यता समाप्त हो गई| परिणाम स्वरूप बम्बई लेजिस्लेटिव कांग्रेस पार्टी द्वारा डा. एम आर जायकर के त्यागपत्र से खाली हुए स्थान को भरने के लिए डा. अम्बेडकर को चुना गया|

जब देश में नए संविधान के अन्तर्गत पहली बार चुनाव हुआ तो डॉ भीमराव बम्बई निर्वाचन क्षेत्र से अपना चुनाव हार गए| तथापि उन्हें मार्च 1952 में बम्बई विधान मंडल से राज्य सभा के लिए चुना गया| उन्होंने 1953 में लोकसभा के लिए उपचुनाव लड़ा लेकिन इस समय भी वे हार गए| यद्यपि डॉ भीमराव अम्बेडकर राज्य सभा के सदस्य बने रहे, तथापि उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम वर्षों का बड़ा भाग बौद्ध धर्म प्रचार में लगाया|

मंत्री के रूप में

1946 में जब अन्तरिम सरकार बनी, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विधि मंत्री के लिए अम्बेडकर का चुनाव किया| इससे डॉ भीमराव को हिन्दू महिलाओं तथा अस्पृश्यों की नियति में सुधार करने का एक अनुपम अवसर मिला क्योंकि वे हिन्दू समाज में व्याप्त भेदभाव से पूर्णतः परिचित थे| इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने परिश्रमपूर्वक हिन्दू कोड बिल तैयार किया तथा 4 फरवरी, 1951 को इसे संसद में प्रस्तुत किया|

अम्बेडकर ने इस विधेयक का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए बताया कि इसका लक्ष्य हिन्दू समाज में सुधार लाना तथा हिन्दू कानूनों की कतिपय शाखाओं को संहिताबद्ध करना है| इसके महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा किया जाना देश की अखंडता की दृष्टि से भी हितकर है क्योंकि यही कानून हिन्दू समाज की सामाजिक और धार्मिक जीवन पर भी लागू होंगे|

इस प्रकार स्वतन्त्र और गणतन्त्रात्मक भारत के विधि मंत्री के रूप में उन्होंने पुराने, रुढ़िवादी, दुरुह और अनुचित हिन्दू कानून को एक प्रगतिशील कानून में बदलने का प्रथम प्रयास किया| उनके इस प्रयास को ध्यान में रखकर उन्हें “आधुनिक मनु” की संज्ञा दी गई| यह प्रयास यद्यपि सुविचारित और प्रशंसनीय था लेकिन यह कार्यान्वित नहीं हो पाया क्योंकि मंत्रीमंडल में उनके कई सहयोगी इसके विरुद्ध थे और इसलिए अन्ततः यह विधेयक कानून का रूप नहीं ले पाया|

डॉ भीमराव द्वारा 9 मई, 1951 को अंतरिम संसद में जो एक अन्य महत्वपूर्ण विधेयक पुरःस्थापित किया गया था वह था-लोक प्रतिनिधित्व विधेयक, 1950, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ संसद और विधान सभाओं के लिए स्वतंत्र रूप से चुनावों का आयोजन सदस्यता के लिए अर्हताओं और अनर्हताओं को निर्धारित करने तथा चुनावों के दौरान अपनाए जाने वाले भ्रष्ट और अवैध तरीको से निपटने आदि के संबंध में प्रावधान किया गया है|

अम्बेडकर ने, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और अन्य साथियों से विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होने के कारण 25 सितम्बर 1951 को सरकार से त्यागपत्र दे दिया| हालांकि इन मतभेदों के बावजूद, विधि मंत्री के रूप में निश्चय ही वह अपने साथियों के लिए शक्ति पुन्ज थे| एक मंत्री के रूप में उन्होंने सिद्धान्तों के लिये लड़ाई लड़ी और उनके आदर्शवाद ने बहुत हद तक सामाजिक अन्याय की समाप्ति और दलितों के उद्धार को सुनिश्चित किया|

