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Agriculture

पुदीना (मेंथा) की खेती: किस्में, रोपण, सिंचाई, देखभाल और पैदावार

December 16, 2018 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

व्यापारिक जगत में जापानी पुदीना (Mint) को ही मेंथा के नाम से जाना जाता है| लेकिन तकनीकी रूप से मेंथा शब्द पुदीना के एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें पुदीना की कई किस्में सम्मिलित हैं, जैसे- जापानी पुदीना या पिपर मिन्ट| इस प्रकार मेंथा के समूह में कई किस्में सम्मिलित हैं, जिनमें से एक किस्म जापानी पुदीना भी है| वर्तमान में विश्व भर में जापानी पुदीना के उत्पादन के क्षेत्र में भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि प्रथम स्थान चीन को प्राप्त है|

जबकि पिपर मिन्ट और स्पीयर मिन्ट के उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका को प्रथम स्थान प्राप्त है| वर्तमान में उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा इत्यादि, पुदीना के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं| इनके साथ-साथ अन्य राज्यों में भी मेंथा की खेती वृहत रूप से अपनाई जा रही है, क्योंकि परम्परागत खेती ज्यादा लाभकारी न होने के कारण किसानों का ध्यान मेंथा की खेती की ओर खींचता जा रहा है|

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पुदीना की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

पुदीना की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है| वैसे इसकी खेती उष्ण तथा उपोषण जलवायु में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है| पुदीना फसल की अच्छी बढ़वार के लिए दिन का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस और रात का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए| भारत की जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है|

पुदीना की खेती के लिए भूमि का चयन 

पुदीना के लिए समतल, अच्छे जल निकास वाली भूमि जो बलुई दोमट हो एवं जिसमें जीवांशों की प्रचुरता हो और जिसका पी एच मान 6.0 से 7.5 हो, जापानी पुदीना की खेती के लिए अच्छी होती है| भारत की सामान्य पी एच मान वाली लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है| भारी और चिकनी मिटटी में पौधों के विकास में कठिनाइयाँ होती है|

पुदीना की खेती के लिए खेत की तैयारी

पुदीना की बिजाई करने से पूर्व खेत को अच्छी प्रकार तैयार करना आवश्यक होता है| मिट्टी पलटने वाली हल से 2 से 3 बार अच्छी जुताई करके पाटा लगाकर मिट्टी भुरभुरी कर लें| अंतिम जुताई से पहले 15 से 20 टन सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें| दीमक तथा सूक्ष्मकृमि की बचाव के लिए 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की खल्ली खेतों में मिलाई जाती है|

खेत तैयार होने के उपरांत खेत की छोटी-छोटी क्यारियों में विभाजित कर दें, ताकि सिंचाई देने में आसानी हो, इससे सकर्स की मात्रा कम लगती है और पौधा रोपण पर खर्च में कटौती होती है| रबी की फसल के उपरान्त किसानों को मेंथा की फसल से अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है साथ ही साथ खरपतवार नियंत्रण पर कम खर्च होता है|

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पुदीना की खेती के लिए उन्नत किस्में

कोसी, हिमालय, कुशल, गोमती और शिवालिक प्रमुख किस्में हैं, यह किस्में कुशल तेजी से बढ़ती है एवं इसका उत्पादन भी दूसरी किस्मों से लगभग दोगुना होता है|

पुदीना की खेती के लिए रोपण का समय

जापानी पुदीना की रोपाई कभी भी (अधिक ठंड को छोड़कर) की जा सकती है, लेकिन इसका सर्वाधिक उपयुक्त समय वह रहता है, जब सर्दी का मौसम लगभग समाप्त हो रहा हो एवं गर्मी का मौसम प्रारंभ हो रहा है|

भारत में मध्य जनवरी से मध्य फरवरी तक का समय पुदीना की बुआई के लिए सर्वोत्तम है, परन्तु जिन क्षेत्रों में रबी की फसल लगाई गई हो वहाँ उनकी कटाई के बाद 30 मार्च तक जापानी पुदीना की बुआई की जा सकती है|

पुदीना की खेती के लिए प्रवर्धन तकनीक

पुदीना का प्रवर्धन आमतौर पर जड़ भाग द्वारा किया जाता है, जिसे सकर्स कहते हैं, 5 से 7 सेंटीमीटर लम्बा सकर्स 4 से 5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरी होता है| प्रत्येक सकर्स के टूकड़े में कम से कम एक आंख (नोड) होनी चाहिए| अच्छे सकर्स मांसल, रसीले तथा सफेद होते हैं एवं सकर्स रोगमुक्त होने चाहिए| पहले से लगाई गई फसल को उखाड़कर उसकी निचली हिस्से से सकर्स प्राप्त करते हैं|

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पुदीना की खेती के लिए रोपण की विधि

जापानी पुदीना की बुआई दो विधियों द्वारा की जाती हैं, नर्सरी द्वारा और मुख्य खेत में सीधे बुआई जो इस प्रकार है, जैसे-

नर्सरी द्वारा- सबसे पहले सुविधानुसार 5 X 10 फीट की क्यारियाँ बनाते हैं| इन क्यारियों के किनारे को लगभग एक फीट ऊँचा रखते हैं| इन क्यारियों में खरपतवार नही होने चाहिए, प्रत्येक क्यारी में 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद डालकर अच्छी तरह जोतकर मिट्टी भुरभुरी बनाएं|

तैयार क्यारियों में धान की क्यारी की तरह ही पानी से भर दें एवं जापानी पुदीना की कटी हुई सकर्स को नर्सरी में बिखेर दें| साथ ही साथ सकर्स को बिखेरने से पहले उन्हें साफकर के रात भर गोमुत्र (एक भाग गोमुत्र तथा दस भाग पानी) में डुबोकर रखते हैं| इसके अलावा कार्बोडजिम से उपचार भी किया जा सकता है|

मुख्य खेत में सीधे बुआई- इस विधि में नर्सरी में पौधों को तैयार करने की आवश्यकता नहीं होती है| सकर्स को सीधे मुख्य खेत में रोपाई कर दी जाती है|यह शार्ट-कट विधि है, परन्तु यह विधि उपयुक्त नहीं है, क्योंकि एक तो फसल के उगने के साथ हीं खरपतवार भी उग आते हैं, जिसकी रोकथाम में काफी खर्च आता है एवं दूसरा खेत में अधिक गैप रह जाने की संभावना होती है, क्योंकि कुछ संकर्स में उगाव नहीं भी हो सकता है|

इस विधि से बुआई के लिए एक से दो क्विंटल सकर्स की रोपाई वैसे हीं करते हैं- जैसे, धान की रोपाई करते हैं| पर खेत को केवल गीला रखते हैं, पानी लगाकर बुआई करने से फायदा यह रहता है, कि सकर्स का उगाव अधिक होता है तथा खेत खाली नहीं रहता है| मुख्य खेत में पौधों को 60 X 45 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाया जाना उपयुक्त रहता है|

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पुदीना की खेती में पोषक तत्व प्रबंधन

पुदीना हेतु आमतौर पर 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश की अनुशंसा की जाती है| इनमें से फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा सकर्स रोपाई के पहले दी जानी चाहिए|

