भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां के किसानों की आय का मुख्य स्रोत खेती है। बदलते मौसम, पानी की कमी और बढ़ती लागत के कारण किसान अब ऐसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं जो कम खर्च में अधिक उत्पादन दें। ऐसी ही एक बेहतरीन फसल है – ज्वार (Sorghum)।
ज्वार की खेती कम पानी, कम लागत और कम जोखिम वाली खेती मानी जाती है। यह फसल अनाज, पशु चारा और कई खाद्य उत्पादों के लिए उपयोगी होती है। राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के किसान इसकी खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
अगर आप भी कम लागत में अच्छी कमाई करने वाली खेती करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए बेहद उपयोगी साबित होगा। इस लेख में हम ज्वार की खेती से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी आसान भाषा में जानेंगे।
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ज्वार की खेती क्यों करें? (Why cultivate sorghum?)
आज के समय में किसान ऐसी फसल चाहते हैं:
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी ज्वार की फसल अच्छी पैदावार देकर किसानों को स्थिर और सुरक्षित आय प्रदान करती है।
ज्वार का हरा चारा पशुओं के लिए बेहद पौष्टिक माना जाता है, जिससे दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलती है।
यह फसल सूखा सहन करने की क्षमता रखती है, इसलिए खराब मौसम में भी नुकसान की संभावना कम रहती है।
ज्वार की खेती में अन्य फसलों की तुलना में कम लागत आती है, जिससे छोटे किसानों को अच्छा लाभ मिलता है।
किसान ज्वार के अनाज और चारे दोनों को बेचकर अतिरिक्त कमाई और बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
ज्वार की खेती मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती है, जिससे अगली फसलों का उत्पादन भी बेहतर होता है।
ज्वार की खेती के मुख्य फायदे (Benefits of Sorghum Cultivation)
आजकल ज्वार से बने आटा, दलिया और हेल्दी फूड की मांग शहरों में तेजी से बढ़ रही है। इसलिए इसका बाजार भी मजबूत हो रहा है:
कम पानी में भी ज्वार की फसल अच्छी पैदावार देती है, इसलिए सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के लिए लाभदायक है।
ज्वार का हरा चारा पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक होता है, जिससे पशुपालन व्यवसाय को मजबूत बनाने में मदद मिलती है।
यह फसल सूखा सहन करने की क्षमता रखती है, जिससे खराब मौसम में भी उत्पादन पर कम असर पड़ता है।
ज्वार की खेती कम लागत में आसानी से की जा सकती है, इसलिए छोटे और सीमांत किसानों के लिए उपयुक्त फसल है।
किसान ज्वार के अनाज और चारे दोनों से अतिरिक्त आय प्राप्त कर बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
ज्वार की खेती मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता बनाए रखने में सहायक होती है, जिससे दूसरी फसलों को भी फायदा मिलता है।
👉 क्या आपने पहले कभी ज्वार की खेती की है? अगर हाँ, तो आपको प्रति बीघा कितना उत्पादन मिला? – अपना अनुभव नीचे कमेंट में जरूर बताइए।
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ज्वार के लिए उपयुक्त जलवायु (Suitable Climate for Sorghum)
ज्वार गर्म जलवायु की फसल है। यह कम पानी वाले क्षेत्रों में भी आसानी से उग जाती है:
यह गर्म और शुष्क जलवायु में अच्छी तरह बढ़ती है, इसलिए यह भारत के कई राज्यों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है।
25°C से 32°C तापमान इसकी फसल के अंकुरण, बढ़वार और बेहतर उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है, जिससे किसानों को अच्छा उत्पादन मिलता है।
अत्यधिक ठंड और पाला ज्वार की फसल को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए सही मौसम में बुवाई करना जरूरी है।
जलभराव वाली परिस्थितियाँ ज्वार की जड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं, इसलिए अच्छी जल निकासी वाला खेत चुनना चाहिए।
ज्वार के लिए उपयुक्त मिट्टी (Suitable Soil for Sorghum)
ज्वार लगभग हर प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है, लेकिन अच्छी पैदावार के लिए सही मिट्टी का चुनाव जरूरी है:
ज्वार की खेती दोमट, बलुई दोमट और काली मिट्टी में सबसे अच्छी पैदावार देती है और फसल मजबूत बनती है।
अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी ज्वार की जड़ों को स्वस्थ रखती है और पौधों की बढ़वार बेहतर बनाती है।
मिट्टी का pH मान 6 से 8 के बीच होने पर ज्वार की फसल अच्छा उत्पादन देने में सक्षम होती है।
अत्यधिक जलभराव वाली भूमि ज्वार की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है, इसलिए ऐसी मिट्टी से बचना चाहिए।
जैविक पदार्थों से भरपूर उपजाऊ मिट्टी ज्वार की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को बढ़ाने में मदद करती है।
खेत की तैयारी कैसे करें? (How to Prepare the Field?)
अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी बहुत महत्वपूर्ण होती है:
पहली गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने पर भूमि भुरभुरी और उपजाऊ बनती है।
2 से 3 बार कल्टीवेटर चलाने से खेत अच्छी तरह तैयार होकर बुवाई के लिए उपयुक्त बन जाता है।
पाटा लगाने से मिट्टी समतल होती है और बीज अंकुरण बेहतर तरीके से होता है।
खेत से खरपतवार हटाने पर फसल को पर्याप्त पोषक तत्व और नमी मिलती है।
सड़ी गोबर खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों की बढ़वार अच्छी होती है।
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ज्वार की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Sorghum)
उन्नत बीज अच्छी पैदावार की सबसे बड़ी कुंजी है:
अनाज उत्पादन के लिए (For Grain Production)
CSV 15 किस्म बेहतर दाना उत्पादन और अच्छी गुणवत्ता के लिए किसानों में लोकप्रिय मानी जाती है।
CSV 20 किस्म अधिक पैदावार और रोग सहनशीलता के कारण किसानों को अच्छा लाभ देती है।
CSV 27 किस्म मजबूत पौधों और उच्च उत्पादन क्षमता के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
CSH 14 किस्म कम समय में अच्छी उपज देने वाली उन्नत ज्वार किस्म है।
मालदांडी किस्म स्वादिष्ट अनाज और बेहतर बाजार मांग के लिए प्रसिद्ध मानी जाती है।
हरे चारे के लिए (For Green Fodder)
MP चरी किस्म हरे चारे की अधिक पैदावार और पौष्टिकता के लिए जानी जाती है।
HC 136 किस्म पशुओं के लिए पौष्टिक चारा और तेज बढ़वार प्रदान करती है।
SSG 59-3 किस्म बहु-कटाई और अधिक हरा चारा उत्पादन के लिए उपयुक्त है।
सूखा सहनशील किस्में (Drought-Tolerant Varieties)
CSV 17 किस्म कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम मानी जाती है।
CSV 23 किस्म सूखा सहनशील होने के कारण कठिन जलवायु में भी बेहतर उत्पादन देती है।
👉 आपके क्षेत्र में ज्वार की कौन-सी किस्म सबसे ज्यादा बोई जाती है? क्या आपने कोई नई उन्नत किस्म ट्राई की है? – अपना जवाब नीचे कमेंट में जरूर दें।
ज्वार की बुवाई का सही समय (Right Time for Sowing Sorghum)
समय पर बुवाई करने से उत्पादन बढ़ता है। यदि मानसून समय पर आ जाए तो खरीफ ज्वार की पैदावार शानदार मिलती है:
खरीफ ज्वार की बुवाई जून से जुलाई के बीच करने पर बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है।
रबी ज्वार की बुवाई सितंबर से अक्टूबर में करने से फसल की बढ़वार अच्छी रहती है।
गर्मी की ज्वार जनवरी से फरवरी में बोई जाती है और अच्छा हरा चारा देती है।
समय पर बुवाई करने से पौधों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन बढ़ता है।
मानसून की शुरुआत में बुवाई करने पर ज्वार की फसल को पर्याप्त नमी मिलती है।
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बीज की मात्रा कितनी रखें (Recommended Seed Rate)
ज्वार के बीज की मात्रा मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करती है कि आप इसे चारे के लिए उगा रहे हैं या अनाज के लिए:
अनाज उत्पादन के लिए 10 से 12 किलो बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त माना जाता है।
हरे चारे की खेती के लिए 35 से 40 किलो बीज प्रति हेक्टेयर उपयुक्त रहता है।
सही बीज मात्रा रखने से पौधों की उचित दूरी और बेहतर बढ़वार सुनिश्चित होती है।
आवश्यकता से अधिक बीज उपयोग करने पर पौधों में पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है।
प्रमाणित और उन्नत बीज का उपयोग करने से अंकुरण तथा उत्पादन दोनों बेहतर मिलते हैं।
बीज उपचार क्यों जरूरी है? (Why is Seed Treatment Necessary?)
