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Biography

चंद्रशेखर आजाद कौन थे? चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय

September 4, 2022 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

चंद्रशेखर आजाद (23 जुलाई 1906 – 27 फ़रवरी 1931) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे| वे शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे| सन् 1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये| इस संस्था के माध्यम से राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये|

इसके पश्चात् सन् 1927 में ‘बिस्मिल’ के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर हिन्दुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स की हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया|

ऐसा भी कहा जाता हैं कि आजाद को पहचानने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने 700 लोग नौकरी पर रखे हुए थे| आजाद के संगठन हिंदस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) के सेंट्रल कमेटी मेम्बर वीरभद्र तिवारी अंग्रेजो के मुखबिर बन गए थे और आजाद की मुखबिरी की थी| संगठन के क्रांतिकारी रमेश चंद्र गुप्ता ने उरई जाकर तिवारी पर गोली भी चलाई थी| लेकिन गोली मिस होने से वीरभद्र तिवारी बच गए और गुप्ता की गिरफ्तारी हुई और फिर 10 साल की सजा हुई|

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चंद्रशेखर आजाद का जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन

चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर) वर्तमान अलीराजपुर जिला में एक ब्राह्मण परिवार में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था| उनके पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला) बैसवारा से थे| आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा गाँव में बस गये| यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता| उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था|

आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष-बाण चलाये| इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी| बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया|

उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था| वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये| क्रान्तिकारियों का वह दल “हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ” के नाम से जाना जाता था|

चंद्रशेखर आजाद और पहली घटना

1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया| चंद्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे| जब गांधीजी ने सन् 1920 में असहयोग आन्दोलनका फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चंद्रशेखर भी सड़कों पर उतर आये| अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें 15 बेतों की सज़ा मिली| इस घटना का उल्लेख पं. जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है|

ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 14 या 15 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी| वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया| जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह ‘भारत माता की जय’ चिल्लाता था| हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया| बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना|

झांसी में क्रन्तिकारी गतिविधिया

चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया| झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे| अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छद्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे| वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे| झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी|

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चंद्रशेखर आजाद और क्रांतिकारी संगठन

असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी 1922 में (चौरी चौरा) की घटना के पश्चात् बिना किसी से पूछे (गाँधीजी) ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एचआरए) का गठन किया|

चंद्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये| इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के ऊपर हाथ नहीं उठाया जाएगा|

एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया| इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया| बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये|

इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया| 1 जनवरी 1925 को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था| इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी| इश्तहार के लेखक के रूप में “विजयसिंह” का छद्म नाम दिया गया था|

शचींद्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया| “एचआरए” के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं- बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था| इस संघ की नीतियों के अनुसार 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया| जब शाहजहाँपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिये मीटिंग बुलायी गयी तो दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था|

उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी| अंग्रेज़ चंद्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओँ- पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुररोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसम्बर 1927 को फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया|

सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा| एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी|

4 क्रान्तिकारियों को फाँसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया| इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया|

इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये| पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन” का नाम बदलकर “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन” रखा गया|

चंद्रशेखर आज़ाद ने सेना प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला| इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया – “हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत|” चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया|

यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था| विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों के विरोध में किया गया था| इस काण्ड के फलस्वरूप क्रान्तिकारी बहुत जनप्रिय हो गए| केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के पश्चात भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करा लिया| वे न्यायालय को अपना प्रचार-मंच बनाना चाहते थे|

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लाला लाजपत राय का बदला

17 दिसम्बर, 1928 को चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा| ज्यों ही जेपी सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने दाग़ दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा|

भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार-छह गोलियाँ और दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया| जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया| लाहौर नगर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया| समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया|

चंद्रशेखर आजाद और केन्द्रीय असेंबली में बम

चंद्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया| यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था| विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले कानून के विरोध में किया गया था|

इस काण्ड के फलस्वरूप क्रान्तिकारी बहुत जनप्रिय हो गए| केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के पश्चात भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करा लिया| क्योंकि वे न्यायालय को अपना प्रचार-मंच बनाना चाहते थे|

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चंद्रशेखर आजाद और चरम सक्रियता

आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था| जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में ‘फासीवादी मनोवृत्ति’ के रूप में किया है| इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है|

कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से 448 रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे| सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर 1928-31 के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया| जबकि यह बात सच नहीं है|

चंद्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी| साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की| आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने 23 दिसम्बर 1929 को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे|

आज़ाद को 28 मई 1930 को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था| इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी| भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था|

आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे| झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे| शालिग्राम शुक्ल को 1 दिसम्बर 1930 को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था|

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चंद्रशेखर आजाद का बलिदान

एचएसआरए द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था| अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ 3 ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। 11 फ़रवरी 1931 को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई|

इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति मांगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी| चंद्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया| वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले|

विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और 20 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की| आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें|

अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सीआईडी का एसएसपी नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा| उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी| दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद ने तीन पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया और कई अंग्रेज़ सैनिक घायल हो गए|

अंत में जब उनकी बंदूक में एक ही गोली बची तो वो गोली उन्होंने खुद को मार ली और वीरगति को प्राप्त हो गए| यह दुखद घटना 27 फ़रवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी|

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चंद्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था| जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा| जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे| वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं|

लोग उस स्थान की माटी को कपड़ों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे| समूचे शहर में चंद्रशेखर आजाद के बलिदान की खबर से जबरदस्त तनाव हो गया| शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले होने लगे| लोग सडकों पर आ गये|

आज़ाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी| बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुंचा| अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया|

इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया| ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पड़ा हो| जुलूस के बाद सभा हुई, सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस के बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा| सभा को कमला नेहरू और पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया|

इससे कुछ ही दिन पूर्व 6 फ़रवरी 1931 को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेस बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे| आजाद के संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) के सेंट्रल कमेटी मेम्बर वीरभद्र तिवारी अंग्रेजो के मुखबिर बन गए थे और आजाद की मुखबिरी की थी| संगठन के क्रांतिकारी रमेश चंद्र गुप्ता ने उरई जाकर तिवारी पर गोली भी चलाई थी| लेकिन गोली मिस होने से वीरभद्र तिवारी बच गए और गुप्ता की गिरफ्तारी हुई और फिर 10 साल की सजा हुई|

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चंद्रशेखर आजाद का व्यक्तिगत जीवन

आजाद प्रखर देशभक्त थे| काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया| एक बार वे दल के लिये धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद मठ की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाये| परन्तु वहाँ जाकर जब उन्हें पता चला कि साधु उनके पहुँचने के पश्चात् मरणासन्न नहीं रहा अपितु और अधिक हट्टा-कट्टा होने लगा तो वे वापस आ गये|

प्राय: सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आजाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे| एक बार दल के गठन के लिये बम्बई गये तो वहाँ उन्होंने कई फिल्में भी देखीं| उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था अत: वे फिल्मो के प्रति विशेष आकर्षित नहीं हुए|

चंद्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी| उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े| आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त सन् 1947 को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके| सभी उन्हें पंडित जी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे|

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सुभाष चंद्र बोस कौन थे? सुभाष चंद्र बोस का जीवन परिचय

April 26, 2020 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897, दिन शनिवार, वर्तमान उड़ीसा राज्य के कटक’ शहर में एक समृद्ध परिवार में हुआ था| सुभाष चंद्र बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस व माता का प्रभावती देवी था| जानकीनाथ बोस व प्रभावती देवी की 14 सन्तानें थी, जिनमे 8 पुत्र और 6 पुत्रियाँ थी| सुभाष अपने माता-पिता की 9 वीं संतान और 6 वें पुत्र थे| सुभाष चंद्र बोस के पिता एक प्रसिद्ध वकील थे|

सुभाष चन्द्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ और ‘जय हिन्द’ जैसे प्रसिद्द नारे दिए, भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की, 1938 और 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, 1939 में फॉरवर्ड ब्लाक का गठन किया, अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ की स्थापना की| वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रख्यात योद्धा थे| जिनको “नेता जी” के नाम से भी जाना जाता है|

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सुभाष चंद्र बोस का प्रारम्भिक जीवन

पिता जानकीनाथ बोस, बंगाल के माहीनगर नामक स्थान के प्रसिद्ध बोस परिवार से सम्बद्ध थे, जो अपनी कानून की प्रेक्टिस के लिए माहीनगर छोड़ कर कटक में बस गये थे| वे एक स्वाबलम्बी पुरूष थे और स्वयं के गुणों के आधार पर ही 1901 में कटक नगरपालिका के अशासकीय अध्यक्ष का पद तथा 1905 में शासकीय अभिभावक का पद प्राप्त किया| अपनी बहुमुखी सेवाओं के उपलक्ष्य में उन्हें 1912 में बंगाल विधान परिषद के पद पर कार्यरत रहने के दौरान ही रायबहादुर की उपाधि से सम्मानित किया गया था|

माता प्रभावतीदेवी भी कलकत्ता के हटखोला नामक स्थान के प्रसिद्ध व समृद्ध दत्त परिवार से सम्बद्ध थी| वे धार्मिक व वैभव, विद्या, बुद्धि एवं सामाजिक चेतना के गुणों से समृद्ध थी और वे ही अपने परिवार की भलीभांति संचालन की उत्तरदायी थी| इसका कारण यह था कि पिता जानकीनाथ बोस एक अन्तर्मुखी व्यक्तित्व के और अपने बच्चों से दूरी बनाकर रखते थे| स्वयं सुभाष के शब्दों में “मेरे पिताजी बहुधा, अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाला होने का बहाना कर अपने परिवार से दूर ही रहते थे|

अपने व्यवसायिक कार्यों और जनकर्तव्यों के कारण उनके पास अपने परिवार के लिए समय नही होता था” अतः उन्हें अपने माता-पिता का अविभाजित प्रेम नही मिल पाता था| फिर भी काफी हद तक इस क्षति की पूर्ति उनकी शारदा माँ कर देती थी, जो उन्हें राजा बेटा के नाम से सम्बोधित करती थी| शारदा माँ सुभाष की परिचारिका थी, परन्तु परिवार में एक सम्मानित सदस्य की तरह थी| वे सुभाष को अत्यन्त प्रिय थी|

स्पष्ट है कि सुभाष का कुटुम्ब न केवल परिवार के बड़े आकार से विस्तृत था, बल्कि यहाँ कई आश्रित नौकर-चाकर भी परिवार के सदस्यों की तरह ही रहते थे| यहाँ तक कि जानवरों का भी आश्रय रहता था|

सुभाष के इस विशाल परिवार का उनके व्यक्तित्व पर भी प्रभाव देखा जा सकता हैं| पारिवारिक वातावरण ने उनके मानसिक विकास को विस्तृत किया| उनमें एक विलासी व समृद्ध परिवार में जन्म लेने के बाद भी तनिक भी स्वयं को विशेष समझने का भाव नही आ पाया था| उनके हृदय में सभी के लिए समान भाव थे|

1917 में अपने नजदीकी मित्र हेमंत कुमार सरकार को लिखे एक पत्र में बोस ने लिखा है “मैंने एक गरीब परिवार में जन्म नही लिया, यह वास्तव में सत्य है, पर क्या इसके लिए मैं जिम्मेदार हुँ? इसके लिए मुझे क्या प्रायश्चित करना होगा”  बोस के इस कथन से स्पष्ट है कि उन्हें कभी भी अपने रूतबे या स्थिति का घमण्ड नही था|

परिवार में अनेक भाईयों व बहनों की उपस्थिति ने सुभाष को हमेशा ही दूसरों के बारे में पहले तथा स्वयं के बारे में बाद में सोचने का गुण भी दिया| संभवतः यही कारण रहा कि उनमें कभी भी अति-आत्मविश्वास न आ सका और उन्होंने हमेशा कठोर श्रम को ही प्राथमिकता दी|

यह उनके नजदीकी मित्र हेमंत कुमार सरकार के प्रमाण से भी पता चलता है कि एक बार जब सुभाष मुर्शिदाबाद से कृष्णानगर नाव से लौट रहे थे तो अत्यधिक शारीरिक थकान होने के बाद भी उन्होंने अपने मित्रों के साथ नाव को खेया| स्पष्ट है कि सुभाष शारीरिक श्रम के प्रति उदासीन नही रहते थे, जो कि भद्रलोक वर्ग के गुण के विरीत ही था| इसके अतिरिक्त सुभाष के राष्ट्रीय, सामाजिक व धार्मिक जीवन पर भी उनके परिवार का प्रभाव देखा जा सकता है|

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सुभाष चंद्र बोस की प्रारम्भिक शिक्षा

सुभाष चन्द्र बोस की प्रारम्भिक शिक्षा कटक के ही स्थानीय मिशनरी स्कूल में हुई| इन्हें 1902 में प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल में प्रवोश दिलाया गया| ये स्कूल अंग्रेजी तौर-तरीके पर चलता था जिससे इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की अंग्रेजी अन्य भारतीय स्कूलों के छात्रों के मुकाबले अच्छी थी| ऐसे स्कूल में पढ़ने के और भी फायदे थे जैसे अनुशासन, उचित व्यवहार और रख-रखाव आदि| इनमें भी अनुशासन और नियमबद्धता बचपन में ही स्थायी रुप से विकसित हो गई|

इस स्कूल में पढ़ते हुये सुभाष चंद्र बोस ने महसूस किया कि वो और उनके साथी ऐसी अलग-अलग दुनिया में रहते हैं जिनका कभी मेल नहीं हो सकता| सुभाष शुरु से ही पढ़ाई में अच्छे नंबरों से प्रथम स्थान पर आते थे लेकिन उनकी खेल कूद में बिल्कुल भी रूचि नहीं थी| जब भी किसी प्रतियोगिता में भाग लेते तो उन्हें हमेशा शिकस्त ही मिलती थी|

1909 में इनकी मिशनरी स्कूल से प्राइमरी की शिक्षा पूरी होने के बाद इन्हें रेवेंशॉव कॉलेजिएट में प्रवेश दिलाया गया| इस स्कूल में प्रवेश लेने के बाद सुभाष चंद्र बोस में व्यापक मानसिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आये| ये विद्यालय पूरी तरह से भारतीयता के माहौल से परिपूर्ण था| सुभाष पहले से ही प्रतिभाशाली छात्र थे, बस बांग्ला को छोड़कर सभी विषयों में अव्वल आते थे| इन्होंने बांग्ला में भी कड़ी मेहनत की और पहली वार्षिक परीक्षा में ही अच्छे अंक प्राप्त किये| बांग्ला के साथ-साथ इन्होंने संस्कृत का भी अध्ययन करना शुरु कर दिया|

रेवेंशॉव स्कूल के प्रधानाचार्य (हेडमास्टर) बेनीमाधव दास का सुभाष चंद्र बोस के युवा मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा| माधव दास ने इन्हें नैतिक मूल्यों पर चलने की शिक्षा दी साथ ही ये भी सीख दी कि असली सत्य प्रकृति में निहित है अतः इसमें स्वंय को पूरी तरह से समर्पित कर दो| जिसका परिणाम ये हुआ कि ये नदी के किनारों और टीलों व प्राकृतिक सौंन्दर्य से पूर्ण एकांत स्थानों को खोजकर ध्यान साधना में घंटों लीन रहने लगे|

सुभाष चन्द्र के सभा और योगाचार्य के कार्यों में लगे रहने के कारण इनके परिवार वाले व्यवहार से चिन्तित होने लगे क्योंकि ये अधिक से अधिक समय अकेले बिताते थे| परिवार वालों को इनके भविष्य के बारे में चिन्ता होने लगी कि इतना होनहार और मेधावी होने के बाद भी ये पढ़ाई में पिछड़ न जाये| परिवार की आशाओं के विपरीत 1912-13 में इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया जिससे इनके माता-पिता बहुत खुश हुये|

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सुभाष चंद्र बोस के विचारों पर प्रभाव

सुभाष चन्द्र बोस को पारिवारिक वातावरण में माता-पिता का बहुत अधिक प्रेम नहीं मिला जिससे अधिकांश समय अकेले व्यतीत करने के कारण बाल्यकाल में ही इनका स्वभाव गम्भीर हो गया| बचपन से ही ये मेहनती और दृढ़ संकल्प वाले थे| रेवेंशॉव स्कूल में हेडमास्टर बेनीमाधव के सम्पर्क में आने पर ये अध्यात्म की ओर मुड़ गये|

15 साल की उम्र में इन्होंने विवेकानंद के साहित्यों का गहन अध्ययन किया और उनके सिद्धान्तों को अपने जीवन में अपनाया| इन्होंने तय किया आत्मा के उद्धार के लिये खुद परिश्रम करना जीवन का उद्देश्य होना चाहिये साथ ही मानवता की सेवा, देश की सेवा है, जिस में अपना सब कुछ समर्पित कर देना चाहिये|

विवेकानंद के जीवन से प्रेरणा लेकर इन्होंने ‘रामकृष्ण-विवेकानंद युवाजन सभा’ का गठन किया, जिसका परिवार वालों तथा समाज ने विरोध किया फिर भी इन्होंने सभा के कार्यों को जारी रखा| इस तरह युवा अवस्था में पहुँचने के समय में ही सुभाष में एक सीमा तक मनोवैज्ञानिक विचारों की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी|

सुभाष चंद्र बोस उच्च शिक्षा व सार्वजनिक जीवन

मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद इनके परिवार ने इन्हें आगे की पढ़ाई के लिये कलकत्ता भेज दिया| 1913 में इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज प्रेजिडेंसी में प्रवेश लिया| सुभाष ने यहाँ आकर बिना किसी देर के सबसे पहले आदर्श दल से सम्पर्क बनाया जिसका दूत इन से मिलने कटक आया था| उस समय इनके कॉलेज के छात्र अलग-अलग गुटों (दलों) में विभक्त थे| जिसमें से एक गुट आधुनिक ब्रिटिश राज-व्यवस्था की चापलूसी करता था, दूसरा सीधे-सादे पढ़ाकू छात्रों का था, एक दल सुभाष चन्द्र बोस का था, जो स्वंय को रामकृष्ण-विवेकानन्द का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानते थे और एक अन्य गुट था, क्रान्तिकारियों का गुट|

