गुलाब प्रकृति-प्रदत्त एक अनमोल फूल है, जिसकी आकर्षक बनावट, सुन्दर आकार, लुभावना रंग एवं अधिक समय तक फूल का सही दिशा में बने रहने के कारण इसे अधिक पसंद किया जाता है। यदि गुलाब की खेती वैज्ञानिक विधि से किया जाए तो इसकी फसल से लगभग पूरे वर्ष फूल प्राप्त किये जा सकते हैं। सर्दी के मौसम में गुलाब के फूल की छटा तो देखते ही बनती है। इसके एक फूल में 5 पंखुड़ी से लेकर कई पंखुड़ियों तक की किस्में विभिन्न रंगों में उपलब्ध है।
पौधे छोटे से लेकर बड़े आकार के झाड़ीनुमा होते हैं। इसके फूलों का उपयोग पुष्प के रूप में, फूलदान सजाने, कमरे की भीतरी सज्जा, गुलदस्ता, गजरा, बटन होल बनाने के साथ-साथ गुलाब जल, इत्र एवं गुलकन्द आदि बनाने के लिए किया जाता हैं। इस लेख में गुलाब की वैज्ञानिक खेती कैसे करें की पूरी जानकारी का उल्लेख किया गया है।
गुलाब की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
ठंढ़ एवं शुष्क जलवायु गुलाब के लिए उपयुक्त होती है, इसलिए उत्तर और दक्षिण भारत के मैदानी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में गुलाब की खेती सर्दी के दिनों में की जाती है। इसके लिए दिन का तापमान 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तथा रात का तापमान 12 से 14 डिग्री सेंटीग्रेट उत्तम माना जाता है। यानि की पौधे को वर्ष के दौरान अच्छी रोशनी मिलती चाहिए। तापमान 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया हो, तो सापेक्ष आर्द्रता बढ़ाई जानी चाहिए। इसके लिए प्रकाश और तापमान के अनुपात को बनाए रखना बहुत जरूरी है।
गुलाब को प्रचुर पानी और हवा के आवागमन वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है। अत्यधिक तापमान से चूर्णिल आसीत होने की संभावना होती है। अगर तापमान कम और अत्यधिक नमी होने की उम्मीद हो तो मृदुल आसिता आ सकता है। इसकी खेती में जलवायु का बहुत महत्व होता है। इसलिए पूरी जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गुलाब की खेती में जलवायु का महत्व, जानिए भरपूर उत्पादन हेतु
गुलाब की खेती के लिए भूमि का चयन
गुलाब की खेती लगभग सभी प्रकार के मिट्टियों में की जा सकती है। परन्तु दोमट, बलुआर दोमट या मटियार दोमट मिट्टी जिसमें ह्यूमस प्रचुर मात्रा हो, में उत्तम होती है। जिसका पी एच मान 5.3 से 6.5 तक उपयुक्त माना जाता है। साथ ही पौधों के उचित विकास हेतु छायादार या जल जमाव वाली भूमि नहीं हो, ऐसी जगह जहाँ पर पूरे दिन धूप हो अतिआवश्यक है। छायादार जगह में उगाने से पौधों का एक तो विकास ठीक नहीं होगा, दूसरे पाउड्री मिल्ड्यु, रस्ट आदि बीमारी का प्रकोप बढ़ जाता है।
गुलाब की खेती के लिए उन्नत किस्में
गुलाब की किस्मों को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। जो इस प्रकार है, जैसे-
हाइब्रिड टी- यह वर्ग हाइब्रिड परपेचुअल और ‘टी’ गुलाब के संकरण से विकसित की गई है। इस वर्ग में एक पुष्प डण्डी पर एक बड़ा फूल खिलता है। पुष्प डण्डी की लम्बाई अन्य वर्ग के पुष्प डण्डी से लम्बी होती है, जैसे- सुपर स्टार, पूसा गौरव, अर्जुन, रक्तगंधा, क्रिमसन ग्लोरी, रक्तिमा, फस्ट रेड आदि किस्में प्रमुख है।