नाइट्रोजन की शेष मात्रा प्रत्येक कटाई के बाद 2 से 3 बार में देना चाहिए| यदि खेत की तैयारी के समय 15 से 20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट डाली गई हो तो उर्वरकों की अतिरिक्त मात्रा देने की आवश्यकता नहीं होती है|

पुदीना की खेती में सिंचाई प्रबंधन

पुदीना की अच्छी बढ़त तथा अच्छी फसल प्राप्ति के लिए पर्याप्त सिंचाई की जरूरत होती है| इसलिए जहाँ सिंचाई की उचित व्यवस्था न हो वहाँ यह फसल न लगावें| खेत में हमेशा नमी बनाए रखने की आवश्यकता होती है, इसलिए जल्द व हल्की सिंचाई अत्यंत आवश्यक है| मार्च में 10 से 15 दिन के अन्तर से, अप्रैल से जून में 6 से 8 दिन के अन्तर से और सर्दियों में 20 से 25 दिन पर हल्की सिंचाई करें|

ड्रिप सिंचाई पद्धति द्वारा सिंचाई करने से समय के साथ-साथ पानी की भी बचत होती है| फसल की प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करें, खेतों में नमी की कमी होने पर फसल की वृद्धि रूक सकती है|

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पुदीना की खेती में खरपतवार रोकथाम

खरपतवार पुदीना की बढ़त को तो रोकते ही हैं साथ ही पुदीने के तेल में अनैच्छिक बदबू उत्पन्न कर उसकी गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं, इसलिए खरपतवार की रोकथाम आवश्यक है| खरपतवारों का रोकथाम हाथ से निराई-गुड़ाई द्वारा और खरपतवारनाशी दवा के उपयोग से किया जा सकता है|

अच्छी रोकथाम के लिए कारमेक्स 80 डब्ल्यू पी, 700 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर फसल के जमाव से पहले छिड़काव करें एवं फिर 30 से 40 दिन बाद निराई करें| इसी तरह दूसरी कटाई के एक महीना बाद भी एक निराई-गुड़ाई कर दें|

पुदीना की खेती में पौधा संरक्षण

पुदीना फसल पर लगने वाले प्रमुख कीटों में सेमीलुपर सुन्डी, रोएंदार सुण्डी तथा जालीदार कीट हैं| जिनमें सर्वाधिक नुकसान रोएँदार सुन्डी से होती है| जो कि पत्तों के हरे उत्तकों को खाकर इन्हें कागज की तरह जालीदार बना देती है| जिससे पुदीना फसल को काफी हानि होती है, इसके रोकथाम के लिए क्विनैलफॉस के 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए|

सेमीलुपर सुन्डी एवं जालीदार कीट के रोकथाम के लिए मेलाथियॉन 50 ई सी का 300 से 400 मिलिलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें| कभी-कभी इस फसल पर सूत्रकृमियों का भी आक्रमण हो जाता है, जिससे सकर्स में गाँठे बन जाती हैं, जड़े फूल जाती है और जड़ों पर लाल धारियाँ बन जाती है| पौधा पीला एवं बौना रह जाता है, इसकी रोकथाम के लिए खेत की तैयारी के समय ही 5 से 7 क्विंटल नीम की खल्ली प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें|

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पुदीना की फसल की कटाई

जापानी पुदीना एक वर्षीय फसल है तथा एक वर्ष के दौरान तीन कटाईयाँ ली जा सकती है| पुदीना फसल की पहली कटाई 90 से 115 दिन के उपरान्त पौधों पर हल्के सफेद व जामुनी रंग के फूल दिखाई दें, या जब 60 से 70 प्रतिशत पौधों में फूल आ जाते हैं|

पौधों की कटाई भूमि सतह से 6 से 8 सेंटीमीटर की ऊँचाई से करते हैं| दूसरी पहली के कटाई 70 से 80 दिन बाद व तीसरी दूसरी कटाई के 70 से 80 दिन बाद करते हैं| तीसरी कटाई के बाद पौधों का विस्तार नहीं करना चाहिए| पुदीना फसल की कटाई चमकीली धूप में दोपहर के समय तेज धारदार दराती से करें|

फसल काटने के बाद कम से कम 6 घंटे खेत में हीं पड़े रहने दें, ताकि अतिरिक्त नमी सूख जाये| वैसे फसल काटने के 6 घंटे से तीन दिन के भीतर आसवन करके तेल निकाल लेना चाहिए, हरे पुदीना के व्यवसाय के लिए आवश्यकतानुसार कटाई कर के तुरन्त भेज दें|

पुदीना की फसल से पैदावार

जापानी पुदीना से लगभग 300 से 350 किलोग्राम तेल प्रति प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है| प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा कई बातों पर भी निर्भर करती है, जैसे- उगाई गई प्रजाति, फसल की वृद्धि, फसल की कटाई का समय, प्रयुक्त किया गया आसवन संयंत्र आदि, फिर भी शाक की तुलना में 0.5 से 2 प्रतिशत तक तेल प्राप्त हो सकता है| यदि हरा पुदीना विपणन की सुविधा है, तो उत्पादनकर्ता को अधिक फायदा हो सकता है|

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वर्षा आधारित खेती में आय बढ़ाने वाले सुझाव और आधुनिक तकनीकें

December 15, 2018 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र देश के कुल खेती क्षेत्रफल के लगभग 60 से 65 प्रतिशत भू-भाग में फैला हुआ है| ये क्षेत्र महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि राज्यों के साथ देश के बाकि राज्यों तक फैला हुआ है| प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से इन क्षेत्रों में, देश में पाई जाने वाली सभी मिट्टियाँ (लाल, काली, जलोढ़, नवीन जलोढ़, तलछटी, मिश्रित मिट्टि आदि) विद्यमान हैं| एक केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान के अनुसार वे क्षेत्र जहां 30 प्रतिशत से कम सिंचित क्षेत्रफल है, वर्षा आधारित खेती क्षेत्र कहलाते हैं|

इन क्षेत्रों में खेती उत्पादन पूर्ण रूप से मानसूनी तथा गैर मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है| अक्सर ये क्षेत्र सूखे से ग्रसित होते हैं और प्रत्येक तीन वर्षों में अक्सर एक बार सूखा पड़ता है| पश्चिमी व् पूर्वी राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्य इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं|वर्तमान में ये क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं|

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इन क्षेत्रों के अंतर्गत लगभग 48 प्रतिशत खाद्यान्न फसल क्षेत्र तथा लगभग 68 प्रतिशत अखाद्यान्न फसल क्षेत्र आते हैं| इन क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, मक्का, दलहन, मूंगफली, कपास व् सोयाबीन की कुल बिजाई क्षेत्रफल का क्रमशः 92, 94, 80, 83, 73 व् 99 प्रतिशत हिस्सा बोया जाता है| यह सर्वविदित है, कि खेती की समृद्धि मिटटी की गुणवत्ता और जल की उपलब्धता व इन दोनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर निर्भर करती है| इसके अलावा एकीकृत फार्म प्रबंधन के सभी महत्वपूर्ण घटकों जैसे- काश्त, पशु, चारा, मछली, बागवानी, खेती-वानिकी, रोग तथा कीट, कृषि यांत्रिकीकरण, विपणन तंत्र प्रबंधन आदि|