कलकत्ता का सामाजिक परिवोश कटक के छोटे से कस्बे के वातावरण से बिल्कुल अलग था| यहाँ की आधुनिक जीवन की चमक-धमक अनेकों विद्यार्थियों के जीवन को आकर्षित कर विनाश की ओर ले गयी थी, लेकिन सुभाष पर इसका कोई असर नही था| ये कलकत्ता कुछ दृढ़ विचारों, सिद्धान्तों और नये उद्देश्यों के साथ आये थे| इन्होंने पहले ही निश्चय कर लिया था कि ये लकीर के फकीर नहीं बनेंगें| ये जीवन को गम्भीरता से अपनाना जानते थे| कॉलेज का जीवन शुरु करते समय इन्हें इस बात का अहसास था कि जीवन का लक्ष्य भी है और उद्देश्य भी|

जब सुभाष कटक से कलकत्ता आये थे तो इनका स्वभाव आध्यात्मिक था| ये समाज सेवा करना चाहते थे और समाज सेवा योग साधना का ही अभिन्न अंग है| ये अपना ज्ञान बढ़ाने के लिये ऐतिहासिक और धार्मिक स्थानों पर घूमने जाते थे| अपने कॉलेज के समय में बोस अरविन्द घोष के लेखन, दर्शन और उनकी यौगिक समन्वय की धारणा से प्रेरित थे| इस समय तक इनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं था|

ये तरह-तरह के धार्मिक और सामाजिक कार्यों में खुद को व्यस्त रखते थे| इन्हें कॉलेज की पढ़ाई की कोई परवाह नहीं रहती क्योंकि ज्यादातर विषयों के लेक्चर इन्हें ऊबाऊ लगते थे| ये वाद-विवादों में भाग लेते थे, बाढ़ और अकाल पीड़ितों के लिये चन्दे इकट्ठा करने जैसे समाजिक कार्यों को करने में लगे रहने के कारण 1915 की इंटरमीडियेट की परीक्षा में ज्यादा अच्छे नम्बर प्राप्त नहीं कर पाये| इसके बाद इन्होंने आगे की पढ़ाई के लिये दर्शनशास्त्र को चुना और पूरी तरह से पढ़ाई में लग गये|

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सुभाष चंद्र बोस की शिक्षा में बाधाएँ

बीए आनर्स (दर्शन-शास्त्र) करते समय सुभाष चन्द्र बोस के जीवन में एक घटना घटी| इस घटना ने इनकी विचारधारा को एक नया मोड़ दिया| ये बीए आनर्स (दर्शनशास्त्र) के प्रथम वर्ष के छात्र थे| लाइब्रेरी के स्व-अध्ययन कक्ष में पढ़ते हुये इन्हें बाहर से झगड़े की कुछ अस्पष्ट आवाजें सुनायी दे रही थी| बाहर जाकर देखने पर ज्ञात हुआ कि अंग्रेज प्रोफेसर ई. एफ. ओटेन ने इन्हीं के क्लास के कुछ छात्रों की पीटाई कर रहे थे| मामले की जाँच करने पर पता चला कि प्रोफेसर ओटेन की क्लास से लगे बरामदे (कॉरिड़ोर) में बीए प्रथम वर्ष के कुछ छात्र शोर कर रहे थे, लेक्चर में बाधा डालने करने के जुर्म में प्रोफेसर ने पहली लाइन में लगे छात्रों को निकाल कर पीट दिया था|

सुभाष अपनी क्लास के प्रतिनिधि थे| इन्होंने छात्रों के अपमान की इस घटना की सूचना अपने प्रधानाचार्य को दी| अगले दिन, इस घटना के विरोध में छात्रों द्वारा कॉलेज में सामूहिक हड़ताल का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस ने किया| ये कॉलेज के इतिहास में पहली बार था जब छात्रों ने इस प्रकार की हड़ताल की थी| हर तरफ इस घटना की चर्चा हो रही थी|

मामला अधिक न बढ़ जाये इसलिये अन्य शिक्षकों और प्रबंध समिति की मध्यस्था से उस समय तो मामला शान्त हो गया, लेकिन एक महीने बाद उसी प्रोफेसर ने दुबारा इनके एक सहपाठी को पीट दिया जिस पर कॉलेजों के कुछ छात्रों ने कानून को अपने हाथों में लिया जिसका परिणाम ये हुआ कि छात्रों ने प्रोफेसर को बहुत बुरी तरह पीटा| समाचार पत्रों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक सभी में इस घटना ने हलचल मचा दी|

छात्रों पर ये गलत आरोप लगाया गया कि प्रो. ओटेन पर हमला करते समय उन्हें सीढ़ियों से धक्का देकर नीचे गिराया गया था| सुभाष इस घटना के चश्मदीद गवाह थे| वो जानते थे कि ये आरोप सिर्फ एक कोरा झूठ है, एक प्रत्यक्षदर्शी होने के नाते वे बिना किसी ड़र और विरोधाभास के ये बात दावे के साथ कह सकते थे| छात्रों की निष्पक्षता के लिये ये बात साफ होनी आवश्यक थी|

लेकिन ये घटना सरकार और कॉलेज की अध्यापकों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गयी| छात्रों की ओर से किसी भी प्रकार की सफाई की अवहेलना करते हुये कॉलेज के प्रधानाचार्य ने प्रबंध समिति के सम्मानित व्यक्तियों से सलाह करके कॉलेज के शरारती बच्चों को स्कूल से निकाल दिया| इन निकाले गये छात्रों की हिट लिस्ट में सुभाष चन्द्र बोस का नाम भी शामिल था|

उन्होंने सुभाष को बुलाकर कहा “बोस तुम कॉलेज में सबसे ज्यादा परेशानी उत्पन्न करने वाले (उपद्रवी) छात्र हो। मैं तुम्हें निलम्बित करता हूँ” सुभाष धन्यवाद कहकर घर आ गये| इस निर्णय के बाद प्रबंध समिति ने प्रधानाचार्य के इस निर्णय पर मोहर लगा दी| इन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया| बोस ने विश्वविद्यालय से किसी अन्य कॉलेज में पढ़ने की अनुमति माँगी जिसे अस्वीकार कर दिया गया| इस तरह इन्हें पूरे विश्वविद्यालय से निष्काषित कर दिया गया|

कुछ राजनीतिज्ञों ने इसे प्रधानाचार्य के अधिकार के बाहर का निर्णय कहा जिसे जाँच कमेटी ने अपने हाथ में ले लिया| जाँच कमेटी के सामने इन्होंने छात्रों का प्रतिनिधित्व किया और कहा कि वो प्रोफेसर पर हमले को सही नहीं मानते पर उस समय छात्र इतने भड़के हुये थे कि उन्हें नियंत्रित करना बहुत मुश्किल था| इसके बाद इन्होंने कॉलेज में अंग्रेजों द्वारा किये जाने वाले बुरे व्यवहार का वर्णन किया|

जब कमेटी की रिपोर्ट आयी तो छात्रों के पक्ष में कोई भी शब्द नहीं था, सिर्फ सुभाष चन्द्र के बारे में ही जिक्र था| इस तरह उनके आगे की पढ़ाई करने के रास्ते बन्द हो गये| लेकिन कठिनाई के इस समय में उनके परिवार वालों ने उनका साथ दिया| इनके संबंधी जानते थे कि वो जो कर रहे हैं, सही कर रहे है| सुभाष को भी अपने किये पर कोई पछतावा नहीं था|

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सुभाष चंद्र बोस का स्काटिश चर्च में प्रवेश

लगभग एक वर्ष की उथल-पुथल के बाद विश्व विद्यालय में प्रवेश के लिये ये पुनः कलकत्ता आ गये| यहाँ अधिकारियों के निर्णय की प्रतीक्षा करते समय 49 वीं बंगाल रेजीमेंट में भर्ती होने की कोशिश की, लेकिन खराब आँखों के कारण भर्ती में असफल रहे| बाद में इन्हें सूचना दी गयी कि ये किसी अन्य विद्यालय से प्रवोश लेकर पढ़ सकते हैं|

इस सूचना के बाद ये स्कॉटिश चर्च कॉलेज के प्रधानाचार्य (डॉ. अर्कहार्ट) से मिले और उन्हें बताया कि वो दर्शन शास्त्र में आनर्स करना चाहते है| अर्कहार्ट बहुत ही व्यवहार कुशल और दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखने वाले व्यक्ति थे। वो सुभाष के व्यवहार से प्रभावित हुये और उन्हें प्रवेश की अनुमति दे दी|

इस समय ब्रिटिश भारत सरकार ने इंडिया डिफेंस की फोर्स की एक विश्वविद्यालय स्तर पर प्रादेशिक सेना (टेरिटोरियल आर्मी) के गठन की स्वीकृति दे दी| इसमें भर्ती होने के मापदण्ड सेना में भर्ती करने जितने कड़े नहीं थे अतः इन्हें भर्ती कर लिया गया| इन्होंने 4 महीने के शिविर के जीवन और 3 सप्ताह का मसकट (छोटी बन्दूक) के अभ्यास के बाद बंगाली छात्रों के लिये बनी अवधारणा कि “बंगाली सेना में अच्छा प्रदर्शन नहीं करते” को गलत सिद्ध कर दिया|

कॉलेज के चौथे साल में सुभाष पूरी तरह से पढ़ाई में लग गये| 1919 में इन्होंने प्रथम श्रेणी में आनर्स पास किया| ये विश्व विद्यालय स्तर पर दूसरे स्थान पर रहे|

सुभाष चंद्र बोस का इंग्लैण्ड जाने का निश्चय

दर्शन शास्त्र से बीए करने के बाद सुभाष चन्द्र बोस का झुकाव प्रयोगात्मक मनोविज्ञान की ओर हो गया| उन्होंने महसूस किया कि उनके जीवन की समस्याओं के समाधान के लिये दर्शनशास्त्र उपयुक्त नहीं है| दर्शनशास्त्र से उनका मोह टूट चुका था अतः वो मनौविज्ञान से एमए करना चाहते थे|

इनके पिता जानकी नाथ कलकत्ता आये हुये थे और इनके बड़े भाई शरत् चन्द्र के पास रुके हुये थे| एक शाम इनके पिता ने इन्हें बुलाया और कहा कि क्या वो आई.सी.एस. की परीक्षा देना चाहेंगे| अपने पिता के इस फैसले से इन्हें बहुत झटका लगा| इनकी सारी योजनाओं पर पानी फिर गया| इन्हें अपना निर्णय बताने के लिये 24 घंटे का समय दिया गया|

इन्होंने कभी अपने सपने में भी अंग्रेज सरकार के अधीन कार्य करने के लिये नहीं सोचा था, लेकिन परिस्थतियों के सामने मजबूर होकर इन्होंने ये निर्णय ले लिया| इनके इस निर्णय के बाद एक सप्ताह के अन्दर ही पासपोर्ट बनवाकर इंग्लैंड जाने वाले जहाज पर व्यवस्था करा कर इनको भेज दिया गया| वो भारत से इंग्लैण्ड जाने के लिये 15 सितम्बर को रवाना हुये|

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सुभाष चंद्र बोस द्वारा प्रशासनिक सेवा की तैयारी

इंग्लैंड जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा देने के अपने पिता के फैसले को मानने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था अतः भाग्य के भरोसे ये इंग्लैण्ड चले गये| भारत से इंग्लैंड जाते समय इनके पास आई.सी.एस. की परीक्षा के लिये केवल 8 महीने थे और उम्र के अनुसार ये इनका पहला और आखिरी मौका भी था| इनका जहाज निर्धारित समय से एक हफ्ते बाद इंग्लैंड पहुँचा|

इंग्लैण्ड पहुँचने से पहले ही इनका अध्ययन सत्र शुरु हो गया जिससे किसी अच्छे कॉलेज में प्रवेश का मौका मिलना भी कठिन था| अतः अपनी इस समस्या को लेकर सुभाष चन्द्र बोस इंडिया हाऊस के भारतीय विद्यार्थियों के सलाहकार से मिलने गये| इस मुलाकात से इन्हें निराशा ही हाथ लगी| चारों ओर से किसी भी प्रकार के सहयोग की उम्मीद न होने पर ये सीधे कैंम्ब्रिज यूनिवर्सिटी गये| किट्स विलियम हॉल के सेंसर (परीक्षा में बैठने वाले छात्रों की योग्यता का आंकलन करने वाला बोर्ड) ने इनकी समस्याओं को देखते हुये प्रवेश कर लिया और 1921 जून में होने वाली परीक्षा के लिये छूट भी प्रदान कर दी|

सिविल परीक्षा निकट होने के कारण इन्होंने अपना सारा समय तैयारी में लगा दिया| मानसिक और नैतिक विज्ञान (आनर्स) की तैयारी के लिये लेक्चर लेने के साथ ही अपने पाठ्यक्रम से संबंधित इंडियन मजालिस और यूनियन सोसायटी के कार्यक्रमों में भाग भी लेते थे| अपने लेक्चर के घंटों के अतिरिक्त भी इन्हें पढ़ाई करनी पड़ती थी, जितनी मेहनत से ये पढ़ाई कर सकते थे उतनी मेहनत से पढ़ाई की| पुरानी सिविल सर्विस के रेंग्युलेसन के अनुसार इन्हें लगभग 8 से 9 अलग-अलग विषयों को पढ़ना होता था|

अपनी पढ़ाई के साथ-साथ ही इन्होंने वहाँ के बदले हुये परिवेश को बहुत ध्यान से देखा| इंग्लैण्ड में विद्यार्थियों को प्राप्त स्वतंत्रता, सम्मान और प्रतिष्ठा ने इन्हें बहुत प्रभावित किया क्योंकि यहाँ की परिस्थिति भारत की परिस्थितियों से बहुत ज्यादा अलग थी| ये यहाँ यूनियन सोसायटी के वाद-विवाद आयोजनों में सांसदों या मंत्रियों की उपस्थिति में बिना किसी डर के अपने विचारों को रखते थे| इन्होंने देखा कि राजनीतिक दलों में लेबर पार्टी के सदस्य भारतीय समस्याओं के लिये दया भाव रखते थे|

इंड़ियन सिविल सर्विस की परीक्षा जुलाई 1920 में शुरु हुई और लगभग एक महीने तक चली| सुभाष चन्द्र बोस को परीक्षा में पास होने की कोई उम्मीद नहीं थी अतः अपने घर के लिये चिट्ठी लिखी कि इन्हें अपने पास होने की कोई उम्मीद नहीं है और ये अगले साल की ट्राईपास की तैयारी में लगे हुये हैं| सितम्बर के मध्य में जब रिजल्ट आया तो इनके मित्र ने इन्हें तार द्वारा बधाई दी| अगले दिन इन्होंने अखबार में आई.सी.एस. के सफल उम्मीदवारों में अपना नाम देखा| इन्होंने योग्यता सूची में चौथा स्थान प्राप्त किया था|

अब एक विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गयी| ये स्वामी विवोकानंद और रामकृष्ण के आदर्शों को मानने वाले थे ऐसी स्थिति में इस नौकरी को करना अपने आदर्शों के खिलाफ समझते थे| इस विरोधाभास की स्थिति में बोस ने अपने बड़े भाई शरत् चन्द्र को पत्र लिखकर अपने नौकरी न करने के फैसले के बारे में बताया और उन्हें खत लिखने के 3 हफ्ते के बाद 22 अप्रैल 1921 को बोस ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फार इंडिया ई.एस.मांटेग्यू को पत्र लिखकर परिवीक्षाधीन अफसरों (प्रोबेशनर्स) की सूची से अपना नाम वापस लेने की घोषणा कर दी|

आई.सी.एस. की नौकरी छोड़कर बोस ने इंग्लैण्ड के भारतीय समाज में हलचल मचा दी| चारों तरफ इनके इस निर्णय की चर्चा होने लगी| सुभाष इस वाहवाही और सनसनी दोंनो से बचना चाहते थे| ये कार्य तो बोस ने अपने आत्म सुधार के एक प्रयास के रुप में किया था| इस तथ्य को बोस ने अपने बड़े भाई को लिखे पत्र में स्पष्ट किया है “आपने अपने पत्रों में मेरे बारे में बहुत अच्छी-अच्छी बातें की है, जिनमें से जो मुझे मालूम है उनका मैं बहुत कम पात्र हूँ, मैं जानता हूँ कि मैने कितनों का दिल तोड़ा है, कितने बड़ों की आज्ञा का उल्लंघन किया है लेकिन जोखिम भरी इस प्रतिज्ञा के समय मेरी यही प्रार्थना है कि ये सब हमारे प्यारे देश की भलाई में समा जाये”

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सुभाष चंद्र बोस आंदोलनों से जुड़े

सुभाषचंद्र मनोविज्ञान एवं नैतिक विज्ञान की ट्राइपास परीक्षा देने के तुरंत बाद जून 1921 में भारत वापस आ गये और राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने लगे| जिस जहाज से बोस भारत आ रहे थे उसी जहाज में रविन्द्र नाथ टैगोर भी थे| टैगोर जी ने इन्हें भारत में गाँधी से मुलाकात करने की सलाह दी थी| 16 जुलाई 1921 को बम्बई पहुँचने पर इन्होंने गाँधी जी से मुलाकात की|

इस मुलाकात में बोस ने गाँधी के आन्दोलन की रणनीति और सक्रिय कार्यक्रम की स्पष्ट जानकारी जानना चाहते थे क्योंकि गाँधी आन्दोलन के सर्वोच्च नेता थे| गाँधी ने इनके सभी सवालों का जबाब धैर्य पूर्वक दिया लेकिन कर न देने की मुहिम से संबंधित सभी सवालों के जबाबों के अतिरिक्त और अन्य किसी भी आन्दोलन के स्पष्ट जबावों से वो बोस को सन्तुष्ट न कर सके|

जब ब्रिटिश सरकार ने नवम्बर 1921 में ब्रिटिश राजसिंहासन के वारिस प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत आने की घोषणा की तो सारे देश में जगह-जगह कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा हड़तालों और बन्द का आयोजन किया गया, जिससे सरकार ने कांग्रेस सरकार को ही गैरकानूनी घोषित कर दिया| इस बात ने आग में घी डालने का कार्य किया| प्रदेश की कांग्रेस समिति ने सारे अधिकार अपने अध्यक्ष सी आर दास को सौंप दिये और इन्होंने बोस को आन्दोलन का मुखिया बना दिया| प्रान्त में आन्दोलन को संचालित करने में बोस ने अभूतपूर्व नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया|

