अठारहवीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट (जन्म: 22 अप्रैल 1724 – मृत्यु: 12 फरवरी 1804)को आधुनिक पश्चिमी दर्शन के प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक माना जाता है। ज्ञान, नैतिकता और सौंदर्यशास्त्र की प्रकृति के बारे में उनकी गहन अंतर्दृष्टि ने तत्वमीमांसा से लेकर राजनीतिक सिद्धांत तक, विभिन्न क्षेत्रों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इमैनुएल कांट की रचनाएँ हमें मानवीय तर्क की सीमाओं और क्षमताओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं, नैतिक कर्तव्य और ज्ञानोदय की खोज के महत्व पर बल देती हैं।
यह लेख इमैनुएल कांट के कुछ सबसे विचारोत्तेजक उद्धरणों की पड़ताल करता है, जो उनके दार्शनिक विचारों और आज के विमर्श में उनकी स्थायी प्रासंगिकता पर एक नजर डालते हैं। उनके विचारों की गहन जाँच-पड़ताल के माध्यम से, हम न केवल दर्शनशास्त्र में उनके योगदान को, बल्कि इमैनुएल कांट के विचारों और समकालीन मुद्दों के बीच के जटिल संबंधों को भी बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
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इमैनुएल कांट के उद्धरण
“विज्ञान संगठित ज्ञान है, बुद्धिमत्ता संगठित जीवन है।”
“अनुभव बिना सिद्धांत के अंधा है, और सिद्धांत बिना अनुभव के केवल बौद्धिक खेल है।”
“विचार बिना विषयवस्तु के खाली हैं, अनुभूति बिना अवधारणा के अंधी है।”
“हमारा सारा ज्ञान इंद्रियों से शुरू होता है, फिर समझ तक पहुँचता है और अंतत: बुद्धि पर समाप्त होता है।”
“समझ प्रकृति से अपने नियम नहीं लेती, बल्कि उन्हें प्रकृति को देती है।” -इमैनुएल कांट
“तर्क वह शक्ति है, जो ज्ञान के सिद्धांत (पूर्वज्ञान) प्रदान करती है।”
“जानने का साहस करो, अपनी बुद्धि का उपयोग करने का साहस रखो।”
“अनुभूति और अवधारणा हमारे सभी ज्ञान के तत्व हैं।”
“अस्तित्व का अर्थ है, अनुभूत होना।”
“इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारा सारा ज्ञान अनुभव से प्रारंभ होता है।” -इमैनुएल कांट
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“ऐसा कार्य करो कि तुम्हारा सिद्धांत एक सार्वभौमिक नियम बन सके।”
“इस प्रकार आचरण करो कि तुम मानवता को, चाहे अपने में या किसी और में, सदैव एक साध्य के रूप में उपयोग करो, कभी केवल साधन के रूप में नहीं।”
“कानून में मनुष्य तब दोषी होता है, जब वह दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करता है; नैतिकता में वह तब भी दोषी होता है, जब वह ऐसा करने के बारे में सोचता है।”
“तर्क से ऊपर कुछ नहीं है।”
“ऐसा जीवन जियो मानो तुम्हारा हर कार्य एक सार्वभौमिक नियम बनने वाला हो।” -इमैनुएल कांट
“मेरे भीतर का नैतिक नियम स्वतंत्रता की दुनिया प्रकट करता है।”
“इच्छाशक्ति केवल कानून के अधीन नहीं है, बल्कि ऐसी है कि उसे स्वयं को कानून देने वाला भी समझना चाहिए।”
“स्वतंत्रता वह है, जब इच्छा नैतिक नियम के अलावा किसी और चीज की अधीन न हो।”
“केवल एक ही चीज बिना शर्त अच्छी है और वह है ‘अच्छी इच्छा’।”