वर्तमान में वर्षा आधारित क्षेत्र विभिन्न प्रकार की समस्याओं से ग्रसित हैं| इनमें आमतौर पर नैसर्गिक या प्राकृतिक समस्याओं, ढलान वाली भूमि सतह, मिटटी में फसल पोषक तत्वों की कमी, मिटटी जैविक कार्बन अंश का कम होना, कमजोर मिटटी संरचना, अधिक तापमान आदि का उल्लेख किया जा सकता है| इनके अतिरिक्त सामाजिक समस्याएं (गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्या, जोत विखंडीकरण आदि), आर्थिक समस्याएं (कम निवेश क्षमता, खेती ऋण की अनुपलब्धता, समुचित बीमाकरण जैसी सुविधा की कमी, खेती विपणन आदि) तथा अन्य समस्याएं (अपर्याप्त भंडारण सुविधा, कृषि आगतों की उपलब्धता में कमी, परिवहन सुविधा की कमी, मंडी की अनुपलब्धता)

इन क्षेत्रों की कृषि को और अधिक विकट बना देती है| उपरोक्त समस्याओं के अतिरिक्त कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई तकनीकियों का उचित समय पर किसानों तक न पहुंच पाना भी इन क्षेत्रों में खेती उत्पादन की गिरावट का प्रमुख कारण है| यद्यपि इन समस्याओं के समाधान की दिशा में सरकार व् गैर सरकारी संगठनों द्वारा कई कारगर प्रयास किए जा रहे हैं| यही कारण है, कि इन क्षेत्रों के किसानों की कृषि आय को दोगुना करने के लिए अधिक प्रयासों और योजनाओं की आवश्यकता है|

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वर्षा आधारित खेती में समस्याएँ और तकनीक

वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों की प्रमुख समस्याएँ व् उपयुक्त तकनीक, जैसे-

समस्याएँ-

1. वर्षा आधारित क्षेत्रों में असंतुलित पोषक तत्व प्रबंध|

2. असंतुलित मात्रा में रासायनिक खादों का उपयोग|

3. मिटटी की निचली सतह पर बनी कठोरता या कठोर परत|

4. रेतीली मिटटी में अधिक सतह जल भेदता|

5. वर्षा आधारित क्षेत्रों में काली मिटटी में कम सतह जल भेदता|

6. मिटटी सतह पर वर्षा उपरांत सतह पर कठोर परत का बनना|

7. वर्षा आधारित क्षेत्रों में तीव्र जल बहाव और मिटटी क्षरण|

8. वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक फसल अवशेषों की कमी|

9. वर्षा जल संग्रहण का उचित प्रबंधन न होना|

10. संग्रहित जल का विवेकपूर्ण एवं तार्किक रूप से प्रबंधन न होना|

11. वर्षा आधारित क्षेत्रों में अंत:फसलीकरण का अभाव|

12. वर्षा आधारित क्षेत्रों में वर्ष भर (हरे चारे की अनुपलब्धता)|

13. कृषि वानिकी आधारित कृषि प्रणालियों का अभाव|

14. क्षेत्र विशेष के लिए विकसित की गई खेत प्रणालियों का विस्तार न होना|

15. वर्षा आधारित क्षेत्रों में उपयुक्त कृषि यंत्रों की अनुपलब्धता की कमी|

16. वर्षा आधारित क्षेत्रों में कृषि मौसम परामर्श सेवाओं का अभाव|

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कारण-

1. अन्य उपयोग (ईंधन, घर लेपना आदि) के कारण लगातार जैविक खादों (गोबर की खाद) की उपलब्धता में गिरावट|

2. मिटटी परीक्षण सुविधाओं की कमी और समय पर सभी आवश्यक खादों की अनुपलब्धता|

3. कुछ प्रकार की मिटटी (लाल) में नैसर्गिक रूप से कठोर परत का विद्यमान होना और साल दर साल एक ही प्रकार के कृषि यंत्रों द्वारा निश्चित गहराई पर जुताई क्रियाएं करना|

4. भुरभुरी मिटटी संरचना और अधिक मात्रा में वृहद मिटटी छिद्रता का होना|

5. मिटटी में चिकने कणों (क्ले) की अधिकता और कम मात्रा में वृहद मिटटी छिद्रता|

6. कमजोर मिटटी संरचना के साथ मिटटी सतह पर किसी भी प्रकार के जैविक आवरण का न होना|

7. नैसर्गिक रूप से मिटटी सतह पर अधिक ढलान होना|

8. कई प्रकार की मिटटी में सतह जल भेदता का कम होना|

9. वर्षा आधारित क्षेत्रों में अधिक तीव्रता के साथ वर्षा होना|

10. मिटटी सतह पर किसी भी प्रकार का जैविक आवरण न होना|

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11. ज्यादातर क्षेत्रों में एकल फसल प्रणाली का होना|

12. जैविक फसल अवशेषों को मिटटी में न मिलाकर अन्य उपयोगों में लाना|

13. वर्षा आधारित क्षेत्रों में छोटी खेत जोत आकार होना|

14. वर्षा आधारित क्षेत्रों में कई खेत जोतों पर प्राकृतिक ढलान न होना|

15. वर्षा आधारित क्षेत्रों में लागत की समस्या|

16. किसान द्वारा ज्ञान के अभाव में लंबी अवधि की फसलें लगाने से अधिक जल की आवश्यकता|

17. किसानों द्वारा उदासीनता और अधिक मेहनत न करने की वजह से परंपरागत रूप से एक ही फसल बोना|

18. किसानों द्वारा हरा चारा उत्पादन पर विशेष ध्यान न देना एवं सूखे चारे पर ही निर्भर रहना|

19. तकनीकियों का किसानों तक सुचारू रूप व समयबद्ध तरीके से न पहुंचना|

20. विस्तार तंत्र की कमी एवं किसान ज्ञान में कमी तथा शुरुआती लागत की समस्या और कृषि यंत्रों की लागत की समस्या|

21. किसानों का कम शिक्षित होना और अभी भी आम किसानों की पहुंच से दूर होना|

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उपयुक्त तकनीक या सुझाव-

1. वर्षा आधारित क्षेत्रों में कुल फसल पोषक तत्वों की मांग का 50 प्रतिशत भाग जैविक खादों द्वारा पूरा करना|

2. मिटटी स्वास्थ्य परीक्षण के आधार पर क्षेत्र, फसल और मिटटी विशेष के अनुसार रासायनिक खादों का प्रयोग करना|

3. वर्षा आधारित क्षेत्रों में प्रत्येक तीन से पांच साल के अंतराल पर एक बार गहरी जुताई करना|

4. वर्षा आधारित क्षेत्रों में बिजाई पूर्व मिटटी की सतह पर वजनी रोलर 500 से 2000 किलोग्राम को कई बार घुमाना|

5. चिकनी मिट्टी या तालाब की गाद को 2 प्रतिशत की दर से मिटटी में मिलाना व रेगिस्तानी तकनीकी 2 प्रतिशत चिकनी मिट्टी मिलाने के बाद सतह पर रोलर घुमाना|