आन्दोलन दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था| उस समय तो ये आन्दोलन और भी तेज हो गया जब सी.आर.दास की पत्नी वासन्ती देवी को उनकी सहयोगियों के साथ गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया| इससे खुद की गिरफ्तारी देने वाले युवाओं और युवतियों की संख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई| 1921 के दूसरे हफ्ते में देशबन्धु और सुभाष चन्द्र के साथ अन्य नेताओं को भी कैद कर लिया गया| उन्हें बाद में छह महीने की सजा हुई| स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेते हुये ये सुभाष चन्द्र बोस की पहली गिरफ्तारी थी|

स्वदेश लौटने के बाद सुभाष भारत के दो महान राजनीति के नायक गाँधी व देशबन्धु से मिले| गाँधी से मिलने पर इन्हें निराशा मिली| लेकिन जब ये देशबन्धु सी.आर.दास से मिले तो उनके विचारों और कार्यों से इतने प्रभावित हुये कि उन्हें अपना गुरु बना लिया| एक सच्चे शिष्य की भाँति वो देशबन्धु के पद चिन्हों पर चलने लगे| शीघ्र ही इन्होंने अपने नेतृत्व के द्वारा अपनी योग्यता का लोहा मनावा लिया|

कलकत्ता में कांग्रेस के बहिष्कार आन्दोलन के दौरान देशबन्धु और बोस के साथ अन्य सदस्यों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया| इन्हें कलकत्ता की अलीपुर सेंट्रल जेल में रखा गया| यहाँ देशबन्धु के सानिध्य में रहकर इन्होंने उनके नेतृत्वकारी गुणों का गहन विश्लेषण किया तथा ये जानने के कोशिश की किन कारणों से सभी लोगों तथा अपने अनुयायियों पर उनका आकर्षण छाया रहता है| बोस के आने वाले जीवन में उनका ये अनुभव बहुत उपयोगी साबित हुआ|

बंगाल के नेतृत्व के दायित्व के समय तथा आजाद हिन्द फौज के गठन के समय इस अनुभव से इन्हें बहुत ज्यादा सहायता मिली| बंदी जीवन में देशबन्धु के साथ निकटता से बोस को उनके व्यक्ति पक्ष को समझने का मौका मिला| चितरंजन दास का मानना था कि जिंदगी राजनीति से बड़ी है और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में ये इस पर पूरी तरह से अमल भी करते थे|

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सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्वराज्य पार्टी का गठन

1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गाँधी ने असहयोग आन्दोलन को वापस ले लिया| उस समय सुभाष चन्द्र बोस और देशबन्धु दोनों जेल में थे| उन दोनों को ही इस निर्णय से बहुत दुख हुआ| लोगों में उमड़ती हुई आशा, निराशा में बदल गई|

दिसम्बर 1922 में कांग्रेस का गया (बिहार) अधिवेशन आयोजित किया गया| इसकी अध्यक्षता सी.आर.दास ने की इस अधिवोशन में कांग्रेस के सभी सदस्यों मे कुछ मुद्दों पर गतिरोध उत्पन्न हो गया| देशबन्धु के समर्थक परिवर्तन चाहते थे और गाँधी के समर्थक किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं चाहते थे|

देशबन्धु का प्रस्ताव गिर गया और उनकी अध्यक्ष के रुप में स्थिति कमजोर हो गई| दूसरी तरफ मोती लाल नेहरु ने कांग्रेस मुक्त स्वराज पार्टी के गठन की घोषणा कर दी| इस तरह देशबन्धु कांग्रेस से अलग होकर स्वराज्य पार्टी के अध्यक्ष नियुक्त किये गये| सुभाष चन्द्र इन सभी गतिविधियों में अपने गुरु के साथ थे|

1923 के मध्य में स्वराज्य पार्टी ने अपनी नेतृत्व से संगठन को मजबूत आधार दिया| इसी साल देशबव्धु की अध्यक्षता और सुभाष के प्रबंधन में दैनिक अंग्रेजी पत्र “फारवर्ड” का प्रकाशन किया| जो बहुत ही कम अवधि में देश का प्रमुख दैनिक पत्र बन गया| बोस ने स्वराज्य के कार्यों के साथ ही युवा संगठन की योजना को भी आगे बढ़ाया| इन्होंने ऑल बंगाल यूथ लीग का भी गठन किया, जिसका अध्यक्ष भी इन्हीं को बनाया गया| 1923 में ही इन्हें पार्टी संगठन ने एक महत्वपूर्ण पद प्रदान किया| इन्हें बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव बना दिया गया|

1924 के कलकत्ता नगर निगम के घोषित चुनावों में स्वराज्य पार्टी ने भाग लेने का निश्चय किया जिसमें हिन्दू तथा मुस्लिम सीटों पर पर्याप्त बहुमत मिला और देशबन्धु प्रथम महापौर चुने गये| देशबन्धु के आग्रह पर सुभाषचंद्र बोस को मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया।|अंग्रेज सरकार इस नियुक्ति से बहुत ज्यादा चिढ़ गयी और इन्हें मंजूरी प्रदान करने में बहुत आनाकानी की| बोस ने मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष के रुप में अनेक जन कल्याणकारी कार्य किये|

थोड़े ही समय में इन्होंने नगर निगम के कार्यों को नयी दिशा दे दी| जगह-जगह सम्मान समारोह में आने वाले उच्च पद के ब्रिटिश अधिकारियों के स्थान पर शहर में आने वाले राष्ट्रवादी नेताओं का स्वागत सत्कार किया जाने लगा| जन-जागृति के लिये “कलकत्ता म्यूनिसिपल गैजेट” सप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरु कर दिया गया| सुभाषचन्द्र बोस अपने खर्च के लिये आधा वेतन रखकर शेष दान कर देते थे|

स्वराज्य पार्टी के बढ़ते हुये प्रभुत्व को अंग्रेज सरकार किसी भी तरह हजम नहीं कर पा रही थी| अंग्रेज कैसे भी करके इसकी नींव को खोखली करना चाहते थे| कार्यकारी अध्यक्ष के रुप में सुभाष द्वारा किये गये कार्यों से आग में घी डालने का काम किया| उनकी बढ़ती हुई ख्याति ने सरकार की नींद उड़ा दी, वो जानते थे कि देशबन्धु और बोस के साथ को तोड़े बिना स्वराज पार्टी को कमजोर करना नामुमकिन है अतः वो एक ऐसे ही मौके की तलाश में जुट गये|

25 अक्टूबर 1924 की सुबह ही उन्हें सूचना दी गयी कि कलकत्ता पुलिस कमीशनर ने उन्हें बुलाया है।|कमीशनर ने उनके आने पर उनसे कहा कि 1818 के कानून की धारा 3 के तहत उनकी गिरफ्तारी का वारंट है| बोस के साथ ही दो अन्य स्वराज्यवादी सदस्यों को भी गिरफ्तार किया गया|

1924 मे बोस की गिरफ्तारी के साथ ही और भी बहुत गिरफ्तारियाँ की गयी| जिसके लिये सरकार ने ये सफाई दी की एक क्रान्तिकारी षड़यन्त्र की योजना बनायी जा रही है जिसके तहत ये गिरफ्तारियाँ की जा रही है| दो अंग्रेजी अखबारों ने तो इस घोषणा से भी बढ़कर आरोप लगाया कि क्रान्तिकारी षड़यन्त्र के पीछे बोस का दिमाग है| सुभाष ने इन अखबारों पर मानहानि का केस कर दिया| सरकार और उसके नियंत्रण में चलने वाली ये प्रेस अपने आरोपों के पक्ष में कोई भी तथ्य पेश नहीं कर पायी, फिर भी इन पर बिना मुकदमा चलाये बोस के साथ-ही बंगाल के कई बड़े नेता को कैद में डाल दिया|

सुभाष चन्द्र बोस को कुछ सप्ताह के लिये अपने शासकीय कार्यों को पूरा करने का समय देने के साथ ही उनके साथ दो पुलिस अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया| अंग्रजों ने इनके कार्यों के पूरा होते ही इन्हें निर्वासित जीवन व्यतीत करने के लिये मांडले जेल (रंगून) भेज दिया| कारागार की परिस्थितियाँ तथा जलवायु के कारण इनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा| जेल के अधिक्षक ने सरकार को इनके स्वास्थ्य के संबंध में सूचना दी लेकिन सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की साथ ही ये संदेश दिया कि यदि सुभाष भारत आये बिना रंगून से ही अपने इलाज के लिये यूरोप चले जाये तो वो उन्हें रिहा कर सकती है|

सुभाष ने ये शर्त ये कहते हुये मानने से इंकार कर दिया कि वो अपने जीवन से भी ज्यादा अपने सम्मान से प्यार करते है और वो किसी ऐसे अधिकारों के साथ कोई सौदा नहीं कर सकते जो आने वाले समय की कूटनीति का आधार बनने वाले हैं| जिस पर सरकार ने उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखने का आदेश दिया| मई 1927 को डायमंड हार्बर पर उनकी मेडिकल जाँच करायी गयी जिसमें इनके अस्वस्थ्य होने की पुष्टि की गयी। इसके बाद इन्हें अगली सुबह रिहा कर दिया गया|

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सुभाष चंद्र बोस का राजनीतिक जीवन

सुभाष चन्द्र बोस को 1927 में जेल से रिहा किया गया, जिसके बाद उन्होनें अपने राजनैतिक करियर को एक आधार देकर विकसित किया| सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस पार्टी के महासचिव के पद को सुरक्षित कर लिया और गुलाम भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराने का काम करना शुरू कर दिया|

1928 में सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ| अधिवेशन के निर्वाहन के लिए कार्यकर्ताओं का एक दल गठित किया गया| सुभाष चंद्र बोस इस दल के जनरल ऑफिसर इन कमांड थे| एक बार फिर सरकार विरोधी गतिविधियों पर शक होने के कारण इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया|

सुभाष चंद्र बोस अपने कामों से लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ रहे थे इसलिए उन्हें कलकत्ता का मेयर के रूप में चुना गया| 1930 के दशक के मध्य में, नेता जी ने बेनिटो मुसोलिनी समेत पूरे यूरोप की यात्रा की| अपने कामों से नेताजी ने कुछ ही सालों में लोगों के बीच अपनी एक अलग छवि बना ली थी, इसके साथ ही वे यूथ लीडर के रूप में लोगों के प्रिय और राष्ट्रीय नेता भी बन गए|

सुभाष चंद्र बोस ने 1931 में कलकत्ता के मेयर का पदभार संभाला| अब इनका एकमात्र उद्देश्य आजादी के लिए आंदोलन करना था| इसके लिए उन्होंने एक प्रदर्शन का आयोजन किया लेकिन सरकार ने स्वीकृति देने से मना कर दिया, पर सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में प्रदर्शन किया गया जिसके लिए इन्हें लाठिया भी खानी पड़ी|

जिसकी वजह से सुभाष चंद्र बोस की तबियत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी| चिकित्सको ने इन्हें यूरोप जाकर इलाज कराने की सलाह दी, लेकिन वे वहाँ पर भी नहीं रुके, उन्होंने वहाँ पर भारत में हो रही स्वतंत्रता आंदोलन पर सुदीर्घ भाषण भी दिए| यूरोप भ्रमण के दौरान ही इनको अपने पिता की मृत्यु की सूचना मिली|

1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ| इस अधिवेशन में बीमारी की वजह से वह शामिल नहीं हो सके| इसके बाद 29 अप्रैल 1939 को सुभाष चन्द्र बोस को लगा कि गांधीजी और उनके विचारो में समानता नहीं है तो उन्होंने खुद ही कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया| इनके स्थान पर डा. राजेंद्र प्रसाद काँग्रेस के अध्यक्ष बने|

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सुभाष चंद्र बोस द्वारा फॉवर्ड ब्लॉक की स्थापना

3 मई 1939 में अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने फॉवर्ड ब्लॉक की स्थापना की इसी के साथ स्वतंत्रता संग्राम के लिए आंदोलन और तेज कर दिया| सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए एक बार फिर इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया| जेल से रिहा होने के लिए इन्होने भूख हड़ताल शुरू कर दी| जनता ने भी इनका पूरा साथ दिया| सरकार ने दबाव में आकर इन्हें रिहा कर दिया लेकिन इन्हें गृह नजरबंद कर दिया गया लेकिन नेताजी यहाँ से भागने में कामयाब रहे|

गृह गिरफ्तारी के 41 वें दिन जर्मनी जाने के लिए सुभाष चन्द्र बोस मौलवी का वेष धारण कर अपने घर से निकले और इटेलियन पासपोर्ट में ऑरलैंडो मैज़ोटा नाम से अफगानिस्तान, सोवियत संघ, मॉस्को और रोम से होते हुए जर्मनी पहुंचे| जर्मनी से इन्होने देश को आजादी दिलाने में मदद मांगी| जर्मनी और भारत के बीच दूरी बहुत अधिक थी| जिसकी वजह से मदद की उम्मीद कम हो गई, इसके बाद नेताजी वहाँ से जापान चले गए|

सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिंद फौज का गठन

जिसके बाद सुभाष चन्द्र बोस जुलाई 1943 में सिंगापुर चले गए जहां उन्होनें भारतीय राष्ट्रीय सेना के गठन की उम्मीद फिर से जगाई आपको बता दें कि भारतीय राष्ट्रीय सेना को सबसे पहले कप्तान जनरल मोहन सिंह ने 1942 में स्थापित किया था इसके बाद राष्ट्रवादी नेता राश बिहारी बोस ने इसकी अध्यक्षता की थी| वहाँ पहुंचकर नेताजी रासबिहारी बोस से मिले| रासबिहारी बोस ने सिंगापुर के एडवर्क पार्क में स्वेच्छा से स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौप दिया| वहीं इसके बाद INA को आजाद हिंद फौज और सुभाष चन्द्र बोस को नेता जी के नाम से जाने जाना लगा|

सुभाष चंद्र बोस ने न केवल सैनिकों को फिर से संगठित किया, बल्कि उन्होनें दक्षिणपूर्व एशिया में परदेशवासी भारतीयों का ध्यान भी अपनी तरफ खींचा| वहीं लोगों में फौज में भर्ती होने के अलावा, वित्तीय सहायता भी देना शुरू कर दिया| जापान में रहकर ही नेता जी जापनियो द्वारा युद्ध में बंदी बनाए गए भारतियों से मिले| उनके साथ मिलकर “इण्डियन नेशनल आर्मी” की स्थापना की झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नाम से महिलाओं के लिए एक रेजिमेंट भी बनाई|

21 अक्टूबर 1943 को नेता जी ने “आजाद हिन्द फ़ौज ” की स्थापना की आजाद हिंद फौज ने काफी विस्तार किया और इस संगठन ने अजाद हिंद सरकार के एक अस्थायी सरकार के तहत काम करना शुरू कर दिया| उनके पास अपनी डाक टिकट, मुद्रा, अदालतें और नागरिक कोड थे और नौ एक्सिस राज्यों द्वारा स्वीकृत थी|

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सुभाष चंद्र बोस का एमिली शेंकल से विवाह

जब आस्ट्रिया में इलाज के लिये रुकने के दौरान इन्होंने कई पत्र और पुस्तकें लिखी थी, जिन्हें इंग्लिश में टाइप करने के लिये एक टाइपिस्ट की आवश्यकता महसूस हुई| इन्होंने इस संबंध में अपने एक मित्र से बात की जिस पर इनके मित्र ने इनका परिचय एमिली शेंकल से कराया| इन्हें स्वभाविक आकर्षण के कारण एमिली से प्रेम हो गया और 1942 में बोस ने शेंकल से विवाह कर लिया| इनका विवाह बाड गास्टिन स्थान पर हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ| इस विवाह से इनके एक पुत्री भी हुई जिसका नाम अनीता बोस रखा गया|

सुभाष चंद्र बोस का भाषण

सुभाष चंद्र बोस ने 1944 में अपने भाषण से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिसकी वजह से भारतियों के अंदर देश को आज़ाद कराने का जोश और अधिक बढ़ गया| इसके साथ ही उनके इस भाषण ने उस समय काफी सुर्खियां भी बटोरी थी| उन्होंने इस भाषण में एक नारा दिया था, जो बहुत प्रसिद्ध हुआ था और आज तक प्रसिद्ध है| उन्होंने लोगों से कहा की ”तुम मुझे खून दो, मै तुम्हें आजादी दूंगा”

नेता जी के इस भाषण का लोगों पर इतना प्रभाव पड़ा कि काफी तादाद में लोग बिट्रिश शासकों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए| सेना, आजाद हिंद फौज के मुख्य कमांडर नेताजी के साथ, ब्रिटिश राज से देश को मुक्त करने के लिए भारत की तरफ बढ़ी|

हालांकि, राष्ट्रमंडल बलों के अचानक हमले में जापानी और जर्मन सेना को आश्चर्यचकित कर दिया| रंगून बेस शिविर के पीछे हटने और कई अन्य कारणों से इंडियन नेशनल आर्मी अंग्रेजी सेना का सामना नहीं कर सकी| अग्रेजो का पलड़ा भारी होने की वजह से फ़ौज को वापस लौट जाना पड़ा|

सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु

जैसा की 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान के दो प्रमुख शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा दिये, जिससे जापान ने युद्ध में समर्पण कर दिया और अपनी हार मान ली| जापान की हार के बाद आजाद हिन्द फौज का विघटन कर दिया गया|

आजाद हिंद फौज की हार होने के बाद, सुभाष चंद्र बोस ने मदद मांगने के लिए रूस यात्रा करने की योजना बनाई| लेकिन 18 अगस्त 1945 को नेता जी के विमान का ताईवान में क्रेश हो गया, जिसकी वजह से उनकी मृत्यु हो गई?