संविधान के मुख्य निर्माता के रूप में

एक राष्ट्रीय नेता, विधिवेता, सांवैधानिक विशेषज्ञ और सांसद के रूप में उनकी ख्यति को पूर्ण मान्यता तब मिली जब पहले बंगाल तथा बाद में बंबई से उन्हें संविधान सभा में चुना गया| 29 अगस्त, 1947 को प्रारूप समिति में उनकी नियुक्ति की गई तथा इसके बाद वह इसके चेयरमैन चुने गए| प्रारूप समिति की सदस्यता तथा इसके चेयरमैन का पद डॉ भीमराव अम्बेडकर के लिए एक सुखद आश्चर्य था| यह सभा में उनके दिए गए वक्तव्य से स्पष्ट है|

“मैं संविधान सभा में इस महत्वाकांक्षा के साथ आया था कि अनुसूचित जाति के लोगों के हितों की रक्षा कर सकू| मुझे इस बात का लेशमात्र भी अंदाजा नहीं था कि मुझे इतनी जिम्मेदारी का कार्य करने को कहा जाएगा| इसलिए मुझे जब सभा ने प्रारूप समिति के लिए चुना तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ| मुझे इससे भी अधिक आश्चर्य तब हुआ जब प्रारूप समिति ने मुझे अपना चैयरमैन चुना| प्रारूप समिति में मुझसे बेहतर और अधिक सक्षम व्यक्ति मौजूद थे|

डॉ भीमराव के नेतृत्व में प्रारूप समिति की पहली बैठक 30 अगस्त, 1947 को हुई| अम्बेडकर और उनकी टीम ने कुल मिलाकर 141 बैठकों में अंतरिम संविधान तैयार किया| इस अवधि के दौरान अधिकांश अवसरों पर डॉ भीमराव ने अकेले ही कार्य किया| एक अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता और समाजविज्ञानी होने के नाते अम्बेडकर इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि संविधान मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं होता बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक दस्तावेज होता है जिसमें करोड़ों व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाएं, पीड़ा, मांगे, शामिल होती है|

लोकतंत्र के कट्टर समर्थक के रूप में बाबासाहेब ने भारतीय गणतंत्र के लिए एक संसदीय प्रकार का संविधान बनाए जाने पर जोर दिया| उन्हें अकेले ही भारत के संविधान का निर्माता क्यों कहा जा सकता है इस सम्बन्ध में श्री टी टी कृष्णमाचारी ने निमलिखित वक्तव्य दिया है:-

“सदन को शायद इस बात की जानकारी है कि आपके द्वारा नामित सात सदस्यों में से एक सदस्य ने सदन से इस्तीफा दे दिया था और उसके स्थान पर एक अन्य सदस्य को ले लिया गया था| एक सदस्य की मृत्यु हो गई जिनका स्थान खाली पड़ा हुआ था| एक सदस्य अमरीका में थे और उनका स्थान खाली पड़ा हुआ था| एक अन्य सदस्य राज्य सम्बंधी मामलों में उलझे हुए थे इस कारण उनका स्थान भी खाली था| एक साथ अन्य सदस्य दिल्ली में नहीं थे और शायद स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वे बैठक में भाग नहीं ले सके थे| इस प्रकार अंततः संविधान का प्रारूप तैयार करने का भार डॉ भीमराव अम्बेडकर पर आ पड़ा और मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस कार्य को प्रशंसनीय रूप से पूरा करने के लिए हम उनके आमारी है|”

प्रारूप समित द्वारा तैयार किया गया संविधान का प्रारूप डॉ अम्बेडकर द्वारा 4 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया| इसके परिचय के बाद उन्होंने संविधान के प्रारूप की विशेषताओं के बारे में एक विशुद्ध और परिष्कृत भाषण दिया| अंततः संकट काल में तथा शांति-काल के दौरान संविधान की संप्राणता और सहिष्णुता के बारे में बोलते हुए उन्होंने टिप्पणी की थीः-