6. वर्षा आधारित क्षेत्रों में 2 से 5 टन प्रति हैक्टर जिप्सम के साथ 2 से 10 टन प्रति हैक्टर की दर से गोबर की खाद का प्रयोग करना|

7. हल्के खेती यंत्रों द्वारा सतह पपड़ी को तोड़ना और बीज कतारों में 1 से 2 टन प्रति हैक्टर गोबर की खाद डालना या बीज कतारों पर फसलावशेषों जैसे- चावल, गेहूं का भूसा, नारियल की जटा, मूंगफली का छिलका आदि डालना|

8. वर्षा आधारित क्षेत्रों में काली मृदाओं में जिप्सम का प्रयोग करना एवं गहरी जुताई करना और ढलानों के विपरीत जुताई व बिजाई करना

9. वर्षा आधारित क्षेत्रों में मिटटी के अनुसार बिजाई सतह विन्यास में बदलाव करना|

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10. वर्षा आधारित क्षेत्रों में 1.5 प्रतिशत सतह ढलानों वाली काली मृदाओं में सम्मोच्च विधि, टिला और कुंड, उत्थित क्यारी, उपखंड क्यारी, संरक्षित नाली, घांसी क्यारी आदि सतह विन्यास में बिजाई करना|

11. फसलों की कटाई मिटटी सतह से 10 से 60 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर करना एवं मिटटी सतह को ढकने वाली फसलें जैसे- कुल्थी, मूंगबीन, सोयाबीन, उड़द, लोबिया आदि लगाना|

12. वर्षा आधारित क्षेत्रों में हरी खादों का प्रयोग करना एवं खेती की सीमा पर जैवभार पैदा करने वाले वृक्षों को लगाकर इसकी टहनियों की कतरने और पत्तियों को मिटटी सतह पर डालना|

13. बीज बनने के पूर्व खरपतवारों के जैवभार को मिटटी सतह पर डालना बड़ी खेत जोतों के लिए खेत तालाब तकनीक और सामूहिक भूमि पर सामुदायिक तालाब तकनीक अपनाना|

14. वर्षा आधारित क्षेत्रों में क्षेत्र विशेष के अनुसार कम अवधि एवं अधिक लाभदायक फसलों (सब्जियां, औषधियां, घास आदि) की प्रजातियां लगाना| क्षेत्र विशेष में विद्यमान कृषि विश्वविद्यालय से समय-समय पर इनकी जानकारी लेना|

15. विभिन्न फसल प्रणालियों (कपास आधारित, चावल आधारित, सोयाबीन आधारित आदि के लिए, अंत:फसलीकरण की तकनीकियां विकसित की गई हैं, उदाहरण के लिए पौष्टिक अनाज आधारित कृषि प्रणाली, जहां की वार्षिक वर्षा 561 से 936 मिलीलीटर होती है के लिए निम्नलिखित अंत:फलीकरण प्रणालियों का सुझाव दिया गया है, जैसे- ज्वार+अरहर (2:1), सूरजमुखी+ अरहर (2:1), चना+कुसुम (3:1), बाजरा+अरहर (2:1), बाजरा+मोठ (2/3:1), ज्वार+ अरहर (1:1), अरहर+बाजरा (1:3), चना+कुसुम (3:1), चना+ज्वार (1:2), अरहर+मूगफली (1:3), अरहर+मूग (1:1), जौ+चना (3:2), बाजरा+ग्वार (2:1), रागी+अरहर (10:1), सोयाबीन+रागी (1:1), मूंगफली+अरहर (8:2) आदि|

16. भारतीय चारागाह और चारा अनुसंधान संस्थान, द्वारा विभिन्न तकनीकियां विकसित की गई है| इनमें से एक अर्ध-शुष्क वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए सुबबूल+पेनिसेटम टू इस्थो पनिक-ज्वार, चारा+ अरहर अनुक्रमण सबसे प्रभावी तकनीक है|

17. वर्षा आधारित क्षेत्रों में वन-चारागाह तकनीकी, फसल वृक्ष तकनीकी, फसल बागवानी तकनीकी और अर्ध-शुष्क ऊष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अफ्रीकन विटरर्थान+अंजन घास+पेड़ पंक्तियों के बीच बाजरा, उड़द एवं मूग लगाना आदि|

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प्रभाव-

1. अनुसंधान दर्शाते हैं, कि 2 से 10 टन प्रति हैक्टर की दर से जैविक खाद (गोबर की खाद) देने से लगभग सभी फसलों में अपेक्षित बढ़ोतरी और मिटटी स्वास्थ्य में सुधार होता है|

2. वर्षा आधारित क्षेत्रों की विभिन्न फसलों की उपज में 5 से 50 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ मिटटी स्वास्थ्य को इसके उच्चतर स्तर पर पाया गया है|

3. एक परिक्षण में पाया गया की मिटटी की चिजल हल से गहरी जुताई करने से बाजरा, मूंगफली, चना, मूंग के बीजोत्पादन में 18 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि होती तथा इसी प्रकार उत्तर-पश्चिमी भारत की मिटटी की गहरी जुताई करने से गेहूं और राया सरसों में क्रमश: 17 से 41 प्रतिशत बीजोत्पादन में बढ़ोतरी होती है|

4. वर्षा आधारित क्षेत्रों में विभिन्न फसलों जैसे- बाजरा, मक्का, ज्वार, ग्वार आदि के बीजोत्पादन में 29 से 39 प्रतिशत बढ़ोतरी देखी गई, जिसकी मुख्य वजह रही मिटटी जल संचालकता में कमी और अधिक मिटटी जल की उपलब्धता|

5. विभिन्न क्षेत्रों में फसल पैदावार और मिटटी स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार|

6. विभिन्न फसलों जैसे- बाजरा, कपास, ज्वार और मक्का के बीजांकुर में 4 से 33 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई| लाल मिटटी में विभिन्न जैविक पदार्थों की प्रभावशीलता निम्नलिखित रूप से देखी गई जैसे- गोबर की खाद 10 टन प्रति हैक्टर, नारियल की जटा 20 टन प्रति हैक्टर, मूंगफली का छिलका 5 टन प्रति हैक्टर, जिप्सम 4 टन प्रति हैक्टर, चावल का भूसा 5 टन प्रति हैक्टर|

7. नाली पद्धति से बिजाई करने से मध्य प्रदेश में ज्वार की फसल में 27 प्रतिशत और इसी फसल में बढ़ोतरी देखी गई और क्यारी में कूड बिजाई से मूंग और ज्वार में क्रमश: 19 से 25 प्रतिशत बढ़ोतरी देखी गई| इसी प्रकार अनेक क्षेत्रों में उत्थित क्यारी में बिजाई करने से फसलों में 10 से 55 प्रतिशत बढ़ोतरी देखी गई है|

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8. एक बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा वर्षा आधारित क्षेत्रों में किए गए अनुसंधान दर्शाते हैं, कि संग्रहित जल से विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाई जा सकती हैं और फसल मध्य सूखे के दौरान जीवन रक्षा सिंचाई करके फसलों को बचाया जा सकता है, इससे पैदावार में भरपूर बढ़ोतरी देखी गई है|

9. वर्षा आधारित क्षेत्रों में कम अवधि तथा अधिक सूखा सहन करने वाली फसलों से किसान की आय में वृद्धि|