हालाँकि सच क्या है यह आज भी विवाद का विषय बना हुआ है| क्युकीं नेता जी की लाश नहीं मिली थी साथ ही उस दुर्घटना का कोई सबूत भी नहीं मिला था इसलिए सुभाष चन्द्र बोस की मौत आज भी विवाद का विषय है और भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा संदेह है|

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स्वामी विवेकानंद कौन थे? स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

April 23, 2020 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

स्वामी विवेकानंद वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे| उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था| उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था| भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन पश्चिम के हर एक देश में स्वामी विवेकानंद की वक्तृता के कारण ही पहुँचा| उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है| वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे|

कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे, स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे| वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीव स्वयं परमात्मा का ही एक अवतार हैं| इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है|

रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का पहले ज्ञान हासिल किया बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कूच किया|

स्वामी विवेकानंद ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया, सैकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया| भारत में, विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है और इनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है| इस लेख में स्वामी विवेकानंद के संक्षिप्त जीवन का उल्लेख किया गया है|

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स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन् 1873 को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था| उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था| पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे| दुर्गाचरण दत्ता (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे| उन्होंने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए| उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं|

उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था| पिता नरेंद्र और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत विचारों ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे| अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिल ने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे|

उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण,रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था| कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे| नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था| परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये|

माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी| ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डित जी तक असमंजस में पड़ जाते थे|

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स्वामी विवेकानंद की शिक्षा और अध्ययन 

सन् 1871 आठ साल की उम्र में, नरेंद्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए| 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया| 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये|

वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों के एक उत्साही पाठक थे| इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी| नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था और वे नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम व खेलों में भाग लिया करते थे|

नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया| 1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली|

नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गॉटलिब फिंच, बारीक स्पिनोज़ा, जॉर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार, ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्यन किया| उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन (1861) का बंगाली में अनुवाद किया| वे हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी प्रभावित थे| पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा|

विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा, “नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है| मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं|” अनेक बार इन्हें श्रुतिधर( विलक्षण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है|

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स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक शिक्षुता

1880 में नरेंद्र, ईसाई से हिन्दू धर्म में रामकृष्ण के प्रभाव से परिवर्तित केशव चंद्र सेन की नव विधान में शामिल हुए, नरेंद्र 1884 से पहले कुछ बिंदु पर, एक फ्री मसोनरी लॉज और साधारण ब्रह्म समाज जो ब्रह्म समाज का ही एक अलग गुट था और जो केशव चंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में था| 1881-1884 के दौरान ये सेन्स बैंड ऑफ़ होप में भी सक्रीय रहे जो धूम्रपान और शराब पीने से युवाओं को निस्र्त्साहित करता था|

यह नरेंद्र के परिवेश के कारण पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ परिचित हो गया था| उनके प्रारंभिक विश्वासों को ब्रह्म समाज ने जो एक निराकार ईश्वर में विश्वास और मूर्ति पूजा का प्रतिवाद करता था, ने प्रभावित किया और सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं, धर्मशास्त्र, वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्यन पर प्रोत्साहित किया|

स्वामी विवेकानंद अद्वितीय निष्ठा

एक बार किसी शिष्य ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और निष्क्रियता दिखाते हुए नाक-भौं सिकोड़ीं| यह देखकर स्वामी विवेकानंद को क्रोध आ गया| वे अपने उस गुरु भाई को सेवा का पाठ पढ़ाते और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंकते थे| गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके|

गुरुदेव को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके और आगे चलकर समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भण्डार की महक फैला सके| ऐसी थी उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा जिसका परिणाम सारे संसार ने देखा|

स्वामी विवेकानंद अपना जीवन अपने गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे| उनके गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था| गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत व स्वयं के भोजन की चिन्ता किये बिना वे गुरु की सेवा में सतत संलग्न रहे|

विवेकानन्द बड़े स्‍वप्न‍दृष्‍टा थे| उन्‍होंने एक ऐसे समाज की कल्‍पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद न रहे| उन्‍होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा| अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार स्वामी विवेकानंद ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके| विवेकानन्‍द को युवाओं से बड़ी आशाएँ थीं| आज के युवाओं के लिये इस ओजस्‍वी सन्‍यासी का जीवन एक आदर्श है|

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स्वामी विवेकानंद शिकागो सम्मेलन

“मेरे अमरीकी भाइयो और बहनो” (उनका वह सम्बोधन हॉल में जैसे विद्युत की धारा के समान बह गया| सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा| लोग अपने स्थानों पर उठ कर खड़े हो गये| युवतियाँ, फ़र्श पर स्थान न मिलने के कारण बेंचों पर चलती हुई विवेकानंद और बढती दिखाई दी) आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं|

संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की और से भी धन्यवाद देता हूँ| मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं|

मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं| हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं| मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है|

स्वामी विवेकानंद आगे कहा की मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था| ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है|

भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:-

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥

अर्थात:- जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो, भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं|

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यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:-

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वश॥

अर्थात:- जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ, लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं|

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं| वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं| यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता|

पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो|

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स्वामी विवेकानंद की यात्राएँ और तत्वज्ञान

25 वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए थे| तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की सन्‌ 1893 में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी| स्वामी विवेकानंद उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे| यूरोप-अमरीका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे|

वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले| परन्तु एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला| उस परिषद् में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये| फिर तो अमरीका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ| वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया|

तीन वर्ष वे अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया| “अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा” यह स्वामी विवेकानंद का दृढ़ विश्वास था|

अमरीका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं अनेक अमरीकी विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया| वे सदा अपने को ‘गरीबों का सेवक’ कहते थे| भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया|

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स्वामी विवेकानंद का योगदान तथा महत्व

उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का खासकर युवाओं का मार्गदर्शन करते रहेंगे| तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी|

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये| उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं|”

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था “उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे| हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था, वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी”

हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा- ‘शिव|’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो” वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे|

अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था “नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से, निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से” और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया| वह गर्व के साथ निकल पड़ी|

गान्धीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही फल था| इस प्रकार वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा के स्रोत बने| उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है| यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है|

आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है| उनके कथन:- “उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ, अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये”

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उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में स्वामी विवेकानंद लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी देश को आजाद करना चाहते थे| परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियाँ उन इरादों के लिये अभी परिपक्व नहीं हैं| इसके बाद ही विवेकानन्द ने ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला|

उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के गावों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें| उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ| स्वामी विवेकानंद पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे| उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था|

उनका हिन्दू धर्म अटपटा, लिजलिजा और वायवीय नहीं था| उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये|

उनका यह कालजयी आह्वान इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अन्त में एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है| उनके इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिग्घी बँध गई थी| आज कोई दूसरा साधु तो क्या सरकारी मशीनरी भी किसी अवैध मन्दिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती| विवेकानन्द के जीवन की अन्तर्लय यही थी कि वे इस बात से आश्वस्त थे कि धरती की गोद में यदि ऐसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है|

उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ायी और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया| उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है| विवेकानंद ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये|

हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेसाख्ता जरूरत है| यह स्वामी विवेकानंद का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था| यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी| बीसवीं सदी के इतिहास ने बाद में उसी पर मोहर लगायी|

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स्वामी विवेकानंद के शिक्षा का अर्थ

स्वामी विवेकानंद मैकाले द्वारा प्रतिपादित और उस समय प्रचलित अेंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के विरोधी थे, क्योंकि इस शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बाबुओं की संख्या बढ़ाना था| वह ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके| बालक की शिक्षा का उद्देश्य उसको आत्मनिर्भर बनाकर अपने पैरों पर खड़ा करना है|

स्वामी विवेकानंद ने प्रचलित शिक्षा को ‘निषेधात्मक शिक्षा’ की संज्ञा देते हुए कहा है कि आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो शेर जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ?

अतः स्वामीजी सैद्धान्तिक शिक्षा के पक्ष में नहीं थे, वे व्यावहारिक शिक्षा को व्यक्ति के लिए उपयोगी मानते थे| व्यक्ति की शिक्षा ही उसे भविष्य के लिए तैयार करती है, इसलिए शिक्षा में उन तत्वों का होना आवश्यक है, जो उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो| स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, “तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा, सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है”

स्वामी जी शिक्षा द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक दोनों जीवन के लिए तैयार करना चाहते हैं| लौकिक दृष्टि से शिक्षा के सम्बन्ध में उन्होंने कहा है कि “हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र का गठन हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और व्यक्ति स्वावलम्बी बने” पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा है कि “शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है”

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु

स्वामी विवेकानंद ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्व भर में है| जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा- “एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है”

उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 7 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली| बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी| इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था|

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डॉ भीमराव अंबेडकर कौन थे? भीमराव अंबेडकर का जीवन परिचय

April 19, 2020 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) जिन्हें उनके लाखों प्रशंसक और अनुयायी स्नेहपूर्वक ‘बाबासाहेब’ नाम से पुकारते हैं| उनका जन्म महु, मध्य प्रदेश में 14 अप्रैल, 1891 को हुआ| उनके पिता का नाम रामजी मालोजी संकपाल और माता का भीम बाई था| वे महार समुदाय एक हिन्दू अछूत जाति महार समुदाय के थे| भाई बहनों में सबसे छोटे होने के कारण परिवार के सभी लोग उनसे बड़ा स्नेह रखते थे|

उनके पिता रामजी बड़े उद्यमी, धार्मिक और सज्जन पुरुष थे और माता भीमबाई एक स्वावलंबी और कर्तव्यपरायण महिला थीं| गरीब होते हुए भी उनके परिवार को पडोसी आदर की दृष्टि से देखते थे| सेना में सूबेदार मेजर, रामजी कबीर पंथी भगत थे और सेना के एक केंप से दूसरे केंप में स्थानान्तिरत होते रहते थे|

अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद, रामजी ने अपने बच्चों का सावधानी और प्यार से पालन-पोषण किया और वह उन्हें भक्तिपूर्ण गीत तथा रामायण और महाभारत जैसे काव्य सुनाया करते थे| घर में इस प्रकार के शुद्ध और धार्मिक वातावरण का ही शायद युवा भीमराव के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिसके परिणाम स्वरूप यथा समय उनमें स्वार्थ रहित सेवा, बलिदान, भातृभाव, दृढ़ता और लगन जैसे गुण फलीभूत हुए|

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डॉ भीमराव अंबेडकर का प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा

सैनिक सेवा से सेवा-निवृत्त होने के बाद, रामजी कुछ समय दापोली तथा सतारा में रहे और अन्त में बम्बई में बस गए| भीमराव ने, जिन्हें पांच वर्ष की आयु में प्राथमिक पाठशाला भेजा गया था, अपनी प्राथमिक शिक्षा सतारा से पूरी की और उच्च शिक्षा जारी रखी| एक अछूत समुदाय से संबंधित बालक होने के नाते, उन्हें सभी प्रकार के कटों, अपमानों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा| उन्हें आम सीत से पानी पीने की अनुमति नहीं थी|

उन्हें फारसी का अध्ययन करने पर मजबूर होना पड़ा था क्योंकि संस्कृत के अध्यापक ने उन्हें संस्कृत पढ़ाने से मना कर दिया था| हालांकि उन्होंने बाद में संस्कृत भाषा सीखी वातावरण दूषित होने के भय से न तो उनकी कापियों की जांच की जाती थी और न ही उनसे कोई प्रश्न ही पूछे जाते थे| इन सभी चुनौतियों से विचलित न होकर वह बम्बई में आए और ऐलफीनस्टोन हाई स्कूल में प्रवेश ले लिया| दुर्भाग्यवश, वहां भी उन पर “मुझे मत छूना” वाली नीतियां लागू की गई|

वर्ष 1955 में, उस समय हिन्दू समाज में व्याप्त परम्परा के अनुसार, भीमराव जिनकी उस समय आयु केवल 14 वर्ष थी, का 9 वर्ष की लड़की रामाबाई से जो कि महार समुदाय से थी, विवाह कर दिया गया| उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन 1938 में रामावाई की मृत्यु हो गई| वर्ष 1948 में डॉ भीमराव अंबेडकर ने बम्बई के सारस्वत ब्राहमण की लड़की डा शारदा कबीर (बाद का नाम सवित) से दूसरी शादी की|

वर्ष 1907 में, भीमराव ने मैट्रिक की परीक्षा पास की “महार लड़के” की इसे एक शानदार सफलता मानते हुए| इस समुदाय ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया और इसके सदस्यों में से एक ने उन्हें “कि लाइफ ऑफ गौतम बुद्ध” की एक प्रति मेंट की| इस पुस्तक से भीमराव के जीवन पर भारी प्रभाव पड़ा जैसा कि उनके जीवन में बाद में हुई घटनाओं से पता चलता है

भीमराव की शिक्षा में रुचि और कठिन परिश्रम के प्रति उनकी ईमानदारी और उत्साह को देखते हुए, बड़ौदा के महाराजा, सयाजी राव गायकवाड़ ने न केवल उनके स्नातक तक अध्ययन के दौरान 25 रुपए प्रतिमाह छात्रवृति मंजूर की बल्कि उने स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद अपने राज्य में नौकरी करने के लिए भी आमंत्रित किया|

हालांकि उन्होंने वहां नौकरी शुरु की, लेकिन वह खुश नहीं थे क्योंकि सामाजिक चुनौतियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और उनके लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण था| तब महाराजा ने भीमराव को गायकवाड़ छात्र के रूप में कोलम्बिया विश्वविद्यालय में इस शर्त पर भेजा कि वापसी पर वह इस राज्य में नौकरी करेंगे|

कोलम्बिया में, भीमराव जाति के कलंक से मुक्त थे और वह समानता के आधार पर इधर-उधर आ जा सकते थे| इस विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. सेलिगमैन उनके अध्यापक थे| शैक्षिक माहौल मुक्त वातावरण और पुस्तकों के प्रति लगाव ने भीमराव के मस्तिष्क स्तर को विशाल बना दिया| इस समय के दौरान वह पके राष्ट्रवादी, लाला लाजपतराय के सम्पर्क में आए, जो उस समय अमरीका में निर्वासित जीवन बिता रहे थे|

वे दोनों भारत में स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में चर्चा किया करते थे| इस तरह भीमराव ने विद्यार्थी होते हुए देशभक्ति के विचारों और आदर्श तथा पश्चिमी उदारवादी लोकतांत्रिक विचारों को आत्मसात कर लिया था जिन्होंने उसे सशक्त राष्ट्रवादी और मानवीय अधिकारों तथा प्रतिष्ठा का प्रबल समर्थक बना दिया|

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वर्ष 1915 में उन्होंने अपने शोष विषय “एनसिएंट इंडिया कॉमर्स” के लिए एम. ए. (इकोनॉमिक्स) की डिग्री प्राप्त की| उससे अगले वर्ष उन्होंने एन्थ्रोपोलॉजी सेमिनार में “दि कास्ट्स इन इंडिया”, “देअर मेकेनिज्म”, “जेनेसिस एण्ड डेवलपमेंट” शीर्षक से समाचार पत्र पढ़ा| इस समाचार पत्र में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया था कि संजातीय विवाह ही जातियों का सार था| उन्होंने यह कहा कि “एक जाति’ “एक संलग्र श्रेणी है और यह मनु के पूर्व भी विद्यमान थी|” वर्ष 1916 में उन्हें उनके शोष विषय “नेशनल डिविडेंड फॉर इंडिया” एक हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी” के लिए पी. एच. डी. की उपाधि प्रदान की गई|

उसी वर्ष अम्बेडकर ने “लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एण्ड पोलिटिकल साईस” में प्रवेश ले लिया था| उन्होंने प्रसिद्ध “प्रेज इन फार ला” में भी प्रवेश ले लिया| यद्यपि वह अपना अध्ययन जारी नहीं रख सके क्योंकि महाराजा ने उनको वापस बुला लिया और उन्हें राज्य के वित मंत्री के पद पर तैयार करने की धारणा से अपना सचिव नियुक्त कर दिया था| लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था|

अम्बेडकर में इस बात के लिए व्याकुलता और निराशा थी कि उनके शैक्षिक, विशिष्टता और विद्धता तथा राज्य में उच्च पद पर आसीन होने के बावजूद भी भारत में सामाजिक परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं आया| उनके अपने अधीनस्थ कर्मचारी उनसे अच्छा व्यवहार नहीं करते थे|

हालाँकि डॉ अम्बेडकर ने यह बात महाराजा को बताई थी लेकिन उनके लिए कुछ नहीं किया जा सका फिर भी, महाराजा उन पर इतने दयालु थे कि डॉ भीमराव अम्बेडकर द्वारा विदेश से अपनी शिक्षा के बाद राज्य में नौकरी करने के लिए दिए गए अनुबन्ध-पत्र के बावजूद भी नौकरी के कुछ महीनों बाद ही उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया था|

एक वर्ष के संघर्ष के बाद डॉ भीमराव ने बम्बई के एक कालेज में राजनीतिक विज्ञान के एक प्रोफेसर के रूप में नौकरी शुरू कर दी| केवल पांच महीने पढ़ाने के बाद, वह अपने अध्ययन को जारी रखने के लिए लन्दन चले गए। उनके इस उदेश्य को पूरा करने में कोल्हापुर के प्रबुद्ध महाराजा ने उनकी सहायता की उन्होंने विधिवक्ता बनने के लिए ‘दि लन्दन स्कूल आफ इकनोमिक्स एण्ड पोलिटिकल साइंस’ और ‘प्रेज इन फार ला” दोनों में पुनः प्रवेश लिया|

उनके शोध विषय “प्रोविंशियल डिसेंट्रलाइजेशन आफ इम्पीरियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया” को लन्दन विश्वविद्यालय द्वारा एम एस सी (इकनोमिक्स) की उपाधि देने के लिए स्वीकार किया गया| वर्ष 1923 में जर्मनी में बोन विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें उनके शोध विषय “दी प्राब्लम ऑफ दी रुपी इट्स ओरिजिन एंड सॉल्यूशन” के लिए डाक्टर आफ साइंस (इकनोमिक्स) की उपाधि से सम्मानित किया गया|

अपने शिक्षा-संबंधी कार्यों में व्यस्त रहने के बावजूद, उनके मन में देश के सामाजिक दृष्टि से पददलित लोगों के प्रति तीव्र भावनाएं होने के कारण उन्होंने अस्पृश्य लोगों की दयनीय स्थिति एवं समस्याओं के बारे में भारत के विदेश मंत्री, श्री ई. एस. मांटेग्यू तथा श्री विट्ठल भाई पटेल से बातचीत के लिए समय निकाला|

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डॉ भीमराव अंबेडकर वकील के रूप में