फ्लोरीबंडा- इस वर्ग के किस्मों से उत्पादित पुष्य डण्डी की लम्बाई कम होती है और पुष्प का आकार हाइब्रिड टी वर्ग से छोटा होता है। जैसे- भरत राम, लहर, जंतर-मंतर, बंजारन, सदाबहार, अरूनिमा, संगरिया आदि किस्में प्रमुख हैं।
पोलीएंथा एवं मिनिएचर- इस वर्ग की किस्मों के पौधों एवं पत्तियों का आकार छोटा होता है और यह छोटे फूल उत्पादित करते हैं। इस वर्ग के एक पौधे से काफी फूल उत्पादित होते है| जैसे- बेबी, पिक्सी, क्रीक्री, बेबीगोल्ड स्टोर आदि प्रमुख किस्में हैं।
लता वर्ग- इस वर्ग की किस्में लता बनाती हैं। इसमें एक जगह से कई फूल निकलते हैं, जैसे- रोजा बैंकसिया, रोजा ल्यूटिया, व्हाइट रैम्बलर, क्रिमसन आदि प्रमुख हैं।
सुगन्धित वर्ग- इस वर्ग के गुलाब के फूल से सुगंध आती है। ऐसे फूलों से तेल, कंक्रीट, गुलाब जल इत्यादि बनाया जाता है, जैसे- रोजा बरबौनियाना, रोजा डैमेसीना, देशी गुलाब आदि प्रमुख किस्में हैं।
व्यावसायिक किस्म- व्यावसायिक स्तर पर गुलाब का कट फ्लावर उत्पादन के लिए हाइब्रिड टी वर्ग में फस्ट रेड, ग्रान्डगला, कन्फीटी, कैपरी, स्टार लाइट, मीलोडी, डीपलोमैट इत्यादि प्रकिस्मों का चयन करना चाहिए। फ्लोरीबन्डा वर्ग का कट फ्लावर उत्पादन के लिए संगरिया, लामबाडा, मोल्डी, गोल्डेन टाइम्स, क्रीम प्रोफाइट, जैक फ्रास्ट इत्यादि किस्मों का चयन करना चाहिए।
गुलाब की खेती के लिए प्रवर्धन की विधि
गुलाब की नयी किस्में बीज द्वारा विकसित की जाती है, जबकि पुरानी किस्मों का प्रसारण कटिंग, बडिंग, गुटी एवं ग्रेफ्टिंग विधि द्वारा किया जाता है। परन्तु व्यवसायिक विधि “टी’ बडिंग ही है| टी बडिंग द्वारा प्रसारण करने के लिए बीजू पौधे को पहले तैयार करना पड़ता है| इसके लिए जुलाई से अगस्त माह में कटिंग लगाना चाहिए, जो कि दिसम्बर से जनवरी तक बडिंग करने योग्य तैयार हो जाते है। प्रवर्धन की सम्पूर्ण जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गुलाब का प्रवर्धन कैसे करें, जानिए उपयोगी एवं आधुनिक व्यावसायिक तकनीक
गुलाब की खेती के लिए खेत की तैयारी
गुलाब के पौधों को लम्बी अवधि तक गुणवत्ता युक्त पुष्प उत्पादन के लिए मिट्टी की अच्छी तैयारी बहुत ही आवश्यक है। खेत की तैयारी करते समय पहली जुताई कम से कम 40 से 50 सेंटीमीटर गहरी करनी चाहिए ताकि मिट्टी की कड़ी परत टूट जाए जिससे गुलाब की जड़ों की अच्छी वृद्धि एवं विकास हो सके। मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्व की मात्रा को जानने के लिए मिट्टी परीक्षण कराना चाहिए।
मिट्टी परीक्षण के उपरान्त पोषक तत्व की उपलब्ध मात्रा के अनुसार अतिरिक्त गोबर की सड़ी खाद, नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, एवं सूक्ष्म पोषक तत्व हेतु उर्वरकों को मिट्टी में मिलाना चाहिए। मिट्टी में लवण की अधिक मात्रा होने पर शुरू में कम से कम दो बार खेत में पानी भरकर कुछ समय बाद बाहर निकालना चाहिए तथा मिट्टी को सुखने के लिए छोड़ देना चाहिए।