10. अनुसंधान दर्शाते हैं, कि उपरोक्त अंत:फलीकरण से न केवल फार्म से आय में वृद्धि दर्ज की गई बल्कि बदलते हुए जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने में भी सहायता मिली है और अंत:फलीकरण का मिटटी स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है|

11. उपरोक्त प्रणाली में हरा चारा 50 से 55 टन प्रति हैक्टर प्रति वर्ष+सूखा चारा 13 से 14 टन प्रति हैक्टर प्रति वर्ष+0.41 टन प्रति हैक्टर प्रति वर्ष अनाज प्राप्त होता है एवं इस चारा उत्पादन प्रणाली की लागत केवल 25,000 रुपए प्रति हैक्टर प्रति वर्ष है|

12. अनुसंधान दर्शाते हैं, कि शुद्ध कृषि योग्य फसल की तुलना में वर्षा आधारित क्षेत्रों में वृक्ष आधारित खेत प्रणाली से अधिक लाभ:लागत अनुपात होता है|

13. वर्षा आधारित क्षेत्रों में मौजूदा फसल प्रणाली (अरहर+ज्वार) के मुकाबले तीन गुना अधिक आय, केवल फसल प्रणाली के मुकाबले समेकित प्रबंधन में शुद्ध आय में लगभग आठ गुना वृद्धि और केवल फसल प्रणाली के मुकाबले शुद्ध आय में पांच गुना वृद्धि एवं केवल फसल प्रणाली के मुकाबले शुद्ध आय में तीन गुना वृद्धि देखी गई है|

14. प्रिसीजन प्लांटर से बिजाई करने से विभिन्न फसलों (मक्का, अरंडी) के बीजांकुर में 10 से12 प्रतिशत बढ़ोतरी देखी गई है|
समय-समय पर कृषि परामर्श सेवाएं प्रदान करके विभिन्न क्षेत्रों फसल उपज में बढ़ोतरी दर्ज की गई और किसानों को मौसमी जोखिम से बचाकर विभिन्न आगतों पर होने वाले खर्चे को कम किया जा सका है|

15. वर्षा क्षेत्रों के किसानों की कृषि आय को दोगुना करने के लिए अन्य प्रयासों के साथ-साथ क्षेत्र विशेष एवं फसल विशेष के लिए जारी की गई नवीनतम तकनीकियों का प्रयोग अति आवश्यक है| ऐसे क्षेत्रों के लिए जारी कुछ तकनीकियों का विवरण उपरोक्त लेख में दर्शाया गया है|

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वर्षा आधारित खेती से आय दोगुना करने सुझाव

वर्षा आधारित क्षेत्रों में किसानों की आय को दोगुना करने के लिए सुझाव, जैसे-

1. अनुसंधान, नीतियों एवं कार्यक्रमों का दायरा प्रत्येक किसान के खेत पर केंद्रित करने की आवश्यकता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की विविधता विद्यमान है|

2. वर्षा आधारित क्षेत्रों में विकसित की गई कृषि तकनीकों को समय के साथ पुनः परिष्कृत या संशोधित करके पूर्ण पैकेज के रूप में किसानों तक पहुंचाया जाना चाहिए|

3. प्राकृतिक संसाधनों में मिटटी और जल के समुचित प्रबंधन को सर्वोपरि प्राथमिकता देते हुए, वर्षा आधारित क्षेत्रों में इस दिशा में अधिक कार्य करने की आवश्यकता है|

4. तकनीक के सभी घटकों (बीज, रासायनिक खाद, बिजाई यंत्र, पशुधन की नस्लें, खेत तालाब आदि) को एक साथ किसानों तक पहुंचाया जाए, साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, कि किसानों को उत्पादित माल की उचित कीमत प्राप्त हो|

5. वर्षा आधारित क्षेत्रों में फसल विविधीकरण के साथ कृषि प्रणाली में पशुधन को शामिल करने की जरूरत है| गांव स्तर पर सामुदायिक बीज एवं चारा बैंक, सामुदायिक उपयोग केंद्र, कृषि बीमा, विपणन तंत्र आदि पर नीतियां और क्रियान्वयन के लिए ठोस रणनीति बनाने की आवश्यकता है|

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6. वर्तमान में कृषि, ज्ञान आधारित होती जा रही है, इसलिए ऐसी रणनीति और योजनाएं बनाने की जरूरत है, जिनसे शिक्षित युवा इस तरफ आकर्षित हो सके|

7. कृषि मौसम सलाह को प्रत्येक गांव के स्तर तक पहुंचाने की अति आवश्यकता है, इस दिशा में कृषि विस्तार तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है, साथ ही साथ वर्षा आधारित क्षेत्रों में कृषि विस्तार की नई विधाएं विकसित करने की आवश्यकता है, जिससे उपलब्ध तकनीकों और सूचनाओं को सरल भाषा और तीव्रता के साथ किसानों तक पहुंचाया जा सके|

8. कृषि आगतों (बीज, रासायनिक खाद, जीवाणु खाद, कृषि यंत्र, रोग और कीटनाशक दवाइयां आदि) की सुगम एवं सुलभ उपलब्धता की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है|

9. वर्षा आधारित क्षेत्रों में तकनीकी दक्षता हासिल करने के लिए वैज्ञानिकों के बहुआयामी और बहु संस्थान दल तैयार कर अनुसंधान का दायरा बढ़ाने की नितांत जरूरत है|

समय पर उपरोक्त सुझावों पर कार्रवाई की जाती है, तो इससे कृषि प्रणाली में स्थिरता, प्रतिस्पर्धा, विपरीत जलवायु से लड़ने की क्षमता के साथ ही उपलब्ध संसाधनों का संरक्षण एवं समुचित उपयोग भी किया जा सकता है| इस प्रकार इन क्षेत्रों के किसानों में कृषि आय को दोगुना करने की क्षमता भी विकसित की जा सकती है|

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सतावर की खेती: किस्में, रोपण, सिंचाई, खाद, देखभाल और उत्पादन

December 14, 2018 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

सतावर का वानस्पतिक नाम एसपैरागस रेसमोसस विभिन्न औषधीय पौधों में सतावर एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है| जिसका उपयोग प्राचीन समय से ही पारम्परिक औषधि के रूप में किया जा रहा है| सतावर एक बहुवर्षीय कन्दयुक्त झाड़ीनुमा औषधीय पौधा है, जिसको शतमूली, सतावरी एवं शतवीर्य भी कहते है| सतावर लिलियसी कुल का पौधा है| सतावर का पौधा एशिया का देशज है, जिसकी बेलें सम्पूर्ण भारत वर्ष में पायी जाती हैं|

सतावर का क्षुप 3 से 5 फीट ऊँचा होता है, जो कंटक युक्त झाड़ीनुमा आरोही लता के समान बढ़ता है| इसलिए पौधे को सहारे की आवश्यकता होती है, जो बांस या अन्य किसी शाखा द्वारा सहारा देना चाहिए| पत्तियां बारीक सुई के समान होती है, जो 1.0 से 2.5 सेंटीमीटर तक लम्बी होती हैं| इसके फल मटर के आकार वाले कठोर गुठली के रूप में होते हैं|