अनेक ख्यातिप्राप्त विदेशी विश्वविद्यालयों के क्रमिक शैक्षिक उपलब्धियां ग्रहण करने के पश्चात जून 1923 में डॉ भीमराव अम्बेडकर भारत लौटे तथा बम्बई न्यायपालिका के उच्च न्यायालय में वकालत आरंभ की उन्होंने वकालत इसलिए आरंभ की क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास था कि वे अस्पृश्य लोगों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति के लिए कार्य करने के अपने ध्येय को इसी स्वतंत्र व्यवसाय के माध्यम से पूरा कर सकते थे|

साथ ही, इससे उनकी व्यक्तिगत आजीविका भी सुनिश्चित होती थी| किन्तु उच्च न्यायालय में भी, जिसे न्याय का मन्दिर कहा जाता है, डॉ भीमराव अम्बेडकर को उनकी जाति के कारण अपमानित होना पड़ा| वकीलों में अस्पृश्यता की भावना होने के कारण उनके साथ वे कोई व्यवसाय-संबंधी बातचीत नहीं करते थे|

यहां तक कि कैंटीन में काम करने वाला लड़का भी उन्हें चाय नहीं देता था| इस प्रकार, एक अस्पृश्य व्यक्ति होने के कारण, उनमें असाधारण विधि-संबंधी कुशाग्रता होने के बावजूद, वे वकालत के व्यवसाय में फल-फूल नहीं सके| उन्हें “निर्धनों का बैरिस्टर” कहा जाता था|

डॉ भीमराव अंबेडकर सामाजिक असमानता के प्रति विद्रोही के रूप में

अपमान, अनादर और घोर भेदभाव ने उनके इस निश्चय को बल प्रदान किया कि उन्हें अपने लोगों को सामाजिक दासता की बेड़ी से मुक्त कराना है| उनके आगमन से सामाजिक अन्याय और असमानता के विरुद्ध विद्रोह को बढ़ावा मिला| उन्होंने अपने साथियों को अपने मन से ऊंच-नीच की भावना को निकाल देने की अपील की डॉ भीमराव अम्बेडकर ने शोषित वर्ग के लोगों में जागृति पैदा करने के लिए जोरदार प्रयास किए|

उन्होंने संगठन बनाकर, राजनीतिक दल गठित करके तथा समाचार-पत्र और साप्ताहिक लेख आरंभ करके असश्य लोगों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया ताकि उनके लक्ष्य के प्रति समर्थन जुटाया जा सके| 1920 में, उन्होंने एक मराठी पाक्षिक “मूकनायक” (गूंगों का नेता) आरंभ किया|

इससे पहले 1918 में, जब सरकार ने वयस्क मताधिकार संबंधी साउथबोरों रिफामर्ड (फरेन्वाईज) कमेटी का गठन किया, तो डॉ भीमराव अम्बेडकर को साक्ष्य देने के लिए बुलाया गया| उन्होंने दृढ़तापूर्वक शोषित वर्ग के लोगों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल की मांग की, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया|

अस्पृश्यता के विरुद्ध अपना संघर्ष आरंभ करने के लिए डॉ भीमराव ने 1924 में बम्बई में अस्पृश्य लोगों की नैतिक एवं भौतिक प्रगति के लिए “बहिष्कृत हितकारिणी सभा” नाम से एक संगठन को स्थापना की|

अस्पृश्य लोगों के लिए सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए मात्र उपदेश एवं लेखन से संतुष्ट न होने के कारण डॉ भीमराव ने भी आन्दोलन का रास्ता अपनाया| दिसम्बर, 1927 में उन्होंने कोलाबा जिले के महद में अस्पृश्य लोगों के लिए एक सार्वजनिक तालाब “चावाडोर तलेन” से पानी लेने के नागरिक अधिकार प्राप्त करने के लिए एक सत्याग्रह का नेतृत्व किया|

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बाद में, एकत्रित लोगों को सम्बोधित करते हुए डॉ भीमराव ने कहा कि अस्पृश्य लोगों की आत्म-उन्नति केवल अपनी सहायता आप करने, आत्म-सम्मान को पुनः प्राप्त करने एवं आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में ही निहित है| उन्होंने लोगों का सेना, नौसेना और पुलिस में उनके प्रवेश पर सरकारी रोक के विरुद्ध आन्दोलन करने का आह्वान किया तथा स्कूलों, कालेजों और सरकारी सेवाओं में प्रवेश करने की आवश्यकता पर जोर दिया|

लगभग इसी समय से अस्पृश्य लोगों की स्थिति में सुधार सम्बन्धी आन्दोलन ने एक संघर्ष का रास्ता अख्तियार कर लिया| इस प्रकार, शोषित वर्ग के लोगों को डॉ भीमराव अम्बेडकर में एक नये मसीहा और एक विद्रोही की छवि दिखाई दी थी|

वर्ष 1927 में, उन्होंने शोषित वर्ग के लोगों की समस्याओं को जनता के सामने लाने के लिए “बहिष्कृत भारत” नामक एक अन्य मराठी पाक्षिक का आरंभ किया| इसी वर्ष, उन्होंने शोषित वर्ग के लोगों एवं सवर्ण हिन्दुओं के बीच सामाजिक समानता का पाठ पढ़ाने के लिए “समाज समता संघ” नाम से एक संगठन की स्थापना की उक्त संगठन के कार्यक्रम में अन्य बातों के अलावा अन्तर्जातीय विवाह एवं अन्तर्जातीय भोज को भी शामिल किया गया था|

वर्ष 1929 में, जब साइमन कमीशन ने भारत का दौरा किया, यद्यपि कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया, पर डॉ भीमराव ने बम्बई प्रदेश की विधान परिषद के एक सदस्य के रूप में इसके समक्ष साक्ष्य दिया ओर शोषित वर्ग के लोगों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया|

इस कमीशन ने लंदन में एक गोलमेज सम्मेलन आयोजित करने की सिफारिश की जहां विभिन्न पार्टियों के नेता मिलकर विचार-विमर्श कर सकें| डॉ. भीमराव अम्बेडकर को अस्पृश्य लोगों के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया| गोलमेज सम्मेलन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ क्योंकि इसमें भाग लेने वालों में आम राय नहीं बन पाई|

अम्बेडकर का शोषित वर्ग के लोगों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल का सपना उस समय आंशिक रूप से साकार हुआ जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा “कम्यूनल अवार्ड” की घोषणा की गई|

ब्रिटिश सरकार के निर्णय से महात्मा गांधी को सदमा पहुंचा तथा उन्होंने पूना में आगा खां महल में मृत्यु-पर्यन्त उपवास की घोषणा कर दी| महात्मा गांधी के जीवन को बचाने के लिए डॉ भीमराव अम्बेडकर को अलग निर्वाचक मंडल के स्थान पर आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्रों संबंधी बात पर झुकना पड़ा| यद्यपि अस्पृश्य लोगों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उन्नति के उपायों के संबंधों में गांधी और अम्बेडकर के विचार आपस में नहीं मिलते थे, फिर भी, वे एक-दूसरे का बहुत आदर करते थे|

यदि गांधी जी ने अम्बेडकर की विद्वता, निष्कपटता और त्याग की प्रशंसा की और उन्हें एक उत्कृष्ट देशभक्त माना तो अम्बेडकर ने भी गांधी जी की सोद्देश्यता की भावना एवं राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण को स्वीकार किया|

वर्ष 1942 में अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा के लिए अखिल भारतीय राजनीतिक दल के रूप में अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ का गठन किया| हालांकि फरवरी 1946 में हुए आम चुनावों में इस पार्टी ने कोई खास चुनावी सफलता प्राप्त नहीं की|

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डॉ भीमराव अंबेडकर एक संसदविद् के रूप में

जिस उद्देश्य के लिए डॉ भीमराव प्रयत्नशील थे, उसे ध्यान में रखते हुए बम्बई के गवर्नर ने उन्हें 1926 में बम्बई विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया| इस परिषद के वे 1934 तक सदस्य रहे| उक्त एसेम्बली में वे भू-राजस्व, सरकार की मद्यनिवेष नीति, बजट, शिक्षा आदि विषयों पर विस्तारपूर्वक बोला करते थे|

इस अवधि के दौरान उन्होंने किसानों और कामकाजी वर्गों के कल्याण तथा छुआछूत दूर करने के संबंध में कई विधेयक पुरःस्थापित किए लेकिन रुढ़िवादी वर्ग के कड़ा विरोध होने के कारण इन्हें पारित नहीं किया जा सका| तथापि विधानमंडल में अपने पहले ही कार्यकाल में उन्होंने स्वयं को एक प्रखर संसदविद् के रूप में स्थापित कर लिया|

1936 में डॉ भीमराव ने इन्डेपेन्डेन्ट लेबर पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की भारत सरकार अधिनियम 1935 के उपबन्धों के अनुसरण में देश में 1937 में भारत के पहले लोकप्रिय विधानमंडलों के निर्वाचन हेतु मतदान हुआ| इन्डेपेन्डेन्ट लेबर पार्टी ने बम्बई में 17 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें उसे 15 सीटों पर विजय हासिल हुई|

विपक्षी नेता के रूप में डॉ भीमराव ने बम्बई विधानसभा में बड़ी कारगर और सोद्देश्यपूर्ण भूमिका निभाई और एक अनुभवी संसदविद् के रूप में अपनी विद्वता का परिचय दिया| जब मंत्रियों के वेतन संबंधी विधेयक पर चर्चा चल रही थी तो डॉ. अम्बेडकर ने टिप्पणी की कि वे मंत्रियों के लिए किसी भी मानक वेतन को स्वीकार नहीं करेंगे| उन्होंने अपने प्रखर भाषण में तर्कसंगत तरीके से अपनी दलीलों को प्रस्तुत किया| उन्होंने सुझाव दिया कि किसी मंत्री के वेतन निर्धारण में चार बातों का ध्यान रखना चाहिए:-

” पहला मंत्रियों जोकि निःसन्देह सामाजिक नेता है, के सामाजिक स्तर को ध्यान में रखते हुए दूसरा उनकी क्षमता को ध्यान में रखते हुए तीसरा प्रजातंत्र को ध्यान में रखते हुए, और चौथा प्रशासन संबंधी निष्ठा और निष्कपटता को ध्यान में रखते हुए” उन्होंने आगे टिप्पणी की कि व्यक्तिगत रूप से मैं यह समझता हूं कि देश के मंत्रियों को, जोकि देश के प्रथम नागरिक है, एक ऐसा जीवन यापन करना चाहिए जोकि सुसंस्कृत हो, जिससे कला व ज्ञान को बढ़ावा मिले, जो कि जनसाधारण के लिए एक आदर्श बने|

उन्होंने मंत्री की सक्षमता पर भी बल दिया क्योंकि उनके विचार में “यदि हमें विभिन्न समस्याओं का समाधान करना है तथा संविधान अर्थात भारत सरकार अधिनियम, 1935 से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करना है तो कार्यपालिका को विमण्डल होना ही चाहिए|” अपनी प्रखर भाषण क्षमता और विद्वत्ता के कारण डॉ भीमराव वाद-विवाद में अक्सर कड़ा मुकाबला करते थे| इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब वे सभा में बोलने के लिए खड़े होते थे तो सदस्य बड़े ध्यानपूर्वक उन्हें सुना करते थे|

डॉ भीमराव बंगाल विधान सभा से 1946 में संविधान सभा के लिए पहली बार चुने गए| लेकिन विभाजन होने के कारण बंगाल का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ भीमराव सहित कई व्यक्तियों की संविधान सभा से सदस्यता समाप्त हो गई| परिणाम स्वरूप बम्बई लेजिस्लेटिव कांग्रेस पार्टी द्वारा डा. एम आर जायकर के त्यागपत्र से खाली हुए स्थान को भरने के लिए डा. अम्बेडकर को चुना गया|

जब देश में नए संविधान के अन्तर्गत पहली बार चुनाव हुआ तो डॉ भीमराव बम्बई निर्वाचन क्षेत्र से अपना चुनाव हार गए| तथापि उन्हें मार्च 1952 में बम्बई विधान मंडल से राज्य सभा के लिए चुना गया| उन्होंने 1953 में लोकसभा के लिए उपचुनाव लड़ा लेकिन इस समय भी वे हार गए| यद्यपि डॉ भीमराव अम्बेडकर राज्य सभा के सदस्य बने रहे, तथापि उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम वर्षों का बड़ा भाग बौद्ध धर्म प्रचार में लगाया|

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डॉ भीमराव अंबेडकर मंत्री के रूप में

1946 में जब अन्तरिम सरकार बनी, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विधि मंत्री के लिए अम्बेडकर का चुनाव किया| इससे डॉ भीमराव को हिन्दू महिलाओं तथा अस्पृश्यों की नियति में सुधार करने का एक अनुपम अवसर मिला क्योंकि वे हिन्दू समाज में व्याप्त भेदभाव से पूर्णतः परिचित थे| इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने परिश्रमपूर्वक हिन्दू कोड बिल तैयार किया तथा 4 फरवरी, 1951 को इसे संसद में प्रस्तुत किया|

अम्बेडकर ने इस विधेयक का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए बताया कि इसका लक्ष्य हिन्दू समाज में सुधार लाना तथा हिन्दू कानूनों की कतिपय शाखाओं को संहिताबद्ध करना है| इसके महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा किया जाना देश की अखंडता की दृष्टि से भी हितकर है क्योंकि यही कानून हिन्दू समाज की सामाजिक और धार्मिक जीवन पर भी लागू होंगे|

इस प्रकार स्वतन्त्र और गणतन्त्रात्मक भारत के विधि मंत्री के रूप में उन्होंने पुराने, रुढ़िवादी, दुरुह और अनुचित हिन्दू कानून को एक प्रगतिशील कानून में बदलने का प्रथम प्रयास किया| उनके इस प्रयास को ध्यान में रखकर उन्हें “आधुनिक मनु” की संज्ञा दी गई| यह प्रयास यद्यपि सुविचारित और प्रशंसनीय था लेकिन यह कार्यान्वित नहीं हो पाया क्योंकि मंत्रीमंडल में उनके कई सहयोगी इसके विरुद्ध थे और इसलिए अन्ततः यह विधेयक कानून का रूप नहीं ले पाया|

डॉ भीमराव द्वारा 9 मई, 1951 को अंतरिम संसद में जो एक अन्य महत्वपूर्ण विधेयक पुरःस्थापित किया गया था वह था-लोक प्रतिनिधित्व विधेयक, 1950, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ संसद और विधान सभाओं के लिए स्वतंत्र रूप से चुनावों का आयोजन सदस्यता के लिए अर्हताओं और अनर्हताओं को निर्धारित करने तथा चुनावों के दौरान अपनाए जाने वाले भ्रष्ट और अवैध तरीको से निपटने आदि के संबंध में प्रावधान किया गया है|

अम्बेडकर ने, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और अन्य साथियों से विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होने के कारण 25 सितम्बर 1951 को सरकार से त्यागपत्र दे दिया| हालांकि इन मतभेदों के बावजूद, विधि मंत्री के रूप में निश्चय ही वह अपने साथियों के लिए शक्ति पुन्ज थे| एक मंत्री के रूप में उन्होंने सिद्धान्तों के लिये लड़ाई लड़ी और उनके आदर्शवाद ने बहुत हद तक सामाजिक अन्याय की समाप्ति और दलितों के उद्धार को सुनिश्चित किया|

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डॉ भीमराव अंबेडकर संविधान के मुख्य निर्माता के रूप में

एक राष्ट्रीय नेता, विधिवेता, सांवैधानिक विशेषज्ञ और सांसद के रूप में उनकी ख्यति को पूर्ण मान्यता तब मिली जब पहले बंगाल तथा बाद में बंबई से उन्हें संविधान सभा में चुना गया| 29 अगस्त, 1947 को प्रारूप समिति में उनकी नियुक्ति की गई तथा इसके बाद वह इसके चेयरमैन चुने गए| प्रारूप समिति की सदस्यता तथा इसके चेयरमैन का पद डॉ भीमराव अम्बेडकर के लिए एक सुखद आश्चर्य था| यह सभा में उनके दिए गए वक्तव्य से स्पष्ट है|

“मैं संविधान सभा में इस महत्वाकांक्षा के साथ आया था कि अनुसूचित जाति के लोगों के हितों की रक्षा कर सकू| मुझे इस बात का लेशमात्र भी अंदाजा नहीं था कि मुझे इतनी जिम्मेदारी का कार्य करने को कहा जाएगा| इसलिए मुझे जब सभा ने प्रारूप समिति के लिए चुना तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ| मुझे इससे भी अधिक आश्चर्य तब हुआ जब प्रारूप समिति ने मुझे अपना चैयरमैन चुना| प्रारूप समिति में मुझसे बेहतर और अधिक सक्षम व्यक्ति मौजूद थे|

डॉ भीमराव के नेतृत्व में प्रारूप समिति की पहली बैठक 30 अगस्त, 1947 को हुई| अम्बेडकर और उनकी टीम ने कुल मिलाकर 141 बैठकों में अंतरिम संविधान तैयार किया| इस अवधि के दौरान अधिकांश अवसरों पर डॉ भीमराव ने अकेले ही कार्य किया| एक अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता और समाजविज्ञानी होने के नाते अम्बेडकर इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि संविधान मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं होता बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक दस्तावेज होता है जिसमें करोड़ों व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाएं, पीड़ा, मांगे, शामिल होती है|

लोकतंत्र के कट्टर समर्थक के रूप में बाबासाहेब ने भारतीय गणतंत्र के लिए एक संसदीय प्रकार का संविधान बनाए जाने पर जोर दिया| उन्हें अकेले ही भारत के संविधान का निर्माता क्यों कहा जा सकता है इस सम्बन्ध में श्री टी टी कृष्णमाचारी ने निमलिखित वक्तव्य दिया है:-

“सदन को शायद इस बात की जानकारी है कि आपके द्वारा नामित सात सदस्यों में से एक सदस्य ने सदन से इस्तीफा दे दिया था और उसके स्थान पर एक अन्य सदस्य को ले लिया गया था| एक सदस्य की मृत्यु हो गई जिनका स्थान खाली पड़ा हुआ था| एक सदस्य अमरीका में थे और उनका स्थान खाली पड़ा हुआ था| एक अन्य सदस्य राज्य सम्बंधी मामलों में उलझे हुए थे इस कारण उनका स्थान भी खाली था| एक साथ अन्य सदस्य दिल्ली में नहीं थे और शायद स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वे बैठक में भाग नहीं ले सके थे| इस प्रकार अंततः संविधान का प्रारूप तैयार करने का भार डॉ भीमराव अम्बेडकर पर आ पड़ा और मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस कार्य को प्रशंसनीय रूप से पूरा करने के लिए हम उनके आमारी है|”