प्रारूप समिति द्वारा तैयार किया गया संविधान व्यावहारिक है| देश को शांति काल तथा युद्ध काल के दौरान नियंत्रित करने हेतु यह पर्याप्त लोचशील और पूरी तरह सक्षम है| वास्तव में, मैं कह सकता हूं कि अगर नए संविधान के अंतर्गत कुछ गलत होता है तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारे संविधान में कोई बुराई है बल्कि यह होगा कि देशवासी चरित्रभ्रष्ट है|”

एक के बाद एक सदस्य ने प्रारूप समिति के चेयरमैन और इसके सदस्यों द्वारा किए गए कठिन कार्य की सराहना की और अम्बेडकर के ओजपूर्ण प्रारंभिक भाषण की प्रशंसा की वर्ष-भर चलने वाले वाद-विवादों में बाबासाहेब ने प्रत्येक स्तर पर जहां संशोधन लाए गए और उन पर विचार किया गया, सक्रिय रूप से भाग लिया और प्रारूप संविधान के पक्ष में स्वीकार्य तर्कसंगत तर्क दिए|

इस बात का पूरा और सही श्रेय बाबासाहेब को ही जाता है उनकी अध्यक्षता में प्रारूप समिति द्वारा तैयार किए गए संविधान को संविधान सभा ने बिना किसी बड़े परिवर्तन के स्वीकार कर लिया था| संविधान सभा द्वारा संविधान स्वीकृत किए जाने से एक दिन पहले सदस्यों ने संविधान निर्माण डॉ भीमराव अम्बेडकर के महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त किया और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की| संविधान सभा के प्रेसीडेट, डा राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान निर्माता के बारे में कहा थाः-

“इस पद पर रहते हुए तथा सदन की दिन-प्रतिदिन की कार्यवाही को देख कर वैसा किसी ने भी महसूस नहीं किया होगा, जैसा मैंने महसूस किया है कि प्रारूप समिति के सदस्यों, विशेष रूप से इस समिति के चेयरमैन, डॉ भीमराव ने अपनी अस्वस्थता के बावजूद किस उत्साह और लगन से कार्य किया है| जिस समय हमने उन्हें प्रारूप समिति में शामिल करके इसका चेयरमैन बनाया था, उस समय हम यह निर्णय नहीं कर पाये थे कि यह निर्णय सही था अथवा कभी सही भी हो सकता है| उन्होंने अपने चयन को न केवल न्यायसंगत ही सिद्ध किया बल्कि अपने किए गए कार्य को उत्कृष्टता भी प्रादन की|”

संविधान का प्रारूप तैयार करने तथा इसे मार्गदर्शक बनाने में बाबा साहेब द्वारा किये गये कठिन कार्य की प्रशंसा करते हुए एक अन्य सदस्य, श्री पट्टाभि सीतारमय्या ने कहाः-

“इतने बड़े एवं कठिन कार्य जो अदम्य, अप्रतिरोध, अजेय था, को साकार करने तथा बड़े छोटे दोनों को समान रूप देकर उन्होंने अपनी प्रखर प्रतिमा का परिचय दिया| जो भी उन्हें उचित लगा, चाहे उसके जो भी परिणाम निकले, उस पर वह डटे रहे|”

श्रम कानून के जनक के रूप में / श्रम परिषद् के सदस्य के रूप में

डॉ भीमराव अम्बेडकर की कानूनी कुशाग्रता, शैक्षिक विशिष्टता, वार्ताकारिता और प्रशासनिक योग्यता को देखते हुए तत्कालीन वायसराय ने उन्हें 1942 में रक्षा परिषद् का सदस्य नियुक्त किया था बाद में उन्हें श्रम परिषद् का कार्यभार सौपा गया जिस पर वह जून 1946 तक कार्य करते रहे| यद्यपि यह समय बहुत ही कम था फिर भी देश के श्रम कानून तथा श्रमिक कल्याण के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण समय समझा जाता है|