जो पकने पर लाल हो जाते हैं| इसके बीज काले और जड़े कन्दयुक्त लम्बी गुच्छों में होती है| इस लेख में सतावर की खेती कैसे करें और इसकी औषधि उपयोगिता, खेती प्रक्रिया एवं पैदावार की जानकारी का उल्लेख किया गया है|

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सतावर का औषधीय उपयोग

इसकी कन्दिल जड़े मधुर और रसयुक्त होती है| इसकी औषधीय गुणवत्ता बुद्धिवर्धक, दुग्धवर्धक, शुक्रवर्धक, बलकारक, कामोद्दीपक, मूत्रावरोध, मानसिक रोग, अतिसार, वात, पित्त विकार दूर करने वाली के रूप में जानी जाती है| सतावर की जड़ों का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में दुधारू पशुओं में होने वाले थनैला रोग के उपचार के लिए व्यापक रूप से किया जाता है|

सतावर की खेती के लिए मिट्टी एवं जलवायु

इसकी खेती के उष्ण, समशीतोष्ण और शीतोष्ण नम जलवायु सर्वोत्तम रहती हैं| इसकी खेती के लिए बलुई, बलुई दोमट, लाल मिट्टी जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो, उपयुक्त होती है|

सतावर की खेती के लिए बीज की मात्रा

सतावर की खेती 2.0 से 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है|

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सतावर की खेती के लिए पौध नर्सरी

इसकी नर्सरी तैयार करने के लिए नर्सरी बेड़ जिसकी लम्बाई और चौड़ाई 2.0 x 1.0 मीटर रखते है, मई के अन्तिम सप्ताह में बुवाई कर देते है| बीज की बुवाई नर्सरी बेड पर कतार से कतार और पौध से पौध की दूरी 5 सेंटीमीटर रखते हुए करते हैं| लगभग एक माह बाद बीजों से अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है| नर्सरी तैयार होने में 2.5 से 3.0 माह का समय लगता है|

सतावर की खेती के लिए रोपण का समय

नर्सरी में मई के अन्तिम सप्ताह में बोये गये बीज अंकुरण पश्चात् मध्य जुलाई से अगस्त तक लगभग 75 से 80 दिन में रोपण हेतु तैयार हो जाते है|

सतावर की खेती के लिए रोपण विधि

पौध रोपण का कार्य अगस्त माह में करना सर्वोत्तम रहता है| पौध रोपण करने से पूर्व खेत में 1 x 1 मीटर पर 30 x 30 x 30 सेंटीमीटर के गड्ढे खोदकर मिट्टी, खाद और बालू का 1 : 1 : 1 के मिश्रण से गड्ढे भर देते है| पौध रोपण 60 x 60 सेंटीमीटर करने से अच्छी पैदावार प्राप्त होती है| लेकिन 60 x 90 सेंटीमीटर एवं 90 x 90 सेंटीमीटर की दूरी पर भी कर सकते हैं| बागों में दो पौधों के बीच की जमीन में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है, जो कि अतिरिक्त आय का अच्छा स्रोत है|

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सतावर की खेती के लिए किस्में

सतावर की किस्मों के विकास के लिए प्रयास जारी है| आशा है, जल्दी ही उन्नत प्रजातियों का मानकीकरण हो जायेगा|

सतावर की खेती में खाद और उर्वरक

खेत की तैयारी के समय 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी हुयी खाद की आवश्यकता पड़ती है और जहां तक सम्भव हो सके तो रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग न करें|

सतावर की खेती में निराई-गुड़ाई

इसकी अच्छी पैदावर के लिए निराई-गुड़ाई आवश्यक होती है| पौध रोपण के लगभग 3 माह बाद पहली निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए| इसके पश्चात् वर्ष में दो बार निराई-गुड़ाई करके खेत से खरपतवार निकाल देना चाहिए|

सतावर की खेती में सिंचाई प्रबंधन

ग्रीष्म ऋतु में एक माह के अन्तराल पर दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है|

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सतावर की फसल के कंदों की खुदाई

रोपाई के 24 से 30 माह बाद पौधे खुदाई के लिए तैयार हो जाती है| खुदाई का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से नवम्बर माह का होता है| खुदाई के उपरान्त जड़ों को 10 मिन्ट के लिए पानी में उबाल कर छील लेते है| जड़ के मध्य में एक धागा होता है| जिसे खींचकर निकाल देने के उपरान्त ही जड़े ठीक प्रकार से सूखती हैं| इसके बाद धूप में अच्छी तरह सुखा लेते हैं, तत्पश्चात् पॉलीथीन की बोरियों में भरकर सूखे स्थान पर भण्डारित कर लेते हैं|

सतावर के शोधोपरान्त संस्तुति

पौध रोपण 60 x 60 सेंटीमीटर एवं कंदों की खुदाई 24 से 27 माह बाद करने से सतावर की सबसे अच्छी पैदावार को प्राप्त की गई है|

सतावर की फसल से पैदावर और लाभ

इसकी 60 से 80 क्विंटल सूखी जड़े प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है| सतावर की खेती करके 2.0 से 2.5 वर्ष में अच्छा शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है|

सतावर की खेती की संभावनाएं

उपरोक्त तकनीकी द्वारा सतावर की अच्छी उपज प्राप्त करके बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है| चूंकि हमारे देश में जलवायु और मिटटी औषधीय पौधों की खेती के लिए उपयुक्त है, नई कृषि तकनीक भी विकसित की गई है और आगे किया जा रहा हैं| केवल समस्या इसके विपणन की हो सकती है|

यदि यह समस्या आपके सामने है, तो इसके लिए आप किसी भी आयुर्वेदिक दवा संस्था से सीधे सम्पर्क कर के अनुबन्धं कर सकते है| इस प्रकार औषधीय पौधों सतावर की खेती सफलता पूर्वक करके किसान बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते है|

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गिनी घास की खेती: पशुओं के लिए हरा चारा कई वर्ष तक प्राप्त करें

December 14, 2018 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

गिनी घास (Guinea grass) बहुवर्षीय चारा है, चारे की फसलों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है| यह सिंचित स्थिति में पूरे वर्ष भर इससे चारा प्राप्त होता है| जबकि शुष्क दशा में केवल वर्षा काल में ही इससे हरा चारा उपलब्ध होता है| इस फसल को देश के सभी भागों में उगाया जाता है| इस लेख में गिनी घास की खेती कैसे करें और पशुओं हेतु हरा चारा कई साल तक कैसे मिलेगा का उल्लेख है|

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गिनी घास की खेती के लिए भूमि और तैयारी

गिनी घास के लिए उचित जल निकास वाली सभी प्रकार की भूमि में इसको उगाया जा सकता है| पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके दो से तीन जुताई कल्टीवेटर या हैरो से करने के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभूरी कर खेत तैयार करना चाहिए|

गिनी घास की खेती के लिए उन्नत किस्में 

बुन्देल गिनी- 1, 2, मेकौनी, हामिल, को- 1, को- 2, पी जी जी- 1, 9, 19, 101, गिनी गटन-1 और 9 आदि|