ऐसा करने से मिट्टी में लवण की मात्रा कम हो जाती है। मिट्टी का पी एच मान कम होने पर चूने को मिट्टी में मिलाना चाहिए। चूने की मात्रा मिट्टी का वर्तमान पी एच मान पर निर्भर करती है। मिट्टी में गोबर की खाद एवं उर्वरकों को डालने के बाद कम से कम 30 से 40 सेंटीमीटर गहराई तक जुताई करके अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
जब मिट्टी बिल्कुल भुरभुरी हो जाए उसके उपरान्त क्यारी बनाने का कार्य शुरु करना चाहिए। गुलाब की खेती से गुणवत्तायुक्त पुष्प उत्पादन के लिए जमीन की सतह से 15 से 30 सेंटीमीटर उठी एक मीटर चौड़ी एवं सुविधानुसार लम्बी क्यारियाँ बनानी चाहिए। दो क्यारी के बीच में 40 से 50 सेंटीमीटर का रास्ता रखना चाहिए। पौध रोपण से पहले फुहार सिंचाई विधि से क्यारियों को नम कर देना चाहिए।
गुलाब की खेती के लिए रोपण का समय
हमारे देश में गुलाब फसल का पौध रोपण बहुत जगह पर पूरे वर्ष किया जा सकता है। लेकिन पौध रोपण करते समय दिन का तापमान 25 से 27 डिग्री सेंटीग्रेड तथा रात का तापमान 12 से 19 डिग्री सेंटीग्रेड अच्छा पाया गया है। मैदानी क्षेत्र में गुलाब के रोपण का समय अक्तूबर से नवम्बर तथा फरवरी से मार्च ठीक पाया गया है। पहाड़ी क्षेत्र में गुलाब के रोपण का समय सितम्बर से अक्तूबर तथा मार्च अच्छा पाया गया है।
गुलाब की खेती के लिए रोपण की विधि
जब हम पौध रोपण की सघनता की बात करते हैं, तो पॉलीहाउस में गुलाब को पंक्ति से पंक्ति 50 सेंटीमीटर तथा पौध से पौध 20 से 25 सेंटीमीटर के फासले पर लगाते हैं। घना पौध रोपण करने से पुष्प डण्डी की उपज बढ़ जाती है, जो आर्थिक रूप से लाभकारी हैं। गुलाब का पौध रोपण के एक दिन पहले क्यारियों को हल्का नम कर देते हैं। क्यारी के दोनों लम्बाई में बाहरी हिस्सों का 25 सेंटीमीटर चौड़ी मिट्टी को फावड़ा से 25 से 30 सेंटीमीटर गहरी खुदाई करके मिट्टी को रास्ते पर रख देते हैं।
जब क्यारी के दोनों तरफ कुंड जैसा लगने लगे उसके उपरान्त 20 या 25 सेंटीमीटर के फासले पर दोनों पंक्तियों में पौध रोपण कर देते हैं। पौधे लगाने के साथ-साथ पौधों को मिट्टी से दबाते जाते हैं। जब एक क्यारी का पूर्ण रोपण हो जाए तथा रास्ते पर पड़ी मिट्टी क्यारी के साथ लग जाए उसके उपरान्त तुरन्त पाइप से क्यारी में अच्छी तरह पानी भर देते हैं।
पानी देने के उपरान्त क्यारियों में जहाँ भी मिट्टी दबी लगे वहाँ अच्छी तरह मिट्टी डालकर दबा देते हैं और फिर वहाँ पर सिंचाई कर देते हैं। ऐसा करने से गुलाब के पौधों की मृत्यु कम होती है, पॉलीहाउस में गर्मी के मौसम में पौध रोपण करते समय अन्दर से 40 से 50 प्रतिशत का ग्रीन शेड नेट का इस्तेमाल करना चाहिए। गुलाब में पौध रोपण के 10 से 12 दिन के बाद नई वृद्धि शुरु हो जाती है।
गुलाब की खेती के लिए खाद एवं उर्वरक