कई किसान बिना बीज उपचार के बुवाई कर देते हैं, जिससे रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है:
बीज उपचार करने से अंकुरण क्षमता बढ़ती है और पौधों की शुरुआती बढ़वार मजबूत होती है।
फफूंद और बीज जनित रोगों से फसल को सुरक्षित रखने में बीज उपचार मदद करता है।
उपचारित बीज से पौधे स्वस्थ विकसित होते हैं और उत्पादन बेहतर प्राप्त होता है।
बीज उपचार करने से कीट और रोगों का प्रारंभिक प्रकोप कम होने की संभावना रहती है।
स्वस्थ और मजबूत पौधे बनने से किसानों को अधिक उपज और अच्छा मुनाफा मिलता है।
ज्वार की बुवाई कैसे करें? (How to Sow Sorghum?)
इसकी सफल खेती के लिए खेत की अच्छी तैयारी, बीजों का उपचार, बुवाई का सही समय और उचित दूरी का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है:
कतार से कतार लगभग 45 सेंटीमीटर दूरी रखने से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है।
पौधे से पौधे 12 से 15 सेंटीमीटर दूरी रखने पर उत्पादन बेहतर प्राप्त होता है।
बीज को 3 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर बोना अंकुरण के लिए उपयुक्त माना जाता है।
सीड ड्रिल से बुवाई करने पर बीज समान दूरी पर आसानी से बोए जाते हैं।
लाइन में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण करना आसान हो जाता है।
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खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Manure and Fertilizer Management)
संतुलित खाद देने से ज्वार की पैदावार और गुणवत्ता दोनों बढ़ती हैं:
प्रति हेक्टेयर उर्वरक मात्रा (Fertilizer Dosage Per Hectare)
नाइट्रोजन 80 से 100 किलो प्रति हेक्टेयर देने से पौधों की बढ़वार बेहतर होती है।
फास्फोरस 40 से 50 किलो प्रति हेक्टेयर जड़ों को मजबूत बनाने में सहायक होता है।
पोटाश 20 से 25 किलो प्रति हेक्टेयर देने से फसल की गुणवत्ता बढ़ती है।
खाद देने का तरीका (Method of Fertilizer Application)
पूरी फास्फोरस और पोटाश की मात्रा बुवाई के समय खेत में देनी चाहिए।
नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय और बाकी बाद में दें।
संतुलित उर्वरक उपयोग करने से फसल स्वस्थ रहती है और उत्पादन अच्छा मिलता है।
जैविक खेती के लिए (For Organic Farming)
गोबर की सड़ी खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और पौधों को पोषण देने में सहायक है।
वर्मी कम्पोस्ट उपयोग करने से मिट्टी की गुणवत्ता और फसल उत्पादन बेहतर होता है।
जीवामृत का प्रयोग पौधों की बढ़वार बढ़ाने और मिट्टी को उपजाऊ बनाने में मदद करता है।
👉 क्या आप रासायनिक खाद ज्यादा इस्तेमाल करते हैं या जैविक खाद? आपको किससे बेहतर उत्पादन मिला? – अपना अनुभव नीचे कमेंट में लिखिए।
ज्वार की फसल में सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)
ज्वार की फसल ज्यादा पानी नहीं मांगती:
इस फसल को अन्य फसलों की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है।
अंकुरण अवस्था में समय पर सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है।
फूल आने के समय सिंचाई करने से दानों का विकास बेहतर तरीके से होता है।
दाना बनने की अवस्था में उचित नमी बनाए रखने से उत्पादन बढ़ता है।
खेत में जलभराव होने से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए सावधानी जरूरी है।
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खरपतवार नियंत्रण कैसे करें? (How to Control Weeds?)