श्रम परिषद के सदस्य के रूप में, अम्बेडकर को केन्द्रीय सरकार में “अछूतों” के लिए 5 से 6 प्रतिशत पद आरक्षित करवाने में सफलता मिली| उन्होंने उन “अछूत” विद्यार्थियों की भी मदद की जो विदेशों में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक थे| श्रम सदस्य के रूप में, उनके कार्यकाल के दौरान रोजगार कार्यालय स्थापित किये गये ताकि विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत प्रशिक्षित किए जा रहे कुशल तथा अर्धकुशल श्रमिकों एवं तकनीशियनों को बेकार न छोड़ दिया जाए बल्कि रोजगार के नये अवसर पाने में उनकी मदद की जाए|

श्रम सदस्य के रूप में डॉ भीमराव ने औद्योगिक क्षेत्र में लोकतंत्र और सद्भावना को बढ़ावा देने के लिए अनेक उपाय किए| उन्होंने कुछ सामाजिक सुरक्षोपाय भी शुरू किए| सबसे पहले, नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच के मुद्दों को सुलझाने के लिए उन्होंने त्रिपक्षीय वार्ता की शुरूआत की|

औद्योगिक विवादों को रोकने तथा इनका समाधान ढूंढने, श्रम कानूनों को लागू करने तथा केन्द्रीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले उद्योगों में श्रमिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए श्रम प्रशासन गठित किया गया था| उनके कार्यकाल के अंत में सभा में जो महत्वपूर्ण श्रम कानून पेश किया गया था वह ‘न्यूनतम वेतन विधेयक’ था|

इन प्रयासों और विधायी परिवर्तनों के कारण अम्बेडकर के आलोचकों ने भी उनकी प्रशंसा की और उन्हें एक योग्य और हितैषी प्रशासक की संज्ञा दी|

एक शिक्षाविद् के रूप में

यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है कि भारत में “अछुतों” को सदियों से मूल शिक्षा के लाभ से वंचित रखा गया था| किसी के जीवन में शिक्षा के महत्व को महसूस करते हुए डॉ भीमराव अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को इस बात के लिए राजी किया कि वे अपने बच्चों को पढ़ाएं| उन्होंने शिक्षा को इतना महत्वपूर्ण समझा कि “शिक्षा” को अपनी “शिक्षा, आन्दोलन और संगठन” संबंधी तीन नारों वाली कार्यवाही में पहला स्थान दिया|

“अछूत” समुदाय के विद्यार्थियों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से डॉ भीमराव ने छात्रावास स्थापित किए और वहां छात्रों को निःशुल्क पुस्तकें एवं कपड़े उपलब्ध कराये| ऐसे छात्रावासों से इन समुदायों में प्राइमरी तथा हाईस्कूल शिक्षा को बढ़ावा देने में काफी मदद मिली|

वर्ष 1945 से 46 में, डॉ भीमराव अम्बेडकर ने अपनी ही शिक्षा संस्थान “दि पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी” की स्थापना की| वायसराय के कार्यकारी परिषद् का सदस्य होने के कारण वह भारत सरकार से तीन लाख रुपये की अनुदान राशि तथा इतनी ही राशि का ब्याजरहित ऋण लेने में सफल रहे| उनकी सोसाइटी के अंतर्गत पहला कालेज बम्बई में खोला गया और इसका नाम “सिद्धार्थ कालेज ऑफ आर्ट्स एण्ड साइन्स” रखा गया|