गुलाब के नये पौधों को रोपने के पहले प्रत्येक गड्ढे में आधा भाग मिट्टी में आधा भाग सड़ा हुआ कम्पोस्ट या गोबर की खाद मिलाकर गड्ढे को भरना चाहिए तथा पुराने पौधे की कटाई-बँटाई एवं विंटरिंग जो कि अक्टूबर से नवम्बर में करते हैं, के बाद खाद एवं उर्वरक का उपयोग करें। विंटरिंग के बाद गड्ढे में आधा भाग मिट्टी व आधा भाग सड़ा हुआ कम्पोस्ट या गोबर की खाद मिलाकर भर दें और क्यारियाँ बनाकर सिंचाई करें।
इस क्रिया के लगभग 15 से 20 दिन बाद 90 ग्राम उर्वरक मिश्रण प्रति वर्ग मीटर की दर से जिसमें 2 भाग अमोनियम सल्फेट, 8 भाग सिंगल सुपर फास्फेट एवं 3 भाग म्युरेट ऑफ पोटाश की मात्रा हो, को मिलाकर देना चाहिए। अमोनियम सल्फेट एवं पोटैशियम सल्फेट को पुनः पहला पुष्पन समाप्त होने के बाद प्रयोग करना उपयुक्त रहता है।
चमकदार फूल प्राप्त करने के लिए सात भाग मैग्नीशियम सल्फेट + सात भाग फेरस सल्फेट + तीन भाग बोरेक्स का मिश्रण तैयार कर 15 ग्राम, 10 लीटर पानी में घोलकर एक-एक माह के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। व्यावसायिक स्तर पर खेती करने के लिए 5 से 6 किलोग्राम सड़ा हुआ कम्पोस्ट, 10 ग्राम नाइट्रोजन, 10 ग्राम फास्फोरस एवं 15 ग्राम पोटाश प्रति वर्ग मीटर देना चाहिए।
आधी मात्रा छंटाई के बाद तथा शेष 45 दिन बाद दें| भूमि की उर्वराशक्ति एवं पौधे के विकास को ध्यान में रखते हुए 50 से 100 ग्राम गुलाब मिश्रण जो कि बाजार में उपलब्ध है, छटाई के एक सप्ताह बाद दिया जा सकता है। यह देखा गया है कि अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक का प्रयोग करने से मिट्टी का पी एच तथा ई सी मान बढ़ जाता है, इसको कम करने के लिए सिंचाई के पानी के साथ अम्ल का प्रयोग करना चाहिए।
साधारणतौर पर नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश प्रत्येक को 200 पी पी एम का घोल गुलाब के पौधों के लिए ज्यादा लाभदायक पाया गया है। सूक्ष्म पोषक तत्वों को 15 दिन के अंतराल पर पौधों पर छिड़काव भी करना चाहिए। मिट्टी का पीएच मान बढ़ने पर गुलाब के क्यारियों में वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग किया जा सकता है, इससे मिट्टी का पीएच मान घटता है।
गुलाब की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन
पौध रोपण एवं पहली सिंचाई के उपरान्त गुलाब के पौधों की फुहार विधि से सिंचाई करनी चाहिए। फुहार विधि से सिंचाई के लिए 1 घण्टा में 4 से 5 मिनट के लिए स्प्रंकलर चलाना चाहिए। इस प्रकार दिन में 5 से 6 बार स्प्रंकलर चलाना चाहिए, ऐसा करने से पौधों की शाखा नहीं सुखती है तथा पौधों से नया फुटाव जल्दी होता है। जब गुलाब के पौधे पॉलीहाउस में पूर्ण रूप से विकसित हो जाए उसके बाद टपक विधि से उर्वरक के साथ सिंचाई करनी चाहिए।
गुलाब के पौधों को टपक विधि से सिंचाई दिन में 3 से 4 बार करने की जरूरत पड़ती है। बरसात एवं जाड़ा के मौसम में कम सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। पानी की मात्रा पौधों के वृद्धि एवं विकास तथा सूर्य की रोशनी की तीव्रता पर निर्भर करती है। गर्मी के मौसम में पूर्ण रुप से विकसित एक गुलाब के पौधे को लगभग 1 लीटर पानी की प्रतिदिन आवश्यकता होती है।