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प्रारूप समित द्वारा तैयार किया गया संविधान का प्रारूप डॉ अम्बेडकर द्वारा 4 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया| इसके परिचय के बाद उन्होंने संविधान के प्रारूप की विशेषताओं के बारे में एक विशुद्ध और परिष्कृत भाषण दिया| अंततः संकट काल में तथा शांति-काल के दौरान संविधान की संप्राणता और सहिष्णुता के बारे में बोलते हुए उन्होंने टिप्पणी की थीः-

प्रारूप समिति द्वारा तैयार किया गया संविधान व्यावहारिक है| देश को शांति काल तथा युद्ध काल के दौरान नियंत्रित करने हेतु यह पर्याप्त लोचशील और पूरी तरह सक्षम है| वास्तव में, मैं कह सकता हूं कि अगर नए संविधान के अंतर्गत कुछ गलत होता है तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारे संविधान में कोई बुराई है बल्कि यह होगा कि देशवासी चरित्रभ्रष्ट है|”

एक के बाद एक सदस्य ने प्रारूप समिति के चेयरमैन और इसके सदस्यों द्वारा किए गए कठिन कार्य की सराहना की और अम्बेडकर के ओजपूर्ण प्रारंभिक भाषण की प्रशंसा की वर्ष-भर चलने वाले वाद-विवादों में बाबासाहेब ने प्रत्येक स्तर पर जहां संशोधन लाए गए और उन पर विचार किया गया, सक्रिय रूप से भाग लिया और प्रारूप संविधान के पक्ष में स्वीकार्य तर्कसंगत तर्क दिए|

इस बात का पूरा और सही श्रेय बाबासाहेब को ही जाता है उनकी अध्यक्षता में प्रारूप समिति द्वारा तैयार किए गए संविधान को संविधान सभा ने बिना किसी बड़े परिवर्तन के स्वीकार कर लिया था| संविधान सभा द्वारा संविधान स्वीकृत किए जाने से एक दिन पहले सदस्यों ने संविधान निर्माण डॉ भीमराव अम्बेडकर के महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त किया और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की| संविधान सभा के प्रेसीडेट, डा राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान निर्माता के बारे में कहा थाः-

“इस पद पर रहते हुए तथा सदन की दिन-प्रतिदिन की कार्यवाही को देख कर वैसा किसी ने भी महसूस नहीं किया होगा, जैसा मैंने महसूस किया है कि प्रारूप समिति के सदस्यों, विशेष रूप से इस समिति के चेयरमैन, डॉ भीमराव ने अपनी अस्वस्थता के बावजूद किस उत्साह और लगन से कार्य किया है| जिस समय हमने उन्हें प्रारूप समिति में शामिल करके इसका चेयरमैन बनाया था, उस समय हम यह निर्णय नहीं कर पाये थे कि यह निर्णय सही था अथवा कभी सही भी हो सकता है| उन्होंने अपने चयन को न केवल न्यायसंगत ही सिद्ध किया बल्कि अपने किए गए कार्य को उत्कृष्टता भी प्रादन की|”

संविधान का प्रारूप तैयार करने तथा इसे मार्गदर्शक बनाने में बाबा साहेब द्वारा किये गये कठिन कार्य की प्रशंसा करते हुए एक अन्य सदस्य, श्री पट्टाभि सीतारमय्या ने कहाः-

“इतने बड़े एवं कठिन कार्य जो अदम्य, अप्रतिरोध, अजेय था, को साकार करने तथा बड़े छोटे दोनों को समान रूप देकर उन्होंने अपनी प्रखर प्रतिमा का परिचय दिया| जो भी उन्हें उचित लगा, चाहे उसके जो भी परिणाम निकले, उस पर वह डटे रहे|”

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डॉ भीमराव अंबेडकर श्रम कानून के जनक के रूप में / श्रम परिषद् के सदस्य के रूप में

डॉ भीमराव अम्बेडकर की कानूनी कुशाग्रता, शैक्षिक विशिष्टता, वार्ताकारिता और प्रशासनिक योग्यता को देखते हुए तत्कालीन वायसराय ने उन्हें 1942 में रक्षा परिषद् का सदस्य नियुक्त किया था बाद में उन्हें श्रम परिषद् का कार्यभार सौपा गया जिस पर वह जून 1946 तक कार्य करते रहे| यद्यपि यह समय बहुत ही कम था फिर भी देश के श्रम कानून तथा श्रमिक कल्याण के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण समय समझा जाता है|

श्रम परिषद के सदस्य के रूप में, अम्बेडकर को केन्द्रीय सरकार में “अछूतों” के लिए 5 से 6 प्रतिशत पद आरक्षित करवाने में सफलता मिली| उन्होंने उन “अछूत” विद्यार्थियों की भी मदद की जो विदेशों में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक थे| श्रम सदस्य के रूप में, उनके कार्यकाल के दौरान रोजगार कार्यालय स्थापित किये गये ताकि विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत प्रशिक्षित किए जा रहे कुशल तथा अर्धकुशल श्रमिकों एवं तकनीशियनों को बेकार न छोड़ दिया जाए बल्कि रोजगार के नये अवसर पाने में उनकी मदद की जाए|

श्रम सदस्य के रूप में डॉ भीमराव ने औद्योगिक क्षेत्र में लोकतंत्र और सद्भावना को बढ़ावा देने के लिए अनेक उपाय किए| उन्होंने कुछ सामाजिक सुरक्षोपाय भी शुरू किए| सबसे पहले, नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच के मुद्दों को सुलझाने के लिए उन्होंने त्रिपक्षीय वार्ता की शुरूआत की|

औद्योगिक विवादों को रोकने तथा इनका समाधान ढूंढने, श्रम कानूनों को लागू करने तथा केन्द्रीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले उद्योगों में श्रमिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए श्रम प्रशासन गठित किया गया था| उनके कार्यकाल के अंत में सभा में जो महत्वपूर्ण श्रम कानून पेश किया गया था वह ‘न्यूनतम वेतन विधेयक’ था|

इन प्रयासों और विधायी परिवर्तनों के कारण अम्बेडकर के आलोचकों ने भी उनकी प्रशंसा की और उन्हें एक योग्य और हितैषी प्रशासक की संज्ञा दी|

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डॉ भीमराव अंबेडकर एक शिक्षाविद् के रूप में

यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है कि भारत में “अछुतों” को सदियों से मूल शिक्षा के लाभ से वंचित रखा गया था| किसी के जीवन में शिक्षा के महत्व को महसूस करते हुए डॉ भीमराव अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को इस बात के लिए राजी किया कि वे अपने बच्चों को पढ़ाएं| उन्होंने शिक्षा को इतना महत्वपूर्ण समझा कि “शिक्षा” को अपनी “शिक्षा, आन्दोलन और संगठन” संबंधी तीन नारों वाली कार्यवाही में पहला स्थान दिया|

“अछूत” समुदाय के विद्यार्थियों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से डॉ भीमराव ने छात्रावास स्थापित किए और वहां छात्रों को निःशुल्क पुस्तकें एवं कपड़े उपलब्ध कराये| ऐसे छात्रावासों से इन समुदायों में प्राइमरी तथा हाईस्कूल शिक्षा को बढ़ावा देने में काफी मदद मिली|

वर्ष 1945 से 46 में, डॉ भीमराव अम्बेडकर ने अपनी ही शिक्षा संस्थान “दि पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी” की स्थापना की| वायसराय के कार्यकारी परिषद् का सदस्य होने के कारण वह भारत सरकार से तीन लाख रुपये की अनुदान राशि तथा इतनी ही राशि का ब्याजरहित ऋण लेने में सफल रहे| उनकी सोसाइटी के अंतर्गत पहला कालेज बम्बई में खोला गया और इसका नाम “सिद्धार्थ कालेज ऑफ आर्ट्स एण्ड साइन्स” रखा गया|

डॉ भीमराव अंबेडकर अध्यापन में भी काफी रूचि रखते थे| उन्होंने बम्बई के सिडनहम कालेज आफ कामर्स तथा गवर्नमेंट लॉ कालेज में भी पढ़ाया तथा बाद में बम्बई में वे इस लॉ कालेज के प्रिंसिपल बन गये| उनके लेक्चरों को बड़े ध्यान से सुना जाता था तथा कक्षा-कक्ष विद्यार्थियों से पूरा भरा होता था क्योंकि अन्य कालेजों के विद्यार्थियों ने भी यह मत बना लिया था कि उनके विद्वतापूर्ण लेक्चरों को न छोड़ा जाए|

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डॉ भीमराव अंबेडकर लेखक के रूप में

डॉ भीमराव अंबेडकर अत्यधिक अध्ययनशील व्यक्ति ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे लेखक भी थे| उनके लेखों में मानव हित जैसे प्रशासन, मानव शास्त्र, अर्थशास्त्र, वित्त, राजनीति शास्त्र, धर्म इत्यादि विभिन्न विषयों का समावेश था| चार दशकों के अन्दर ही उन्होंने अंग्रेजी में 20 से भी अधिक पुस्तकें, पैम्फलेट तथा लेख लिखे|

डॉ भीमराव ने वर्ष 1920 में भारत में शोषित वर्गों के हितों के समर्थन में पहली साप्ताहिक पत्रिका “मूकनायक” (लीडर ऑफ द डम्ब) शुरू की लेकिन यह पत्रिका काफी दिनों तक नहीं चल सकी| कोलम्बिया में मानव शास्त्र विचार-गोष्ठी में एक विद्यार्थी के रूप में अम्बेडकर की सर्वप्रथम प्रकाशित रचना “दि कास्टस इन इंडिया, दियर मेकेनिज्म, जेनेसिस एण्ड डिवलपमेंट” नाम से पढ़ा गया पत्र था|

वर्ष 1924 में “दि इवोल्यूशन ऑफ प्रोविन्शल फाइनेन्स इन ब्रिटिश इंडिया” शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित उनके पी एच डी शोध कार्य को बड़ौदा के महाराजा को उनके आभार के रूप में समर्पित किया गया| यह पुस्तक बजट पर विचार-विमर्श के दौरान भारतीय विधानमंडलों के सदस्यों के लिए जानकारी प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत सिद्ध हुआ|

उनकी अन्य पुस्तकों में “व्हाट कांग्रेस एण्ड गांधीजी हैव हुन टु र अनटचेबल्स? शूद्र कौन थे और वे भारतीय-आर्य समाज में चुतर्थ वर्ण कैसे बन गये?” “भाषाई राज्यों पर विचार”, “पाकिस्तान पर विचार”, “रानाडे, गांधी और जिन्ना” और “भारत में जातियों का उन्मूलन”

बुद्ध और उनकी शिक्षाओं के सच्चे अनुयायी होने के नाते, उन्होंने 1952 में “बुद्ध उपासना पथ” नामक एक बौद्ध प्रार्थना पुस्तक संकलित की उनकी दूसरी पुस्तक, “बुद्ध और उनका धम्म”, जो 1957 में प्रकाशित हुई थी “बौद्ध बाईबिल” के रूप में जानी जाती है और उसमें बुद्ध का जीवनवृत्त और व्यक्तित्व समाहित है और उसमें धम्म की विश्लेषणात्मक व्याख्या की गई है|

डॉ भीमराव अम्बेडकर एक जीवनी लेखक भी थे| उन्होंने हजारों पुस्तके एकत्र की थी और उनके पास बहुत बड़ा निजी ग्रंथालय था|

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डॉ भीमराव अंबेडकर बौद्ध के अनुयायी के रूप में

डॉ भीमराव अम्बेडकर को सामाजिक विषमताओं, अछूत बालक, वकील और प्रोफेसर के रूप में हुए अनुभवों ने हिन्दू समाज और उसकी रूढ़िवादिता का कट्टर आलोचक बना दिया| अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाने से पहले, अक्तूबर, 1935 में घोषणा की कि अछुत लोग हिन्दू धर्म को छोड़कर कोई और धर्म अपनाएंगे| तदनुसार, पहले वह 1938-40 के दौरान सिख धर्म की ओर उन्मुख हुए| किन्तु, उनके प्रयास सफल नहीं हुए| अन्ततः उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया|

बौद्ध धर्म में डॉ भीमराव का विश्वास इसलिए बढ़ा क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि बुद्ध का धर्म नैतिकता है और बौद्ध धर्म का आदर्श समानता है और जबकि अन्य धर्मों के संस्थापकों ने स्वयं को “मोक्षदाता” होने का दावा किया था, बुद्ध केवल अपनी “मार्गदाता” की भूमिका से ही संतुष्ट थे|

डॉ भीमराव अंबेडकर की बौद्ध धर्म में रुचि का पता विदेशों में हुए विभिन्न सम्मेलनों में उनके सक्रिय रूप से भाग लेने से स्पष्ट होता है| उन्होंने 1949 में काठमांडू में विश्व बौद्ध सम्मेलन को संबोधित किया, और वे 1950 में श्रीलंका में, 1954 में बर्मा में और पुनः 1956 में नेपाल में हुए विश्व बौद्ध कांग्रेस सम्मेलनों में उपस्थित हुए|

उन्होंने 1955 में भारत में बुद्ध की शिक्षाओं का और अधिक प्रचार-प्रसार करने के लिए भारतीय बुद्ध महासभा की स्थापना की| अन्ततः उन्होंने 14 अक्तूबर, 1956 को नागपुर में एक विशाल समारोह में बौद्ध धर्म को अपना लिया और अपने अनुयायियों को नये मत को अंगीकार करने की सलाह दी| उन्होंने स्वयं अपने लाखों अनुयायियों को “दीक्षा” दी|

बौद्ध धर्म अपनाने के पश्चात दो महीने के ही भीतर भारत के इस महान सपूत ने 6 दिसम्बर, 1956 को “महानिर्वाण” प्राप्त कर लिया| भारत सरकार ने डा अम्बेडकर की बहुमूल्य सेवाओं का सम्मान करने के लिए उन्हें मरणोपरांत राष्ट्र का सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” प्रदान कर नेक काम किया है| अब वह उनके जन्म शती वर्ष को सामाजिक-न्याय वर्ष के रूप में मना रही है|

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डॉ भीमराव अंबेडकर प्रशस्तियां और श्रद्धांजलि

सम्पूर्ण राष्ट्र, संसद, राज्यों के विधान मंडलों, समाचार पत्रों, प्रत्येक क्षेत्र से नेताओं, उनके लाखों अनुयायियों और प्रशंसकों तथा विदेशों से आए सम्मानित व्यक्तियों ने इस महान व्यक्तित्व, जिसने आधुनिक भारत की नींव रखने में सहायता पहुंचायी, के दुखद और आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त किया|

डॉ भीमराव अम्बेडकर की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए, लोक सभा के तत्कालीन अध्यक्ष, श्री एम अनन्तसयनम आयंगर ने कहा थाः-

“डॉ भीमराव अंबेडकर का व्यक्तित्व महान और गतिशील था| सामान्य परिस्थितियों से उठकर वे अनुसूचित जातियों के नेता बन गये| वह महान विद्वान और लेखक थे इनमें भी वे सबसे पहले महान वक्ता थे| वे हमारे संविधान के पथ-प्रदर्शक थे| सामाजिक सुधार के क्षेत्र में, उन्होंने अनेक हितकारी उपायों का सूत्रपात किया| उनके निधन से भारत ने एक महान सपूत खो दिया है|”

हमारे संविधान के निर्माण में बाबा साहेब की प्रमुख भूमिका को स्मरण करते हुए, तत्कालीन प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा थाः-

“हम उन्हें अनेक बातों विशेष रूप से संविधान के निर्माण में जो प्रमुख भूमिका उन्होंने निभाई थी, के लिए याद करते है और संभवतः उनके कार्यकलापों की तुलना में यही तथ्य अधिक समय तक याद किया जाता रहेगा|”

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लाल बहादुर शास्त्री कौन थे? लाल बहादुर शास्त्री की जीवनी

November 23, 2017 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

लाल बहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय, वाराणसी – मृत्यु: 11 जनवरी 1966 ताशकन्द, सोवियत संघ रूस), भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे| वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे| इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा| लाल बहादुर जी ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की| भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था|

गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया| परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी| पुलिस मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया| 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये| उन्होंने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिये बहुत परिश्रम किया|

जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण लाल बहादुर शास्त्री जी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया| लाल बहादुर शास्त्री ने 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमंत्री का पद भार ग्रहण किया| उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया| इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था|

लाल बहादुर शास्त्री ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी| इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी| ताशकंद में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी| उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया|

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लाल बहादुर शास्त्री का बचपन और शिक्षा

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में एक कायस्थ परिवार में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था| उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे| बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी| लाल बहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था|

परिवार में सबसे छोटे होने के कारण बालक लाल बहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे| जब नन्हें अठारह महीने का हुआ दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया| उनकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गयीं| कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे| बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया| ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की|

उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई| काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया| इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लाल बहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया|

1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ| ललिता और लाल बहादुर शास्त्री जी की छ: सन्तानें हुई, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र- हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक|

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लाल बहादुर शास्त्री जी का राजनितिक जीवन

संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की| लाल बहादुर शास्त्री जी सच्चे गान्धीवादी थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया|

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में लाल बहादुर शास्त्री की सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा| स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन उल्लेखनीय हैं|

दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भांपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अंग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये|

9 अगस्त 1942 के दिन लाल बहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद पहँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक “मरो नहीं, मारो” में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया| पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये|

लाल बहादुर शास्त्री जी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे| सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डनजी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया| इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी|

इसके बाद तो लाल बहादुर शास्त्री जी का कद निरन्तर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात भारतवर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने|

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लाल बहादुर शास्त्री जी का प्रधानमंत्री काल

उनकी साफ सुथरी छवि के कारण ही उन्हें 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया| उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे| उनके क्रियाकलाप सैद्धान्तिक न होकर पूर्णत: व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थे| निष्पक्ष रूप से यदि देखा जाये तो लाल बहादुर शास्त्री का शासन काल बेहद कठिन रहा| पूँजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन देश हम पर आक्रमण करने की फिराक में थे|