डा. अम्बेडकर अध्यापन में भी काफी रूचि रखते थे| उन्होंने बम्बई के सिडनहम कालेज आफ कामर्स तथा गवर्नमेंट लॉ कालेज में भी पढ़ाया तथा बाद में बम्बई में वे इस लॉ कालेज के प्रिंसिपल बन गये| उनके लेक्चरों को बड़े ध्यान से सुना जाता था तथा कक्षा-कक्ष विद्यार्थियों से पूरा भरा होता था क्योंकि अन्य कालेजों के विद्यार्थियों ने भी यह मत बना लिया था कि उनके विद्वतापूर्ण लेक्चरों को न छोड़ा जाए|

लेखक के रूप में

डा. अम्बेडकर अत्यधिक अध्ययनशील व्यक्ति ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे लेखक भी थे| उनके लेखों में मानव हित जैसे प्रशासन, मानव शास्त्र, अर्थशास्त्र, वित्त, राजनीति शास्त्र, धर्म इत्यादि विभिन्न विषयों का समावेश था| चार दशकों के अन्दर ही उन्होंने अंग्रेजी में 20 से भी अधिक पुस्तकें, पैम्फलेट तथा लेख लिखे|

डॉ भीमराव ने वर्ष 1920 में भारत में शोषित वर्गों के हितों के समर्थन में पहली साप्ताहिक पत्रिका “मूकनायक” (लीडर ऑफ द डम्ब) शुरू की लेकिन यह पत्रिका काफी दिनों तक नहीं चल सकी| कोलम्बिया में मानव शास्त्र विचार-गोष्ठी में एक विद्यार्थी के रूप में अम्बेडकर की सर्वप्रथम प्रकाशित रचना “दि कास्टस इन इंडिया, दियर मेकेनिज्म, जेनेसिस एण्ड डिवलपमेंट” नाम से पढ़ा गया पत्र था|

वर्ष 1924 में “दि इवोल्यूशन ऑफ प्रोविन्शल फाइनेन्स इन ब्रिटिश इंडिया” शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित उनके पी एच डी शोध कार्य को बड़ौदा के महाराजा को उनके आभार के रूप में समर्पित किया गया| यह पुस्तक बजट पर विचार-विमर्श के दौरान भारतीय विधानमंडलों के सदस्यों के लिए जानकारी प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत सिद्ध हुआ|

उनकी अन्य पुस्तकों में “व्हाट कांग्रेस एण्ड गांधीजी हैव हुन टु र अनटचेबल्स? शूद्र कौन थे और वे भारतीय-आर्य समाज में चुतर्थ वर्ण कैसे बन गये?” “भाषाई राज्यों पर विचार”, “पाकिस्तान पर विचार”, “रानाडे, गांधी और जिन्ना” और “भारत में जातियों का उन्मूलन”

बुद्ध और उनकी शिक्षाओं के सच्चे अनुयायी होने के नाते, उन्होंने 1952 में “बुद्ध उपासना पथ” नामक एक बौद्ध प्रार्थना पुस्तक संकलित की उनकी दूसरी पुस्तक, “बुद्ध और उनका धम्म”, जो 1957 में प्रकाशित हुई थी “बौद्ध बाईबिल” के रूप में जानी जाती है और उसमें बुद्ध का जीवनवृत्त और व्यक्तित्व समाहित है और उसमें धम्म की विश्लेषणात्मक व्याख्या की गई है|

डॉ भीमराव अम्बेडकर एक जीवनी लेखक भी थे| उन्होंने हजारों पुस्तके एकत्र की थी और उनके पास बहुत बड़ा निजी ग्रंथालय था|

बौद्ध के अनुयायी के रूप में

डॉ भीमराव अम्बेडकर को सामाजिक विषमताओं, अछूत बालक, वकील और प्रोफेसर के रूप में हुए अनुभवों ने हिन्दू समाज और उसकी रूढ़िवादिता का कट्टर आलोचक बना दिया| अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाने से पहले, अक्तूबर, 1935 में घोषणा की कि अछुत लोग हिन्दू धर्म को छोड़कर कोई और धर्म अपनाएंगे| तदनुसार, पहले वह 1938-40 के दौरान सिख धर्म की ओर उन्मुख हुए| किन्तु, उनके प्रयास सफल नहीं हुए| अन्ततः उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया|