जब पौधे स्वस्थ हों तथा धूप तेज हो रही हो उस समय गुलाब के पौधों को अधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता पड़ती है। गुलाब के पौधों की सिंचाई सुबह 9 बजे से सायं 3 बजे के बीच में कर देनी चाहिए| रात के समय सिंचाई नहीं करनी चाहिए।
गुलाब फसल की कटाई-छटाई एवं बेंडिंग
गुलाब की खेती करने के लिए इसके पौधों की कटाई-छंटाई बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके पौधों से रोपण के पश्चात् जो नई शाखाएं निकलती हैं। इन सभी शाखाओं को नीचे से 8 से 10 सेंटीमीटर छोड़कर नीचे के तरफ बेंड (झुकना) कर देते हैं। ऐसा करने से प्रत्येक पौधों से अनेक नई शाखाएं निकलती हैं और पौधों पर अधिक शाखाएं होने पर पुष्प उत्पादन की उपज बढ़ जाती है।
जब पौधों पर अधिक शाखाएं इस प्रकार विकसित हो जाती है, उसके उपरान्त प्रत्येक पौधा से 3 से 4 स्वस्थ्य शाखा को लगभग बेंडिंग प्वाइंट से 10 से 12 सेंटीमीटर छोड़कर काट देते हैं, इस प्रकार नये पौधों में कटाई-छंटाई की जाती है। गुलाब में कटाई-छंटाई का समय मैदानी क्षेत्र में सितम्बर से अक्तूबर तथा पहाड़ी क्षेत्र में मार्च के महीना में की जाती है।
कटाई-छंटाई के दौरान सुखी शाखाओं को काट देना चाहिए, गुलाब की पतली शाखाओं को पुप्प उत्पादन के लिए ट्रेन नहीं करना चाहिए। इसके पौधों को काटने-छाटने के तुरन्त बाद फफूंदनाशक कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
गुलाब की फसल में खरपतवार नियंत्रण
पॉलीहाउस में गुलाब की खेती में खरपतवार की बहुत ही कम समस्या होती है। महीने में एक बार क्यारियों की ऊपरी सतह की मिट्टी की हल्की गुडाई करनी चाहिए। मिट्टी की गुडाई करने से मिट्टी भुरभुरी बनी रहती है और मिट्टी की पानी भण्डारण की क्षमता भी बढ़ जाती है। गुड़ाई करते समय यह सावधानी रखनी चाहिए कि गुलाब की पतली जड़े न टूटें इसलिए हल्की गुड़ाई करनी चाहिए।
गुलाब में डिस्बडिंग, डिशूटिंग एवं डिसकरिंग
गुलाब में डिस्बडिंग उन सभी पुष्प डण्डियों में किया जाता है, जो व्यावसायिक स्तर का पुष्प उत्पादन नहीं कर सकती हैं। जब पुष्प कली मटर के दाना के आकार का हो उसी समय डिस्बडिंग कर देते हैं। इस प्रकार की डण्डियों को तुरन्त बेंडिंग या कुछ अवधि बाद छंटाई कर दी जाती है। गुलाब का कर्तित पुष्प उत्पादन में हाइब्रिड ‘टी’ एवं फ्लोरीबंडा वर्ग के किस्मों में एक पुष्प डण्डी पर केवल एक पुष्प ही खिलने या बढ़ने दिया जाता है।
अन्य जो भी मुख्य कली के अलावा शूट आते हैं उनको 1.5 से 2 सेंटीमीटर लम्बा होने पर ही तोड़ दिया जाता है। इस कार्य को डिशूटिंग कहते हैं। गुलाब के जो पौधे चश्मा या ग्राफटिंग प्रवर्धन विधि द्वारा तैयार किए गये होते हैं। उनमें मूलवृन्त से जो भी नये शूट जमीन के अन्दर से आते हैं, उनको काट दिया जाता है इसे डिसकरिंग कहते हैं| ऐसा करने से गुलाब के पौधे की बढ़वार एवं विकास अच्छा होता है।