गिनी घास की खेती के लिए बुवाई का समय

गिनी घास की नर्सरी तैयार करने के लिए फरवरी से मार्च में क्यारियां बनाकर बीज डाल देना चाहिए| इसके लिए 1 से 1.5 मीटर चौड़ी क्यारी बनानी चाहिए, एक हेक्टेयर के लिए आठ मीटर लम्बी लगभग 15 क्यारियों की आवश्यकता होती है| जबकि सीधे खेत में बुवाई करने के लिए मानसून से पहले बुवाई कर लेनी चाहिए|

गिनी की बुवाई पंक्ति में करनी चाहिए एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 50 सेंटीमीटर रखनी चाहिए| बड़े भू–भाग में बुवाई सीड पैलेट द्वारा करना सस्ता और सुलभ रहता है|

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गिनी घास की खेती के लिए बीज मात्रा और बुवाई

गिनी घास को सीधे खेत में बीज डालकर या नर्सरी लगाकर लगाया जाता है| दोनो विधियों में लगभग 2.5 से 3 किलो ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है, जबकि जड़ों द्वारा बुवाई के लिए 25000 से 66000 जड़े एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होती हैं| नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए लगभग 6 महीने पुराना बीज एक सेंटीमीटर गहराई पर डालना चाहिए| इसके बाद क्यारियों को जूट बैग से ढक कर पानी लगाना चाहिए|

गिनी घास की खेती के लिए खाद और उर्वरक

गिनी घास की खेती हेतु अच्छी प्रकार सड़ी हुई गोबर की खाद 25 टन प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है| बुवाई के समय 60 किलो ग्राम नत्रजन, 40 किलो ग्राम फास्फोरस, और 40 किलो ग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई पूर्व खेत में फर्टीलाइजर ड्रील से डालना चाहिए| इसके बाद प्रत्येक कटाई के बाद 40 किलो ग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए|

गिनी घास की खेती में खरपतवार रोकथाम

गिनी घास की खेती में शुरू के 30 से 40 दिनों में खरपतवारों की भरमार होती है| इसलिए 2, 4-डी 1.0 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टर की दर से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करना चाहिए| प्रथम रोपाई के समय लोबिया की अन्तर फसल से भी खरपतवार रोकथाम किया जा सकता है, साथ ही गुणवत्तायुक्त हरा चारा भी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है|

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गिनी घास की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन

सिंचाई उपलब्ध होने पर गर्मी के दिनों में सिंचाई करनी चाहिए| मार्च से जून तक 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करने से वर्ष भर चारा उपलब्ध रहता है| खरीफ में सामान्यता सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है|

गिनी घास फसल की कटाई और पैदावार

गिनी घास की फसल 60 से 65 दिन पर पहली कटाई के लिए तैयार हो जाती है| सिंचित दशा में 50 दिन के बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है| इस प्रकार लगभग 100 से 150 टन प्रति हेक्टेयर हरा चारा उपलब्ध होता हैं|

असिंचित दशा में सिर्फ मानसून पर आधारित खेती से दो-तीन बार कटाई की जाती है, जो अगस्त से लेकर दिसम्बर तक प्राप्त होती है| इसलिए इसको चारा वाले वृक्षों के बीच लगाकर (छाया सहनशीलता के कारण) भी चारा उत्पादन किया जा सकता है|

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बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती: किस्में, बुवाई, देखभाल, उत्पादन

December 13, 2018 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकोमा की फसल दाने तथा हरे चारे के लिए भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है| ऐसे क्षेत्र जहां कम वर्षा और ज्यादा गर्मी पड़ती है, बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम बाजरे की फसल अच्छी पैदावार देती है| इसको पशुओं को हरे चारे, कड़बी एवं सायलेज या “हे” के रूप में संरक्षित करके खिलाया जाता है| इस लेख में बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती का उपयोग, देखभाल एवं पैदावार का उल्लेख किया गया है|

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बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती के लिए भूमि और तैयारी

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम के लिए अच्छे जल निकास युक्त बलुई दोमट या दोमट भूमि बाजरे की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है| पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और दो जुताई हैरो या देशी हल से तथा अंतिम जुताई के बाद पाटा लगाकर बाजरे की बुवाई के लिए खेत तैयार करना चाहिए|

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती की बुवाई का समय

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम हेतु सिंचित क्षेत्रों में गर्मियों में बुवाई के लिए मार्च से मध्य अप्रैल का समय उपयुक्त हैं| खरीफ की फसल के लिए जुलाई का प्रथम पखवाड़ा उपयुक्त है| भारत में कई जगहों पर अक्टूबर से नवम्बर में बुवाई रबी के मौसम में की जाती है|

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती के लिए उन्नत किस्में

पेनिसिटम ग्लूकम की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अच्छी किस्म का चुनाव आवश्यक हो जाता है| उद्देश्य के अनुसार किस्म का चयन करना चाहिए, जैसे-

एकल कटाई- राज बाजरा चरी- 2, नरेन्द्र चारा बाजरा- 2

बहु कटाई- जायंट बाजरा, प्रो एग्रो नं- 1

चारे एवं दाने वाली- ए वी के बी- 19

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बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती के लिए बीज दर और बुवाई

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम के उत्तम उत्पादन हेतु 10 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज उपयोग करना चाहिए| बीज की बुवाई हल के पीछे या सीडड्रिल से 25 सेंटीमीटर दूरी वाली पंक्तियों में 2 सेंटीमीटर गहराई पर करें| कवक रोगों से बचाने के लिए बीज को एग्रोसान जी एन या थीरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से अवश्य उपचारित करना चाहिए|

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती में खाद और उर्वरक

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की सिंचित दशा में फसल की समुचित पोषक आवश्यकता पूरी करने के लिए 10 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी सड़ी गोबर की खाद बुवाई के 20 दिन पहले खेत में मिला दें और 50:30:30 किलो ग्राम नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय देना चाहिए|

30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर बुवाई के एक महीने बाद छिड़काव करना चाहिए| असिंचित दशा में बुवाई के समय उपयुक्त खाद और उर्वरक के अतिरिक्त वर्षा होने पर 20 से 30 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर नत्रजन का छिड़काव 30 से 35 दिन की अवस्था पर करना लाभदायक रहता है|

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती में खरपतवार नियंत्रण

पेनिसिटम ग्लूकम मैं 25 से 30 दिन की अवस्था पर वीडर कम कल्चर से एक गुड़ाई करनी चाहिए या बीज के जमाव से पूर्व बुवाई के 2 से 3 दिन के अन्दर एट्राजिन खरपतवार नाशी 0.50 से 0.75 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टर की दर से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कना खरपतवारों के नियंत्रण में सहायक होता है|

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बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती में सिंचाई प्रबंधन

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम खरीफ की फसल में वर्षा न होने पर 2 सिंचाई की आवश्यकता होती है| सिंचाई 20 से 21 दिन के अंतराल पर करने से उपज में अधिकतम वृद्धि होती है| ग्रीष्म ऋतु में 12 से 14 दिन के अन्तराल पर 4 से 5 सिंचाई की आवश्यकता होती है|