बौद्ध धर्म में डॉ भीमराव का विश्वास इसलिए बढ़ा क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि बुद्ध का धर्म नैतिकता है और बौद्ध धर्म का आदर्श समानता है और जबकि अन्य धर्मों के संस्थापकों ने स्वयं को “मोक्षदाता” होने का दावा किया था, बुद्ध केवल अपनी “मार्गदाता” की भूमिका से ही संतुष्ट थे|

अम्बेडकर की बौद्ध धर्म में रुचि का पता विदेशों में हुए विभिन्न सम्मेलनों में उनके सक्रिय रूप से भाग लेने से स्पष्ट होता है| उन्होंने 1949 में काठमांडू में विश्व बौद्ध सम्मेलन को संबोधित किया, और वे 1950 में श्रीलंका में, 1954 में बर्मा में और पुनः 1956 में नेपाल में हुए विश्व बौद्ध कांग्रेस सम्मेलनों में उपस्थित हुए|

उन्होंने 1955 में भारत में बुद्ध की शिक्षाओं का और अधिक प्रचार-प्रसार करने के लिए भारतीय बुद्ध महासभा की स्थापना की| अन्ततः उन्होंने 14 अक्तूबर, 1956 को नागपुर में एक विशाल समारोह में बौद्ध धर्म को अपना लिया और अपने अनुयायियों को नये मत को अंगीकार करने की सलाह दी| उन्होंने स्वयं अपने लाखों अनुयायियों को “दीक्षा” दी|

बौद्ध धर्म अपनाने के पश्चात दो महीने के ही भीतर भारत के इस महान सपूत ने 6 दिसम्बर, 1956 को “महानिर्वाण” प्राप्त कर लिया| भारत सरकार ने डा अम्बेडकर की बहुमूल्य सेवाओं का सम्मान करने के लिए उन्हें मरणोपरांत राष्ट्र का सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” प्रदान कर नेक काम किया है| अब वह उनके जन्म शती वर्ष को सामाजिक-न्याय वर्ष के रूप में मना रही है|

प्रशस्तियां और श्रद्धांजलि

सम्पूर्ण राष्ट्र, संसद, राज्यों के विधान मंडलों, समाचार पत्रों, प्रत्येक क्षेत्र से नेताओं, उनके लाखों अनुयायियों और प्रशंसकों तथा विदेशों से आए सम्मानित व्यक्तियों ने इस महान व्यक्तित्व, जिसने आधुनिक भारत की नींव रखने में सहायता पहुंचायी, के दुखद और आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त किया|

डॉ भीमराव अम्बेडकर की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए, लोक सभा के तत्कालीन अध्यक्ष, श्री एम अनन्तसयनम आयंगर ने कहा थाः-

“डा. अम्बेडकर का व्यक्तित्व महान और गतिशील था| सामान्य परिस्थितियों से उठकर वे अनुसूचित जातियों के नेता बन गये| वह महान विद्वान और लेखक थे इनमें भी वे सबसे पहले महान वक्ता थे| वे हमारे संविधान के पथ-प्रदर्शक थे| सामाजिक सुधार के क्षेत्र में, उन्होंने अनेक हितकारी उपायों का सूत्रपात किया| उनके निधन से भारत ने एक महान सपूत खो दिया है|”

हमारे संविधान के निर्माण में बाबा साहेब की प्रमुख भूमिका को स्मरण करते हुए, तत्कालीन प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा थाः-

“हम उन्हें अनेक बातों विशेष रूप से संविधान के निर्माण में जो प्रमुख भूमिका उन्होंने निभाई थी, के लिए याद करते है और संभवतः उनके कार्यकलापों की तुलना में यही तथ्य अधिक समय तक याद किया जाता रहेगा|”

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