गुलाबफुल की फसल को सहारा देना
इसके कर्तित पुष्प डण्डियों की अधिक लम्बाई होने के कारण डण्डियों को सीधा रखने के लिए क्यारियों के दोनों तरफ लगभग 3.5 मीटर के अन्तराल पर 5 से 5.5 फीट लम्बा लोहे की पाइप लगा देते हैं। इन पाइपों में 2 से 3 सतह प्लास्टिक की रस्सी को क्यारियों के दोनों तरफ बांध देते हैं। ऐसा करने से जब पुष्प डण्डियों पर कली बढ़ जाती है| उस समय उन सभी डण्डियों को झुकने से बचाया का सकता है।
गुलाव की फसल में कीट रोकथाम
गुलाब के पौधों में लगने वाले कीटों में दीमक, रेड स्केल, जैसिड, लाही (माहो) थिप्स आदि मुख्य हैं। इसकी रोकथाम समय पर करनी आवश्यक होती है। दीमक के लिए थीमेट (10 प्रतिशत) दानेदार दवा 10 ग्राम या क्लोरपाइरीफॉस (20 प्रतिशत) 2.5 से 5 मिलीलीटर प्रति 10 वर्ग मीटर की दर से मिट्टी में मिलायें। रेड स्केल एवं जैसिड कीट की रोकथाम के लिए सेविन 0.3 प्रतिशत या मालाथियान 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें। कीट रोकथाम की सम्पूर्ण जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गुलाब में कीट प्रबंधन कैसे करें, जानिए उपयोगी एवं आधुनिक तकनीक
गुलाब की फसल में रोग रोकथाम
गुलाब की मुख्य बीमारी “डाइबैक” है, यह प्रायः छंटाई के बद कटे भाग पर लगती है। जिससे पौधो धीरे-धीरे ऊपर से नीचे की तरफ सुखते हुए जड़ तक सुख जाता है। तीव्र आक्रमण होने पर पूरा पौधा ही सुख जाता है। इसकी रोकथाम के लिए छंटाई के तुरन्त बाद कटे भाग पर चौबटिया पेस्ट (4 भाग कॉपर कार्बोनेट + 4 भाग रेड लेड + 5 भाग तीसी का तेल) लगायें एवं 0.1 प्रतिशत मालाथियान का छिड़काव करें। इसके साथ ही खेत की सफाई अर्थात् निकाई-गुड़ाई तथा खाद और उर्वरक उचित मात्रा में प्रयोग करें एवं पौधों को जल जमाव से बचायें, इससे बीमारी की रोकथाम में मदद मिलती है।
इस बीमारी के अलावा “ब्लैक स्पाट” एवं पाउड्री मिल्ड्यू’ जैसी बीमारियों का प्रकोप भी गुलाब के पौधे पर होता है। इसकी रोकथाम हेतु केराथेन 0.15 प्रतिशत या सल्फेक्स 0.25 प्रतिशत का छिड़काव करना उपयुक्त होता है। रोग रोकथाम की सम्पूर्ण जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गुलाब में रोग प्रबंधन कैसे करें, जानिए उपयोगी एवं आधुनिक तकनीक
गुलाव पुष्प डंडियों की कटाई
गुलाब के कर्तित पुष्प डण्डी को कली अवस्था जब एक या दो पुष्प की पंखुडी खुलनी शुरू हो जाए उस समय काटना चाहिए। इसके पुष्प डण्डी को कलीका अवस्था में काटते समय यह ध्यान रखना चाहिए, कि कली बहुत कड़ी न हो अन्यथा ऐसे स्थिति में काटने के बाद गुलाब की कली नहीं खिल पाती है। गुलाब के पुष्प को तेजधार वाले स्केटियर से काटना चाहिए। तत्पश्चात् फूलों के कटे निचले भाग को साफ पानी में 5 से 6 सेंटीमीटर डुबोकर रखना चाहिए ताकि फूल ताजा बना रहे।