“नैतिकता यह नहीं सिखाती कि हम कैसे खुश रहें, बल्कि यह सिखाती है कि हम खुशी के योग्य कैसे बनें।” -इमैनुएल कांट
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“प्रबोधन मनुष्य की स्वयं थोपे गए अपरिपक्वता से मुक्ति है।”
“अपरिपक्वता वह असमर्थता है, जिसमें कोई अपनी समझ का उपयोग किसी और के मार्गदर्शन के बिना नहीं कर सकता।”
“आलस्य और कायरता ही कारण हैं कि मानव जाति का बड़ा भाग जीवनभर अपरिपक्व बना रहता है।”
“अपनी बुद्धि का उपयोग करने का साहस रखो, यही प्रबोधन का मूलमंत्र है।”
“स्वतंत्रता ही समाज में प्रबोधन की पूर्वशर्त है।” -इमैनुएल कांट
“सारा मानवीय ज्ञान अनुभूति से शुरू होता है, अवधारणाओं से आगे बढ़ता है और विचारों पर समाप्त होता है।”
“मनुष्य को अनुशासन की आवश्यकता है, क्योंकि वह स्वभाव से असंयमित और जंगली है।”
“मानवता की टेढ़ी लकड़ी से कोई सीधी वस्तु कभी नहीं बनी।”
“मनुष्य एक ऐसा प्राणी है, जिसे एक स्वामी की आवश्यकता होती है।”
“मनुष्य की शिक्षा ही सच्चा दर्शन है।” -इमैनुएल कांट
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“सुख बुद्धि का नहीं, बल्कि कल्पना का आदर्श है।”
“सत्ता का अधिकार मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है।”
“दो चींजें मेरे मन को हमेशा नए और बढ़ते हुए विस्मय और आदर से भर देती हैं, मेरे ऊपर तारों भरा आकाश और मेरे भीतर नैतिक नियम।”
“हम किसी व्यक्ति के हृदय का अंदाजा उसके पशुओं के प्रति व्यवहार से लगा सकते हैं।”
“झूठ बोलकर मनुष्य अपनी गरिमा को नष्ट कर देता है।” -इमैनुएल कांट
“मनुष्य की सबसे बड़ी चिंता यह होनी चाहिए कि वह खुशी के योग्य बने।”
“सुंदर वही है जो बिना किसी अवधारणा के सबको प्रसन्न करता है।”
“प्रतिभा वह क्षमता है, जो ऐसे विचारों को स्वयं खोज लेती है, जिन्हें दूसरों को सिखाया जाता है।”
“अच्छी इच्छा हीरे की तरह चमकती है।”
“पृथ्वी पर शांति तभी संभव है, जब मनुष्य ऐसा प्राणी बन जाए, जो संपूर्णता को पहले देखना सीख गया हो।” -इमैनुएल कांट
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“धर्म वह है, जिसमें हम अपने सभी कर्तव्यों को ईश्वरीय आज्ञा के रूप में स्वीकार करते हैं।”
“मनुष्यों के बीच शांति की स्थिति प्राकृतिक नहीं है, प्राकृतिक स्थिति तो युद्ध की है।”
“संविधान ही स्थायी शांति की गारंटी है।”
“होना है, कर्म करना।”
“यदि न्याय नष्ट हो जाए, तो मनुष्यों का पृथ्वी पर रहना व्यर्थ है।” -इमैनुएल कांट
“तर्क के सार्वजनिक उपयोग को हमेशा स्वतंत्र होना चाहिए और केवल यही प्रबोधन ला सकता है।”
“दार्शनिक भी मानेंगे कि मानवता की टेढ़ी लकड़ी से कभी कोई पूरी तरह सीधी वस्तु नहीं बन सकती।”
“मानव जाति का इतिहास प्रकृति की एक छिपी योजना के रूप में देखा जा सकता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की ओर अग्रसर है।”
“मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या एक ऐसा समाज बनाना है, जो न्याय को सार्वभौमिक रूप से लागू कर सके।”
“हर राजनीति को न्याय के आगे झुकना चाहिए।” -इमैनुएल कांट
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