1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया| परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे| संयोग से प्रधानमन्त्री उस बैठक में कुछ देर से पहँचे| उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ|

तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा: “सर क्या हुक्म है?” लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया: “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है?” शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान जय किसान का नारा दिया| इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया| इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी|

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लाल बहादुर शास्त्री जी और भारत पाक का युद्ध

भारत पाक युद्ध के दौरान 6 सितम्बर को भारत की 15वी पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया| इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी| इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा|

भारतीय थलसेना ने दुनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित की| इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी| इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की|

आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से लाल बहादुर शास्त्री पर जोर डाला गया| उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया| हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकन्द न जायें और वे भी मान गयीं|

अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा| जब समझौता वार्ता चली तो लाल बहादुर शास्त्री जी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्ते मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं|

काफी जद्दोजहद के बाद लाल बहादुर शास्त्री पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये| उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं| पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी|

यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वाकई लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर को ही मानते हैं| शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है| उन्हें मरणोपरान्त वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया|

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लाल बहादुर शास्त्री जी की रहस्यमयी मृत्यु

पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करते हुए भारतीय सेना ने लाहौर पर धाबा बोल दिया| इस अप्रत्याशित आक्रमण को देख अमेरिका ने लाहौर में रह रहे अमेरिकी नागरिकों को निकालने के लिए कुछ समय के लिए युद्धविराम की मांग की| रूस और अमेरिका के चहलकदमी के बाद भारत के प्रधानमंत्री को रूस के ताशकंद समझौता में बुलाया गया|

लाल बहादुर शास्त्री जी ने ताशकंद समझौते की हर शर्तों को मंजूर कर लिया मगर पाकिस्तान से जीते इलाकों को लौटाना हरगिज स्वीकार नहीं था| अंतर्राष्ट्रीय दवाब में शास्त्री जी को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा पर लाल बहादुर शास्त्री ने खुद प्रधानमंत्री कार्यकाल में इस जमीन को वापस करने से इंकार कर दिया|

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खान के साथ युद्ध विराम पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटे बाद ही भारत देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का संदिग्ध निधन हो गया| 11 जनवरी 1966 की रात देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री की मृत्यु हो गई| ताशकन्द समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उसी रात उनकी मृत्यु हो गयी| मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया|

लाल बहादुर शास्त्री जी की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन (नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया| जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इन्दिरा गान्धी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नन्दा कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे|

लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे| बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मानते है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से हुई| पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी और इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्रीजी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ|

2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि लाल बहादुर शास्त्री जी के प्राइवेट डॉक्टर आरएन चुघ और कुछ रूस के डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है| बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी मांगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी|

लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली| 2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र (अंग्रेजी: CIA’s Eye on South Asia) नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि “शास्त्रीजी की मत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथलपुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस पहुंच सकती है| ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता|”

सबसे पहले सन् 1978 में प्रकाशित एक हिन्दी पुस्तक ललिता के आँसू में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढंग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था| उस समय 1978 में ललिता जी जीवित थीं| यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में लाल बहादुर शास्त्री जी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है|

जुलाई 2012 में लाल बहादुर शास्त्री जी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी| मित्रोखोन आर्काइव नामक पुस्तक में भारत से संबन्धित अध्याय को पढ़ने पर ताशकंद समझौते के बारे में एवं उस समय की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में विस्तरित जानकारी मिलती है|

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महात्मा गांधी कौन थे? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जीवनी

November 22, 2017 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

मोहनदास करमचन्द गांधी (जन्म: 2 अक्टूबर 1869 – निधन: 30 जनवरी 1948) जिन्हें महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के नाम से भी जाना जाता है| मोहनदास करमचंद गांधी भारत के स्वतंत्रता से पहले और बाद में सबसे महत्वपूर्ण नेता हैं, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के दौरान इतिहास बदल दिया| वे सवज्ञा जन-आंदोलन के जरिए सत्याग्रह का इस्तेमाल करने वालों में प्रथम थे| उनकी सत्याग्रह की अवधारणा पूरी तरह से अहिंसा पर आधारित थी| यह अवधारणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारए कर्म और व्यवहार में दिखाई देती है|

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत ने स्वतंत्रता हासिल की ओर वे दुनिया भर में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा-स्रोत बने| महात्मा गांधी जटिल विचारक और अद्वितीय व्यक्तित्व थे| महात्मा गांधी को विष्वभर में भारी प्रषंसा मिली है लेकिन उन्हें गलत समझा गया है| सबसे पहले रविन्द्रनाथ टैगोर ने गांधी को “महात्मा” का नाम दिया और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें “राष्ट्रपिता” कहकर पुकारा| पष्चिम में चर्चिल ने गांधी को ‘अधनंगा” विद्रोही फकीर कहा| लार्ड वावेल और लार्ड विलिंगटन ने गांधी को ब्रिटिष साम्राज्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया|

मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें कट्टर हिन्दू कहा जबकि दक्षिणपंथी वीर सावरकर, डॉ. केएस हेगडे वार और एमएस गोलंवलकर ने गांधी “महान आत्मा” लेकिन मुसलमान समर्थक था| लार्ड माउंटबैटन ने महात्मा गांधी को एकल व्यक्ति सेना कहा| टाईम पत्रिका ने दलाई लामा, लेक वालेसा, मार्टिन लूथर किंग, लेजर चावेज, आंग सान सू की, बेनिगनो एक्विनो जूनियर, डेसमंड टूटू और नेलसन मंडेला को गांधी की संतान बताया है और उन्हें गांधी की अहिंसा के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी कहा है। गांधी ऐसे व्यक्ति है, जिनके सरोकार समसामयिक लेकिन वे सर्वकालीन हो गये है|

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्रचुर मात्रा में लिखने वाले लेखक थे और उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं| इनमें उनकी आत्मकथा मेरे सत्य के प्रयोग, दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह, हिन्द स्वराज, जान रस्किन की अनटू द लास्ट का गुजराती में संक्षिप्त संस्करण-सत्याग्रह आदि प्रमुख है| गांधी ने भगवद गीता पर गुजराती में टीका लिखी है| जिसका महादेव देसाई ने अंग्रेजी में अनुवाद किया ओर यह वर्ष 1946 में प्रकाषित की गयी| उन्होंने शाकाहार, भोजन, स्वास्थ्य, धर्म, सामाजिक सुधार आदि पर व्यापक रूप से लिखा है| गांधी मूल रूप से गुजराती में लिखते थे|

उन्होंने दषकों तक हरिजन सहित अनेक समाचार पत्र का हिन्दी, गुजराती और अंग्रेजी में संपादन किया| इसी तरह से गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी, तेलुगू, हिन्दी और गुजराती में इंडियन ओपिनियन निकाला| इसके अलावा अंग्रेजी में यंग इंडियन और गुजराती में नवजीवन का संपादन किया| बाद में नवजीवन का प्रकाषन हिन्दी में भी किया गया| इसके अतिरिक्त गांधी प्रतिदिन समाचार पत्रों और अन्य लोगों को अनेक पत्र लिखते थे| महात्मा गांधी की संपूर्ण रचनाओं को भारत सरकार ने “महात्मा गांधी संकलन” के नाम से एक सौ भागों में प्रकाषित किया है|

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महात्मा गाँधी का परिवार और बचपन

मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म दो अक्टूबर 1869 को गुजरात के तटीय शहर पोरबंदर की सुदामापुरी में हुआ था| उनके पिता करमचंद गांधी ब्रिटिष शासन के अधीन काठियावाड़ एजेंसी की छोटी-सी रियासत पोरबंदर के दीवान थे| वे हिन्दू मोठ बनिया समुदाय से संबद्ध रखते थे| वे सच्चे, ईमानदार, साहसी और सिद्धांतों में विष्वास करने वाले व्यक्ति थे| उन्होंने कभी भी ज्यादा धन-संपदा एकत्र करने की महत्वकांशी नहीं थे| उनका परिवार छोटी-सी संपदा के आधार पर चलता था|

महात्मा गांधी के दादा का नाम उत्तमचंद गांधी था| गांधीजी की माता पुतली बाई थी और वह हिन्दु परणामी वैष्णव समुदाय की थी| वह करमचंद की चौथी पत्नी थी| इससे पूर्व उनकी तीन पत्नियों की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गयी थी| धार्मिक स्वभाव की माता और क्षेत्र जैन धर्म ने मोहनदास को शुरुवाती जीवन में ही प्रभावित कर लिया और इस प्रभाव ने उनके पूरे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| गांधीजी की माता धार्मिक विष्वासों और पूजापाठ करने वाली महिला थी| वह शराब और तंबाकू के सख्त खिलाफ थी|

उनकी धर्म में गहरी आस्था थी ओर वे प्रार्थना किए बगैर कभी भोजन ग्रहण नहीं करती थी| महात्मा गांधी ने ऐसे बहुत सारे गुण उनसे ग्रहण किए हैं| माता की धार्मिकों के प्रति गहरी आस्था ने महात्मा गांधी के व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ी| महात्मा गांधी के प्रारंभिक और माध्यमिक स्तर की स्कूली शिक्षा राजकोट में हुई| उनको 12 वर्ष की आयु में अल्फ्रेड हाई स्कूल भेजा गया| वे साधारण किस्म के साधारण विद्यार्थी थे| वे शर्मीले और अन्य बालकों के साथ कम मेलजोल बढाने वाले बालक थे| पूरी स्कूली शिक्षा के दौरान उन्होंने कभी अपने अध्यापकों या सहपाठियों से झूठ नहीं बोला|

अपने बाल्याकाल में गांधी संस्कृत के एक प्राचीन नाटक “श्रवण पितृ-भक्ति” से बेहद प्रभावित हुए| इस नाटक में माता-पिता के प्रति श्रवण के श्रद्धाभाव को प्रकट किया गया है| यह नाटक के बाद माता-पिता की आज्ञापालन गांधीजी का ध्येय बन गया| राजा हरिचंद्र से संबद्ध एक अन्य नाटक का भी महात्मा गांधी पर असर पड़ा जिससे उनके जीवन में सच्चाई और गंभीरता आयी| मई 1883 में 13 वर्षीय मोहनदास का विवाह एक व्यापारी गोकुलदास माकन की पुत्री 14 वर्षीया कस्तूरबाई माकनजी के साथ संपन्न हुआ| बाद में उनका नाम कस्तूरबा पड़ा और लोग प्यार से उन्हें “बा’ कहते थे|

यह क्षेत्र के रीति रिवाजों के अनुसार परंपरागत तरीके से संपन्न बाल-विवाह था| अपने विवाह के दिनों को याद करते हुए महात्मा गांधी ने एक बार कहा था “हमें विवाह के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता था| हमारे लिए विवाह का मतलब केवल नए कपड़े पहनना, मिठाई खाना और रिष्तेदारों के साथ खेलना था|” हालांकि उस समय क्षेत्र में यह परंपरा थी कि किषोरावस्था की दुल्हन को काफी लम्बा समय अपने पति से दूर अपने माता-पिता के घर बिताना होता था|

वर्ष 1885 में 15 वर्ष की आयु में गांधीजी पिता बने| लेकिन वह बच्चा दुर्भाग्य से कुछ ही दिन जीवित रह सका| इसी वर्ष महात्मा गांधी के पिता करमचंद गांधी भी स्वर्ग सिधार गए| मोहनदास और कस्तूरबा के चार बच्चे, सभी पुत्र-हरिलाल (1888), मणिलाल (1892), रामदास (1897) और देवदास (1900) हुए| कस्तूरबा जीवन भर गांधीजी के साथ उनके सभी संघर्षों में मजबूती के साथ खड़ी रही और उनकी पक्की और कट्टर समर्थक साबित हुई|

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महात्मा गाँधी ज्ञान की और

महात्मा गांधी जी ने मैट्रिक की परीक्षा गुजरात के भावनगर में सेमलदास कॉलेज से उत्तीर्ण की| गांधीजी चार सितंबर 1888 को कानून की पढ़ाई के लिए लंदन (इंगलैंड) के लिए रवाना हुए| वहां उन्होंने युनिवर्सिटी कॉलेज में प्रवेष लिया| भारत छोड़ते समय गांधीजी को उनकी माता ने जैन भिक्षु बेचारजी के समक्ष मांस और शराब का इस्तेमाल नहीं करने की सपथ दिलाई| हालांकि गांधीजी ने इंगलैंड में इंगलिष रीति-रिवाजों को अपनाया और नृत्य कक्षाओं में हिस्सा लिया|

इंगलैंड में उन्होंने शाकाहार पर साल्ट की एक पुस्तक पढ़ी| इससे उन्हें न केवल शाकाहारी रहने में माता के समक्ष ली गयी सपथ निभाने में मदद मिली बल्कि उन्होंने अपने जीवन में शाकाहार को एक सिद्धांत के तौर पर अपना लिया| इसके बाद शाकाहार का संदेष फैलाना उनके जीवन का लक्ष्य बन गया| इस प्रयास ने उन्हें और ज्यादा सामाजिक और लोकप्रिय बना दिया| इसी समय महात्मा गांधी जी का परिचय एक कवि हनाचंद्र से हुआ| उनके अनुरोध पर गांधीजी ने अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया|

इससे गांधीजी एक इंग्लिष जैंटल की भूमिका में आ गए, लेकिन उन्होंने जीवन भर एक विद्यार्थी के अनुषासन को बरकरार रखा| गाँधीजी लंदन में धर्मवादियों के संपर्क में आए| उन्होंने गांधीजी को गीता के बारे में बताया| बाद के जीवन में गांधीजी प्रतिदिन गीता पढ़ने लगे| गीता महात्मा गांधी के लिए “विष्व सृजन की कुंजी” थी| उन्होंने गीता को अपनी माता, कामधेनु, पथ-प्रदर्षक और जीवन का स्रोत बताया है| उन्होंने बाईबिल पढना शुरु किया और न्यू टेस्टामेंट, विषेषकर पर्वत पर उपदेष में गहरी रुचि दिखाई|

उन्होंने एडविन अर्नोल्ड की ‘द लाइट ऑफ एषिया” पढ़ी और महात्मा बुद्ध के उपदेषों से प्रभावित हए| गांधीजी ने अपने एक मित्र की सिफारिष पर कार्लाइले की “हीरोज एंड हीरो वारषिप” पुस्तक पढ़ी और पैगम्बर मोहम्मद के बारे में जाना| लंदन में बिताए गए तीन साल गांधीजी के लिए सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक रूप से परिपक्व होने का समय था| इस दौरान उन्होंने न केवल शैक्षिक रूप से अवसर का इस्तेमाल किया बल्कि बौद्धिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से प्रमाणित भी हुए|

इसी समय उन्हें अपने परंपरागत नैतिक मूल्यों को आंकने का समय भी मिला| उनको इसी समय पहली बार यह अवसर मिला कि वे अपने जीवन को दिषा दे और अपनी प्राथमिकताएं और मूल्य तय करें| महात्मा गांधी को 10 जून, 1891 को बैरिस्टर की उपाधि के लिए भारत मिल गया| दो दिन बाद वह लंदन से रवाना हो गए| इसी समय उनको पता चला कि उनकी माताजी का स्वर्गवास हो चुका है| परिजनों ने गांधीजी को यह बात लंदन प्रवास के दौरान नहीं बताई|

महात्मा गाँधी जीविका की तलाश में

महात्मा गांधी ने बम्बई अपनी वकालत जमाने की असफल कोशिश की| इसके लिए उन्होंने एक हाईस्कूल में अंषकालिक अध्यापन के लिए आवेदन किया जिसे स्वीकार नहीं किया गया| इसके बाद वे बम्बई से राजकोट लौटे| यहां उन्होंने लोगों को कानूनी सलाहें देनी शुरु की, जिसे उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी से उलझने के कारण बंद कर दिया|

अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी जी ने इस घटना का जिक्र अपने बड़े भाई के पक्ष में किया गया असफल प्रयास बताया है| इन परिस्थितियों में अप्रैल 1893 को गांधीजी ने दादा अब्दुल्ला एंड कम्पनी का वर्षीय करार स्वीकार कर लिया| इसके तहत उन्हें कम्पनी के दक्षिण अफ्रीका के नेताल कार्यालय में तैनात किया जाना था|

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महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका में

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अप्रैल 1893 में दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो गए| हालांकि उनका परिवार भारत में ही रह गया| दक्षिण अफ्रीका में उनका सामना नस्लवाद, भेदवाद, पूर्वग्रह और अन्य दमनात्मक वातावरण से हुआ| भारतीयों के साथ दिमाग और जीवन पूरी तरह से बदल दिया और वे खुलकर अन्याय के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार हो गए| वे डरबन से प्रिटोरिया जा रहे थे| रास्ते में उन्हें मार्टिजवर्ग रेलवे स्टेशन पर धक्के देकर उतार दिया गया| हालांकि उनके पास प्रथम श्रेणी का टिकट था|

रेलगाड़ी अपने रास्ते पर बढ़ गयी और महात्मा गांधी प्लेटफार्म पर अकेले रह गए| यह सर्दी का मौसम था और भयानक ठंड थी| पूरी रात उनकी आंखों में गुजर गयी| उन्होंने इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने और इसका समूल नाष करने का निष्चय किया| वे अपनी वकालत के जरिए इसका विरोध करने लगे| दक्षिण अफ्रीका की घटनाओं ने गांधीजी को भारतीय समुदाय को एकत्र करने के लिए प्रेरित किया| एक जनसभा में उन्होंने भारतीयों से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने और जाति, जन्म और धर्म से ऊपर उठने को कहा|

उन्होंने भारतीयों का एक संगठन स्थापित करने पर जोर दिया जो उनके अधिकारों की देखरेख करें| उन्होंने इस संगठन को अपनी सेवा ओर समय मुफ्त में देने का प्रस्ताव किया| महात्मा गांधी ने अब्दुल्ला एंड कंपनी के साथ अपना अनुबंध पूरा किया और इसके बाद 20 वर्ष तक दक्षिण अफ्रीका में रहे| इस दौरान वे भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए सक्रियता से संघर्ष करते रहे| दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के दौरान गांधीजी के जीवन जीने के तरीके में जबरदस्त बदलाव आया| उनकी जीवनषैली साधारण से साधारण होती गयी|