इसका कट फ्लावर काटने के बाद बाल्टी में रखने के पश्चात् शीतगृह में 4 डिग्री सेंटीग्रेड में 5 से 6 घण्टे के लिए भण्डारण करने पर पुष्प अधिक दिनों तक तरोताजा बने रहते हैं। फूलों को शीतगृह उपचार देने के बाद विभिन्न वर्गों में पुष्प डण्डी के लम्बाई के आधार पर विभाजित कर लेना चाहिए। गुलाब के कर्तित पुष्प डण्डियों को 30 से 40, 40 से 50, 50 से 60, 60 से 70, 70 से 80, 80 से 90, 90 से 100, 100 से 110, तथा 110 से 120 सेंटीमीटर लम्बी पुष्प डण्डियों में विभाजित किया जाता है।
पुष्प के ग्रेडिंग के बाद 20 फूलों का एक बंडल (बंच) बनाकर पुष्प डण्डियों के कलियों को कोरूगेटिड पेपर में रबड़ बैंड से बांध दिया जाता है। इसके बाद इन बंड़लों को लम्बाई के आधार पर विभिन्न आकार के गत्ते के बाक्स में पैक करके बाजार में भेज दिया जाता है। स्थानीय बाजार में इसका पुष्प बेचने के लिए प्रयास करना चाहिए कि ट्रांस्पोर्टेशन रात के समय हो यदि बाजार में गुलाब के पुष्प की कीमत अच्छी न मिल रही हो तो शीतगृह में 2 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर लगभग एक सप्ताह तक पुष्प का भण्डारण किया जा सकता है।
गुलाबफुल की खेती से पैदावार
पॉलीहाउस में कट फ्लावर हेतु उत्पादन करने के लिए हाइब्रिट ‘टी’ वर्ग की प्रकिस्मों से 140 से 220 और फ्लोरीबंडा वर्ग की किस्मों से 220 से 350 पुष्प डण्डियाँ प्रति वर्गमीटर में उत्पादित होती हैं। गुलाब के कट फ्लावर की उपज शस्य क्रियाओं, किस्म तथा वातावरण पर बहुत अधिक निर्भर करती है। गुलाब का एक बार पौध रोपण से 5 वर्ष तक पुष्पोत्पादन किया जा सकता है। इससे अधिक समय तक इन्हीं पौधों से पुष्पोत्पादन करने पर उपज एवं गुणवत्ता घट जाती है। इसलिए 5 वर्ष बाद नये पौधों का रोपण करना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न?
गुलाब की खेती के लिए समशीतोष्ण और हल्की गर्म जलवायु सबसे उपयुक्त होती है। 15–30°C तापमान आदर्श माना जाता है।
अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसका पीएच 6.0–7.5 हो, गुलाब के लिए सर्वोत्तम होती है।
कुछ प्रमुख किस्में हैं – ग्रैंड गाला, ताजमहल, फर्स्ट रेड, डच रोज, एचटी रोज, फ्लोरीबंडा आदि।
उत्तरी भारत में गुलाब की रोपाई अक्टूबर–नवंबर में और दक्षिण भारत में जून–जुलाई में की जाती है।
प्रति पौधा 10-15 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश संतुलित मात्रा में देना चाहिए।
गर्मियों में 5-7 दिन में और सर्दियों में 10-12 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। जलभराव से बचना आवश्यक है।
समय-समय पर निराई-गुड़ाई, छंटाई (प्रूनिंग), रोग-कीट नियंत्रण और संतुलित पोषण देना जरूरी होता है।
प्रमुख रोग हैं – पाउडरी मिल्ड्यू, डाई बैक। प्रमुख कीट हैं – एफिड, थ्रिप्स और रेड स्पाइडर माइट।
अच्छी देखभाल में एक हेक्टेयर से लगभग 2–3 लाख फूल प्रति वर्ष प्राप्त किए जा सकते हैं (किस्म और तकनीक पर निर्भर करता है)।
बाजार और किस्म के अनुसार गुलाब की खेती से प्रति हेक्टेयर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है, खासकर व्यावसायिक खेती में।
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