टमाटर अत्यन्त ही लोकप्रिय तथा पोषक तत्वों से युक्त फलदार सब्जी है| सम्पूर्ण भारत में इसे व्यापारिक स्तर पर उगाया जाता है| लेकिन कई सूत्रकृमि (निमेटोड) प्रजातियां टमाटर के पौधो को संक्रमित करती है, जैसे- जड़ गांठ सूत्रकृमि और लेजन सूत्रकृमि आदि| यह प्रमुख सूत्रकृमि (निमेटोड) प्रजातियां है, जो टमाटर में आर्थिक नुकसान करती है| [Read More] …
रामदाना की खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, पोषक तत्व, देखभाल, पैदावार
हमारे देश में रामदाना (Ramdana) को विभिन्न नामों जैसे- राजगीरा, चुआ, चौलाई, मारछा से जाना जाता है| यह एक बहुउद्देश्यी धान्य स्वरूप फसल है, इसकी खेती बीज, हरे एवं सूखे चारे, प्रारम्भिक में सब्जी व सजावट के लिए की जाती है| इसकी खेती मुख्यतया उत्तर पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में होती रही है| परन्तु अब देश [Read More] …
ईसबगोल की जैविक खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल, पैदावार
ईसबगोल (Isabgol) एक महत्वपूर्ण नगदी औषधी की फसल है, जो रबी के मौसम में उगाई जाती है| यह फसल प्रमुखतः गुजरात, पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में उगाई जाती है| पिछले कुछ वर्षों से इसका उत्पादन मध्यप्रदेश में भी होने लगा है| ईसबगोल के बीजों पर पाया जाने वाला पतला छिलका ही उसका औषधीय उत्पाद होता [Read More] …
ईसबगोल में कीट एवं रोग और उनकी जैविक रोकथाम कैसे करें
ईसबगोल एक महत्वपूर्ण नगदी एवं अल्पकालिन औषधीय फसल है| इस फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप यपि कम होता है, परन्तु इसमें मुख्य रूप से कीटों में माहू (मोयला) एवं दीमक नुकसान पहुचाते हैं और रोगों में मृदु रोमिल फफूंद प्रमुख है| इन नाशीजीवों के जीवन चक्र के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर [Read More] …
ईसबगोल की खेती: किस्में, बुवाई, खाद, सिंचाई, देखभाल, पैदावार
ईसबगोल (Isabgol) एक महत्वपूर्ण नगदी फसल है, जो शुष्क क्षेत्रों में किसानों के लिये अल्प समय में आय का स्त्रोत् बन रहा है| इसबगोल की फसल की कटाई करते समय इसकी पत्तियाँ हरी रहती है| जो कि पशुओं के हरे चारे के रूप में काम आती है| इसके बीज के ऊपर पाया जाने वाला पतला [Read More] …
तारामीरा की खेती: किस्में, बुवाई, खाद, सिंचाई, देखभाल, पैदावार
तारामीरा (Taramira) फसलों के समूह में तोरिया, भूरी सरसों, पीली सरसों तथा राया आते है| सभी क्षेत्रों में खेती की जाने वाली इस तारामीरा को उपजाऊ एवं अनुपयोगी भूमि में उगया जा सकता है| इसमें तेल की मात्रा लगभग 35 से 37 प्रतिशत पायी जाती है| इसको सिमित सिंचाई व बरानी दोनों क्षेत्रों में उगााया [Read More] …