वे अपना घरेलु काम-काज स्वयं करने लगे| उन्होंने कपड़ों पर नाममात्र का खर्चा करना तय किया| उन्होंने अस्पतालों में स्वयंसेवक के तौर पर काम किया| वे लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दे जैसे रंगभेद, गरीबी और असमानता का कड़ा विरोध करते थे| दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधीजी ने सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया और जीत हासिल की| जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू दिस लास्ट’ पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जीवनषैली में बदलाव करने का फैसला| उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की और उसे फीनिक्स का नाम दिया| फीनिक्स डरबन में टालस्टाय फार्म के नजदीक स्थापित किया गया|

जनवरी 1915 में महात्मा गांधी भारत लौटे और वह वकील के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के एक अनुभव कार्यकर्ता के तौर पर आए थे| गांधीजी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में परिचय गोपाल कृष्ण गोखले ने कराया| गांधीजी ने कांग्रेस के एक अधिवेषन में भारतीय मुद्दे, राजनीति और भारतीयों को केन्द्र में रखकर भाषण किया| गांधीजी का यह पूरी तरह से मानना था कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की जीवनषैली साधारण होनी चाहिए| उन्होंने इसे अपने जीवन में उतारते हुए पश्चिमी वस्त्रों का परित्याग कर दिया| पश्चिमी रहन-सहन सफलता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था|

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महात्मा गाँधी का भारत में सत्याग्रह

दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद पहला साल महात्मा गांधी पूरे देश के भ्रमण पर रहे| इस दौरान वे “बंद मुंह और खुले आंख कान” से भारत को देखते समझते रहें| वर्ष 1917 में उन्होंने बिहार के चंपारण में अपना पहला सत्याग्रह आरंभ किया, जिसमें उन्हें सफलता प्राप्त हुई| इसके बाद अहमदाबाद में कपड़ा मिल में बोनस के मुद्दे पर हड़ताल हुई| यह हड़ताल 21 दिन चली और महात्मा गांधीजी ने अपना पहला तीन दिन का उपवास रखा| यह उपवास भी सफल रहा| मिल मालिकों और मजदूरों में जल्दी समझौता हो गया|

महात्मा गांधीजी का अगला सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा जिले में हुआ| फसलों के खराब होने के कारण किसान लगान के संबंध में कुछ रियायत चाहते थे| इस सत्याग्रह में राष्ट्रीय स्तर के कई नेताओं ने हिस्सा लिया और सरकार ने आकलन का काम निलंबित कर दिया| गांधीजी की लोकप्रियता बढ़ती रही| इस स्वतंत्रता के आंदोलन में लोगों की सहभागिता बढ़ी| गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया जिसमें समाज के सभी वर्गों ने हिस्सा लिया|

गांधीजी और अन्य ने 11 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से डांडी के लिए 240 मील लम्बी पैदल यात्रा शुरू की| गांधीजी और उनके सहयोगियों ने 6 अप्रैल 1930 को डांडी में नमक कानून तोड़ा| भारत का कोई भी हिस्सा इससे अछूता नहीं रहा| उन्हें अपार जन-समर्थन मिला और पूरा राष्ट्र उनके साथ खड़ा हो गया| इस सत्याग्रह से स्वराज की नींव पड़ी और यह न केवल भारत से बल्कि पूरी दुनिया से ब्रिटिष राज के उन्मूलन की शुरूआत थी| मैं इस मनमानी के खिलाफ अधिकारों के संघर्ष में पूरे विश्व का समर्थन चाहता हूं|

डांडी : 5 अप्रैल, 1930 सरकार ने लार्ड एडवर्ड इर्विन के प्रतिनिधित्व में गांधीजी के साथ बातचीत करने का फैसला किया| इसके परिणामस्वरूप् मार्च 1931 में महात्मा गांधी-इर्विन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए| ब्रिटिष सरकार ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने पर सहमति जताई| इसके बदले में नागरिक सविज्ञा आंदोलन स्थगित करना पड़ा| इस समझौते के परिणाम स्वरूप लंदन में गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया| इसमें गांधीजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर आमंत्रित किया गया|

इस सम्मेलन से महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रवादी निराष हुए क्योंकि यह मुख्य रूप से राजे-रजवाड़ों और अल्पसंख्यकों पर केन्द्रित रही| इसमें सत्ता हस्तांतरण पर अर्थपूर्ण बात नहीं हो सकी| वर्ष 1932 में सरकार ने नए संविधान के तहत अछूतों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की| इसके विरोध में गांधीजी ने सितंबर 1932 में छह दिन का अनषन किया| भारी जन दबाव में सरकार को पातावलंकर बालू की मध्यस्थता में बातचीत के जरिए समान निर्वाचन प्रणाली स्वीकार करनी पड़ी| इससे गांधीजी ने अछूतों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए नया आंदोलन शुरू किया गया|

उन्होंने अछूतों को नया नाम “हरिजन’- “ईष्वर की संतान” कहा| महात्मा गांधीजी ने 8 मई 1933 को हरिजन आंदोलन की मदद के लिए आत्मद्धि के वास्ते 21 दिन का उपवास किया| गांधीजी ने दलितों के जीवन स्तर में सुधार के लिए बहुत काम किए| वर्ष 1936 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेषन और नेहरू के अध्यक्ष बनने के बाद गांधीजी सक्रिय राजनीति में लौटे| गांधीजी अपना ध्यान पूरी तरह से स्वतंत्रता पर केन्द्रित करना चाहते थे और भारत के भविष्य के बारे में अटकलबाजी नहीं करते थे|

उन्होंने कांग्रेस को समाजवाद का लक्ष्य हासिल करने का मकसद स्वीकार करने से नहीं रोका| सुभाष चंद्र बोस 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए| महात्मा गांधी जी की आलोचना के बावजूद सुभाष को दुबारा कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया| उन्होंने कांग्रेस में लागू किए सिद्धांतों को छोड़ना शुरु किया तो अखिल भारतीय नेताओं ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया| इसके बाद सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस छोड़ दी|

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महात्मा गाँधी आजादी की और

वर्ष 1939 में द्वितीय विष्व युद्ध शुरू हो गया| महात्मा गांधी ब्रिटिष शासन को युद्ध में “अहिंसक नैतिक सहयोग देने के पक्ष में थे लेकिन कांग्रेस के अन्य नेता भारत को एकतरफा रूप से युद्ध में झोंक देने से नाराज थे| उनका कहना था कि ब्रिटिष शासन ने भारत को युद्ध में शामिल करने से पहले निर्वाचित प्रतिनिधियों से कोई सलाह मषविरा नहीं किया है| इसके विरोध में उन्होंने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया| काफी लम्बे विचार-विमर्ष के बाद घोषित किया कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के लिए लड़े जा रहे इस युद्ध में भारत पक्षकार नहीं बनेगा क्योंकि उसे स्वतंत्रता देने से इंकार किया गया है|

जैसे-जैसे युद्ध सघन होता गया वैसे-वैसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आजादी की मांग तेज कर दी| इसी समय “अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ का आह्वान करते हुए एक प्रस्ताव तैयार किया गया| स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में भारत छोड़ो आंदोलन सबसे सषक्त आंदोलन बना| इस दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और गिरफ्तारियां की गयी| पुलिस की गोली से हजारों स्वतंत्रता सेनानी मारे गए या घायल हुए| लाखों लोग जेलों में ढूंस दिए गए| महात्मा गांधी और उनके सहयोगियों ने यह साफ कर दिया कि भारत को आजादी मिलने तक युद्ध में अंग्रेजों का साथ नहीं दिया जाएगा|

महात्मा गांधीजी ने साफ कह दिया कि व्यक्तिगत हिंसा के कारण आंदोलन नहीं रोका जाएगा| उन्होंने कहा कि व्यवस्थागत अराजकता, वास्तविक अराजकता से भी बुरी है| उन्होंने सभी कांग्रेस जनों और भारतीयों से अहिंसा के जरिए अनुषासन बनाए रखने की अपील की और “करो या मरो’ का मंत्र दिया| ब्रिटिष सरकार ने 9 अगस्त 1942 को गांधीजी और कांग्रेस कार्यकारी समिति के सभी सदस्यों को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया| गांधीजी को दो वर्ष के लिए पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद कर दिया गया| यहीं पर महात्मा गांधी को व्यक्तिगत जीवन में दो बड़े झटके सहने पड़े|

उनके निजी सचिव पचास वर्षीय महादेव देसाई का हृदयाघात से निधन हो गया और इसके छह दिन बाद ही 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी स्वर्ग सिधार गई| गांधीजी को खराब स्वास्थ्य के कारण युद्ध समाप्ति के पहले 6 मई 1944 को रिहा कर दिया गया| इसके बाद गांधीजी को एक के बाद एक सफलता मिलती गयी और उनके नेतृत्व में भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया| इस दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने का आह्वान किया तो मुस्लिम लीग ने वर्ष 1943 में देश का विभाजन करके जाने संबंधी प्रस्ताव पारित किया|

माना जाता है कि महात्मा गांधी आजादी के दौरान देश के विभाजन संबंधी मांग के खिलाफ थे और उन्होंने एक समझौता भी सुझाया था जिस पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों की सहमति जरूरी थी| इसमें कहा गया था कि एक अस्थायी सरकार के कार्यकाल में आजादी हासिल की जाए और फिर मुस्लिम आबादी की बहुलता वाले जिलों में जनमत संग्रह कराकर विभाजन के सवाल को भी हल किया जा सकता है|

जब जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई का आह्वान किया तो महात्मा गांधी बहुत क्रद्ध हो गये थे और वे दंगों से सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में लोगों का कत्ले आम रोकने के लिए चल पड़े थे| उन्होंने भारतीय हिन्दुओं, मुसलमानों और ईसाइयों को एकजुट रखने के लिए कड़ी मेहनत की और हिन्दू समाज में ‘अछूतों को भी दूसरों की तरह राजनीतिक-सामाजिक अधिकार दिये जाने की लड़ाई लड़ी|

14 और 15 अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम लागू कर दिया गया और उसी के साथ इस पूर्व ब्रिटिष भारतीय साम्राज्य में लगभग 1.25 करोड़ लोगों का विस्थापन भी देखने को मिला| इस विस्थापन के दौरान मरने वाले लोगों का आंकड़ा कुछ लाख से लेकर दस-लाख तक होने का अनुमान है|

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महात्मा गाँधी का बलिदान

महात्मा गांधीजी नियमित रूप से प्रार्थना सभा किया करते थे जिनमें सभी धर्मों एवं सम्प्रदायों के लोग शामिल होने के लिए स्वतंत्र थे| ऐसी ही एक प्रार्थना सभा में 30 जून 1948 को नाथूराम गोड्से ने उनकी हत्या कर दी| वह “हे राम’ शब्द का उच्चारण करते हए जमीन पर गिर पड़े थे| इस तरह अहिंसा का प्रचारक हिंसा का शिकार हो गया| यमुना नदी के तट पर 31 जनवरी 1948 को उनकी पार्थिव देह राख में तब्दील हो गयी| गांधीजी की हत्या के बाद जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को रेडियो के जरिए संबोधित करते हुए कहा, “हमारी जिंदगी से रौशनी चली गयी है और चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा है|

मैंने रौशनी चले जाने की बात कही वह गलत है| हमारे देश में चमकने वाली यह रौशनी कोई आम रौशनी नहीं थी, यह ऐसी रौशनी थी जिसने तात्कालिक समय से कहीं अधिक चीजों का प्रतिनिधित्व किया| इसने जीवन, शाष्वत सत्य को दर्षाया, हमें सही रास्ते के बारे में याद दिलाया, हमें गलतियों से दूर रखा और इस प्राचीन देश को आजादी के मुकाम तक पहुंचाया| एक बड़ी त्रासदी हमें जिंदगी की सभी बड़ी चीजों के बारे में याद दिलाने तथा उन छोटी चीजों को भूल जाने का प्रतीक है जिनके बारे में हम बहुत अधिक सोचते रहते हैं|

अपनी मौत से भी वह हमें जीवन की बड़ी चीजों, शाष्वत सत्य की याद दिला गये हैं| अगर हमें यह चीज ध्यान रही तो यह भारत के लिए अच्छा ही होगा|” महात्मा गांधीजी ने मार्टिन लूथर किंग, जेम्स लासन, नेल्सन मंडेला, खान अब्दुल गफ्फार खां, स्टीव बिको, आंग सान सूची और बेनिग्नो अकिनो जैसे कई प्रमुख नेताओं और राजनीतिक आंदोलनों को प्रभावित किया| मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1955 में कहा, “यी ने हमें लक्ष्य दिये और महात्मा गांधी ने उन्हें हासिल करने के खास तरीके बताये|”

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सितंबर 2009 में वेकफील्ड हाईस्कूल में दिये अपने भाषण में कहा कि वह अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा महात्मा गांधी से प्रेरित हुए| ओबामा ने 2010 में भारतीय संसद के संयुक्त अधिवेषन को संबोधित करते हुए कहा, “मुझे इस बात का एहसास है कि अगर महात्मा गांधी और अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए दिये गये उनके संदेष नहीं होते तो मैं आज अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में आज आपके समक्ष खड़ा नहीं होता|” गांधी की जिंदगी और उनकी शिक्षाओं ने बहुतों को प्रभावित किया जो गांधी को अपना मार्गदर्षक बताते हैं अथवा जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गांधी के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दी|

महात्मा गांधी की पहली जीवनी “गांधी : ए पैट्रियर इन साउथ अफ्रीका” 1905 में लंदन इंडियन क्रानिकल में जब प्रकाषित हई थी उस समय गांधी अधिक चर्चित शख्सियत नहीं थे| यह जीवनी जोसफ जे. ड्रोक ने लिखी थी| यूरोप में सबसे पहले रोमा रोलां ने 1924 में प्रकाषित अपनी पुस्तक ‘महात्मा गांधी’ के जरिए गांधी के बारे में चर्चा की थी| ब्राजील की अराजकतावादी-नारीवादी लेखिका मारिया लासेर्दा दि मरा ने भी शांतिवाद संबंधी अपने लेखन में गांधी का उल्लेख किया था|

कई जीवनी-लेखकों ने गांधी के महात्मा जीवन का विवरण देने की भी कोशिश की| इनमें डी.जी. तेंदुलकर की आठ खंडों में प्रकाषित “महात्मा : लाइफ ऑफ मोहनदास करमचंद गांधी’ तथा प्यारेलाल और सुषीला नायर की दस खंडों में प्रकाषित ‘महात्मा गांधी’ पुस्तकें शामिल हैं| फिल्मों, साहित्य और रंगमंच में भी महात्मा गांधी को रूपायित करने की कोशिश की गयी है| वेन किंग्सले ने 1982 में प्रदर्षित फिल्म ‘गांधी’ में शीर्षक भूमिका निभायी थी| वर्ष 2006 में प्रदर्षित बालीवुड फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ की मुख्य कथावस्तु गांधी के विचार ही हैं|

इसी तरह सन् 2007 में आयी फिल्म ‘गांधी माई फादर’ गांधी और उनके बड़े बेटे हरिलाल के रिश्तो को बयान करती है| वर्ष 1996 में आयी फिल्म ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ ने गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास को पेश किया था| गांधी के जीवन और उनके कृत्यों के बारे में विस्तार से चर्चा करता वृत्तचित्र ‘महात्मा : लाइफ ऑफ गांधी’ भी है जो 14 खंडों में है और छह घंटे की अवधि वाला है| प्रतिष्ठित पत्रिका ‘टाइम’ ने 1930 में गांधी को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति घोषित किया था| बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के लिए वर्ष 1999 में कराये गये एक सर्वेक्षण में गांधी महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के बाद दूसरे स्थान पर रहे थे|

टाइम पत्रिका ने ही महात्मा गांधी को वर्ष 2011 में 25 सर्वकालिक राजनीतिक हस्तियों में से एक बताया| संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करके महात्मा गांधी के जन्म दिन 02 अक्टूबर को “अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने का फैसला किया| गांधी के शहादत दिवस 30 जनवरी को पहले से ही कई देशों में स्कूली स्तर पर ‘अहिंसा एवं शांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है| भारत में गांधी के जन्मदिन पर राष्ट्रीय अवकाष रहता है|

भारत महात्मा गांधी की हत्या वाली तारीख 30 जनवरी को ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाकर देश की सेवा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले लोगों को सम्मानित करता है| भारत में महात्मा गांधी को खास तौर पर समर्पित दो मंदिर भी बने हुए हैं| एक मंदिर उड़ीसा के संबलपुर में स्थित है, जबकि दूसरा मंदिर कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले में काडूर के पास बना हुआ है| गांधी की तस्वीर हरेक भारतीय नोट पर भी अंकित रहती है| गांधी कदम-दर-कदम उस ऊंचाई तक पहुंचे जहां पहले कोई भी नहीं पहुंच सका था| अपने जीवन काल में करोड़ों लोगों को प्रेरित करने वाले महात्मा गांधी आज भी दुनिया भर में लोगों की प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं|

उनके विचार अमर और समय-सिद्ध हैं तथा उन्हें आम आदमी की समझ में आ सकने लायक सरल-सहल भाषा में लिखा गया है| वह आम इंसानों के बीच बहत बड़ी शख्सियत के रूप में उभरकर सामने आये और उन्होंने लाखों लोगों को राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय स्वतंत्रता के प्रति जागरूक बनाया| उन्होंने इन लोगों को गलत कार्यों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए ‘अधिकारों के अहिंसक व्यवहार का तरीका बताकर व्यावहारिक रास्ता भी सुझाया|

संक्षेप में कहा जाए तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सच्चाई से सच्चाई तक का सफर तय कर रहे थे और विश्व इतिहास के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने परिवर्तन के लिए अहिंसा की संस्कृति से अवगत कराया| हमने महात्मा गांधी के साथ ही अपने सम्मान और स्वाभिमान को भी दफन कर दिया गया है| अब गांधीवाद के मूलभूत सिद्धांतों और तत्वों को अपनाने का समय आ गया है| गांधीवादी सिद्धांत सभी धार्मिक विचारों का निचोड़ है और ये मानव-केन्द्रित दृष्टिकोण के लिए अनिवार्य भी हैं|

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