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती में कीट और रोग नियंत्रण

पेनिसिटम ग्लूकम की अरगट, डाउनी मिल्ड्यू और स्मट इसकी प्रमुख रोग है| मेटालेक्सिल 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज एवं फसल में कीडोमिल 1000 पी पी एम का छिड़काव समुचित नियंत्रण देता है| अरगट या स्मट से प्रभावित बालियों को निकालकर जला देना चाहिए| शूट फ्लाई कीट नियंत्रण के लिए कार्बोफ्यूरॉन 125 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव लाभकारी पाया गया है|

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम फसल की कटाई और पैदावार

पेनिसिटम ग्लूकम की एक कटाई वाली किस्मों में बुवाई के 60 से 75 दिन बाद 50 प्रतिशत फूल अवस्था पर कटाई करें| एकल कटाई में 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा आसानी से प्राप्त होता है| बहु कटाई वाली किस्मों में पहली कटाई 40 से 45 दिन पर और उसके बाद की कटाई 30 दिनों के अंतराल पर करें| बहुकटाई किस्मों से 550 से 1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा पैदावार प्राप्त की जा सकती है|

बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम फसल की उपयोगिता

पेनिसिटम ग्लूकम का चारा कोमल एवं सुपाच्य होता है| इसमें 7 से 10 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 56 से 64 प्रतिशत एन डी एफ, 38 से 40 प्रतिशत ए डी एफ 33 से 34 प्रतिशत सेल्यूलोज और 18 से 23 प्रतिशत हेमीसेल्यूलोज पाया जाता है| मई से अक्टूबर तक हरे चारे की उपलब्धता बनी रहती है| बाजरे से अच्छी गुणवत्ता वाला ‘हे’ भी तैयार किया जा सकता है|

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बाजरा नेपियर संकर घास की खेती: पशुओं के लिए साल भर हरे चारे हेतु

December 13, 2018 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

बाजरा नेपियर संकर घास वर्ष में कई कटाईयां देने वाली बहुवर्षीय चारा फसल है| बाजरा नेपियर संकर घास की जड़ों को एक बार रोपण करके उचित प्रबन्धन के द्वारा 4 से 5 वर्षों तक हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है| इस घास से बाजरे जैसा पौष्टिक और रसीला चारा प्राप्त होता है, साथ ही साथ यह सुपाचक तथा गुणवत्तापूर्ण होता है|

अपने इन्हीं गुणों के कारण यह बाजरा नेपियर संकर घास किसानों के बीच काफी लोकप्रिय होती जा रही है| कम तापमान वाले क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है| इसके चारे में शुष्क भार के आधार पर 8 से 9 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन पाई जाती है| इस लेख में बाजरा नेपियर संकर घास की खेती की जानकारी का उल्लेख विस्तार से किया गया है|

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बाजरा नेपियर संकर घास की खेती के लिए भूमि और तैयारी

इस घास के लिये अच्छी उर्वरा वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है, जिसमें जल निकास का उचित प्रबन्ध हो| यह मिट्टी से काफी मात्रा में पोषकतत्व अवशोषित करती है| इस घास की रोपण के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और उसके बाद 2 से 3 जुताईयां हैरो या कल्टीवेटर से करके भूमि तैयार कर लेनी चाहिए|

बाजरा नेपियर संकर घास की खेती के लिए खाद और उर्वरक

फसल बुवाई से पहले मिट्टी का परीक्षण करा लेना लाभदायक रहता है| आमतौर पर 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर सडी गोबर की खाद का प्रयोग रोपण से एक माह पूर्व करना चाहिए| रोपाई के समय 60 किलो ग्राम नत्रजन, 50 किलो ग्राम फास्फोरस और 40 किलो ग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर डालें तथा 30 किलो ग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर प्रत्येक कटाई के तुरन्त बाद छिडकाव करना लाभदायक रहता है|

बाजरा नेपियर संकर घास की खेती के लिए उन्नत किस्में

आई जी एफ आर आई- 3, 6, 7, 10, को- 2, 3, 4, 5, बी एन एच-10, एन बी- 21, यशवंत और ए पी बी एन- 1 आदि प्रमुख है|

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बाजरा नेपियर संकर घास की खेती के लिए रोपाई का समय

बाजरा नेपियर की सिंचित दशाओं में फरवरी माह में रोपाई और असिंचित दशाओं में जुलाई से अगस्त महीने में रोपाई लाभदायक होती है| इसकी रोपाई जड़दार कल्लों द्वारा की जाती है| रोपण हेतु जड़ युक्त कल्ले 100 X 100 सेंटीमीटर या 50 X 50 सेंटीमीटर परिस्थिति अनुसार की दूरी पर प्रयुक्त किये जाते हैं| इस तरह एक हेक्टेयर के लिए 20,000 से 30,000 टुकड़ों की आवश्यकता पड़ती है|

बाजरा नेपियर संकर घास की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन

बाजरा नेपियर की नम मिट्टी में रोपाई करें और रोपाई के बाद तुरंत सिंचाई करें, मार्च से अप्रैल में 15 से 18 दिन तथा गर्मी में 10 से 12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें| प्रत्येक कटाई बाद फसल में सिंचाई अवश्य करनी चाहिए|

बाजरा नेपियर संकर घास की खेती में निराई-गुड़ाई

बाजरा नेपियर की रोपाई के बाद खरपतवार रोकथाम हेतु एक से दो निराई-गुड़ाई करनी चाहिए या एट्राजीन 3 से 4 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोलकर रोपाई से पूर्व प्रयोग किया जा सकता है| वर्षा ऋतु में प्रथम रोपाई के समय लोबिया की अन्तर फसल से भी खरपतवार रोकथाम किया जा सकता है, साथ ही साथ गुणवत्तायुक्त अतिरिक्त हरा चारा भी प्राप्त किया जा सकता है|

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बाजरा नेपियर संकर घास की चारा की कटाई

बाजरा नेपियर संकर की पहली कटाई रोपाई के 60 दिन बाद तत्पश्चात प्रत्येक कटाई 30 से 35 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए, अधिक उपज प्राप्त करने के लिए कल्लों को जमीन से 10 से 15 सेंटीमीटर ऊपर से काटना चाहिए| वर्ष पर्यन्त इस घास से 6 से 8 कटाई आसानी से ली जा सकती है|

बाजरा नेपियर संकर घास की फसल से पैदावार 

बाजरा नैपियर संकर से 6 से 8 कटाइयों में 700 से 1700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है|

बाजरा नेपियर संकर घास की फसल से चारा पुनरूद्धार

बाजरा नेपियर की कई वर्षों तक लगातार कटाई करते रहने से घास में मृत कल्लों की संख्या बढ़ती रहती है, जिससे पौधों की परिधि तो बढ़ती है| लेकिन सजीव कल्लों की संख्या कम ही रहती है| इसलिए अधिक चारा उत्पादन के लिए कटाई के बाद वर्षा ऋतु से पहले घास के मृत ठूठों को हटा दिया जाता है तथा बाद में खेत की सिंचाई करने से नये कल्ले निकलते रहते है|

जिससे बाजरा नेपियर का अधिक हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है और इन्ही पौधों से जड़े निकालकर किसान या तो दूसरे खेत में रोपित कर सकते है या फिर इन्हें दूसरे किसानों को विक्रय भी कर सकते है| इसलिए इस घास को उगाना मतलब फायदे का सौदा रहता है|

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