हरी खाद उगाकर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ायें, जानिए उपयोगी जानकारी

हरी खाद उगाकर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ायें

मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के लिए हरी खाद एक सस्ता और अच्छा विकल्प है| सही समय पर फलीदार पौधे की खड़ी फसल को मिट्टी में ट्रेक्टर से हल चला कर दबा देने की प्रतिक्रिया को हरी खाद कहते हैं| इस लेख में किसान भाइयों की जानकारी के लिए इस खाद के लाभ और उसके लिए उपयुक्त फसलों का उल्लेख किया गया है|

आदर्श हरी खाद के गुण

एक आदर्श हरी खाद में निम्नलिखित गुण होने चाहिए, जैसे-

1. जिसको उगाने का खर्च न्यूनतम होना चाहिए|

2. जिसको कम पानी या न्यूनतम सिंचाई की आवश्यकता हो|

3. जिसको कम से कम पादप संरक्षण की आवश्यकता हो|

4. जो कम समय में अधिक मात्रा में हरी खाद प्रदान कर सके|

5. जिसमें विपरीत परिस्थितियों में भी उगने की क्षमता हो|

6. जो खरपतवारों को दबाते हुए जल्दी बढ़त प्राप्त करे|

7. जो उपलब्ध वातावरण का प्रयोग करते हुए अधिकतम उपज दे|

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हरी खाद के फायदे या लाभ

1. इस खाद को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की भौतिक स्थिति में सुधार होता है|

2. हरी खाद से मिट्टी उर्वरता की भरपाई होती है|

3. यह खाद सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता को बढाती है|

4. यह खाद सूक्ष्म जीवाणुओं की गतिविधियों को बढाती है|

5. इस खाद से मिट्टी की संरचना में सुधार होने के कारण फसल की जड़ों का फैलाव अच्छा होता है|

6. हरी खाद के लिए उपयोग किये गये फलीदार पौधे वातावरण से नाइट्रोजन व्यवस्थित करके नोडयुल्ज में जमा करते हैं, जिससे भूमि की नाइट्रोजन शक्ति बढ़ती है|

7. इस खाद के लिये उपयोग किये गये पौधों को जब जमीन में हल चला कर दबाया जाता है, तो उनके गलने सड़ने से नोडयुल्ज में जमा की गई नाइट्रोजन जैविक रूप में मिट्टी में वापिस आ कर उसकी उर्वरक शक्ति को बढ़ाती है|

8. इस खाद के पौधों के मिट्टी में गलने सड़ने से मिट्टी की नमी या जल धारण की क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है|

9. इस खाद के गलने सड़ने से कार्बनडाईआक्साइड गैस निकलती है, जो कि मिट्टी से आवश्यक तत्व को मुक्त करवा कर मुख्य फसल के पौधों को आसानी से उपलब्ध करवाती है|

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हरी खाद बनाने की प्रक्रिया

1. अप्रैल-मई माह में फसल की कटाई के बाद जमीन की सिंचाई कर लें|

2. खेत में खड़े पानी में 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से ढैंचा के बीज का छिड़काव कर लें|

3. आवश्यकता होने पर 10 से 15 दिन में ढेंचा फसल की हल्की सिंचाई कर लें|

4. ढेंचा फसल में 20 दिन की अवस्था पर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से युरिया को खेत में छिडकने से नोडयुल बनने में सहायता मिलती है|

5. ढेंचा फसल को 55 से 60 दिन की अवस्था में हल चला कर हरी खाद को पुनः खेत में मिला दिया जाता है|

6. इस तरह लगभग 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से हरी खाद उपलब्ध हो जाती है, जिससे लगभग 60 से 80 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है|

7. मिट्टी में ढेचे के पौधों के गलने सड़ने से बैक्टीरिया द्वारा नियत सभी नाइट्रोजन जैविक रूप में लम्बे समय के लिए कार्बन के साथ मिट्टी को वापिस मिल जाते हैं|

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उपयुक्त फसलें

इस खाद के लिए लोबिया, ढेचा, उड़द मूग, बरसीम कुछ मुख्य फसलें हैं, जिस का प्रयोग हरी खाद बनाने में होता है| ढेचा इनमें अकांक्षित है| ढेंचा की मुख्य किस्म सस्बेनिया इक्विलेटा अपने त्वरित खनिजीकरण पैटेर्न उच्च नाइट्रोजन की मात्रा और अनुपात के कारण बाद में धान की फसल की उत्पादकता पर उल्लेखनीय प्रभाव डालने में सक्षम है|

मिट्टी में मिलाने की अवस्था

1. इस खाद के लिये बोई गई फसल 55 से 60 दिन बाद जोत कर मिट्टी में मिलाने के लिये तैयार हो जाती है|

2. इस अवस्था पर पौधे की लम्बाई एवं हरी शुष्क सामग्री अधिकतम होती है, 60 दिन की फसल अवस्था पर तना नरम तथा नाजुक होता है, जो आसानी से मिट्टी में मिल जाता है|

3. इस अवस्था में कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात कम होता है, पौधे रसीले तथा जैविक पदार्थ से भरे होते है, इस अवस्था पर नाइट्रोजन की मात्रा की उपलब्धता बहुत अधिक होती है|

4. जैसे-जैसे इस खाद के लिये लगाई गई फसल की अवस्था बढ़ती है, कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात बढ़ जाता है, जीवाणु हरी खाद के पौधों को गलाने सड़ाने के लिये मिट्टी की नाइट्रोजन इस्तेमाल करते हैं, जिससे मिट्टी में अस्थाई रूप से नाइट्रोजन की कमी हो जाती है|

5. यह खाद दबाने के बाद विशेष रूप से बोई गई धान की फसल में ऐकिनोक्लोआ जातियों के खरपतवार न के बराबर होते हैं, जो हरी खाद के ऐलिलोकेमिकल प्रभाव को दर्शाते हैं|

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