खरपतवार फसल की खाद और पानी चुरा लेते हैं:
खरपतवार फसल के पोषक तत्व और नमी चुराकर उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए।
आवश्यकता अनुसार दूसरी निराई करने से खेत साफ और फसल स्वस्थ बनी रहती है।
लाइन में बुवाई करने से खरपतवार नियंत्रण और खेत प्रबंधन आसान हो जाता है।
विशेषज्ञ की सलाह अनुसार खरपतवारनाशक उपयोग करने से अवांछित घास प्रभावी रूप से नियंत्रित होती है।
ज्वार के रोग और नियंत्रण (Sorghum Diseases and Control)
ज्वार की फसल में फफूंद, जीवाणु और विषाणु जनित कई रोग लगते हैं जो इसकी उपज और गुणवत्ता को भारी नुकसान पहुंचाते हैं:
दाना फफूंदी रोग: दानों पर फफूंदी बनने से गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। बीज उपचार और समय पर रोकथाम करने से दाना फफूंदी रोग नियंत्रित रहता है।
तना छेदक कीट: तना छेदक कीट पौधों को अंदर से नुकसान पहुंचाकर बढ़वार रोक देता है। समय पर कीटनाशक छिड़काव करने से तना छेदक कीट का प्रभाव कम होता है।
शूट फ्लाई: शूट फ्लाई के प्रकोप से पौधों की शुरुआती बढ़वार प्रभावित हो सकती है। सही समय पर बुवाई और नियंत्रण उपाय अपनाने से नुकसान कम किया जा सकता है।
ज्वार की फसल में इंटरक्रॉपिंग (Intercropping in Sorghum)
कई किसान इसके साथ दूसरी फसल लगाकर अतिरिक्त कमाई करते हैं। इसके साथ उगाई जाने वाली फसलें है:
मूंग की फसल ज्वार के साथ उगाने से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है।
उड़द को ज्वार के साथ लगाने से अतिरिक्त आय और बेहतर भूमि उपयोग संभव होता है।
लोबिया की खेती ज्वार के साथ करने पर पशु चारा और मिट्टी सुधार दोनों मिलते हैं।
अरहर को ज्वार के साथ उगाने से किसानों को दोहरी फसल का लाभ मिलता है।
मिश्रित खेती अपनाने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और जोखिम कम होता है।
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ज्वार की कटाई कब करें? (When Sorghum be harvested?)
जब दाने सख्त हो जाएं और फसल सूखने लगे तब कटाई करनी चाहिए:
दाने सख्त और फसल सूखने लगे तब इसकी कटाई करना उपयुक्त माना जाता है।
समय पर कटाई करने से दानों की गुणवत्ता और उत्पादन बेहतर बना रहता है।
कटाई के बाद फसल को अच्छी तरह सुखाना सुरक्षित भंडारण के लिए जरूरी होता है।
नमी वाली जगह पर भंडारण करने से दानों में फफूंदी और खराबी बढ़ सकती है।
सही तरीके से भंडारण करने पर ज्वार लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है।
ज्वार की औसत पैदावार (Average Yield of Sorghum)
ज्वार एक प्रमुख मोटे अनाज और चारे वाली फसल है। प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार की बात करें:
अनाज उत्पादन (Grain Production)
ज्वार की उन्नत खेती से 25 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अनाज उत्पादन प्राप्त हो सकता है।
संतुलित खाद और सही सिंचाई से दानों की गुणवत्ता तथा उत्पादन बेहतर मिलता है।
उन्नत बीज और वैज्ञानिक खेती तकनीक अपनाने से अनाज उत्पादन में वृद्धि संभव होती है।
चारा उत्पादन (Fodder Production)
ज्वार से 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हरा चारा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
इसका हरा चारा पशुओं के लिए पौष्टिक और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है।
बहु-कटाई वाली ज्वार किस्में अधिक चारा उत्पादन और अतिरिक्त आय प्रदान करती हैं।
ज्वार की खेती में सफलता के महत्वपूर्ण टिप्स (Tips for Success)
इसकी खेती में सफलता के लिए उन्नत बीज चयन, सही समय पर बुवाई, और खरपतवार-कीटों का उचित प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं :
प्रमाणित और उन्नत बीज उपयोग करने से अंकुरण तथा उत्पादन बेहतर प्राप्त होता है।
समय पर बुवाई करने से पौधों की बढ़वार और फसल की गुणवत्ता अच्छी रहती है।
संतुलित खाद एवं उर्वरक देने से ज्वार की फसल स्वस्थ और मजबूत बनती है।
रोग और कीट नियंत्रण पर ध्यान देने से फसल नुकसान से सुरक्षित रहती है।
खेत में जलभराव रोकने से जड़ों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन बढ़ता है।
👉 क्या आपके इलाके में पानी की कमी है? अगर हाँ, तो क्या आप कम पानी वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं? – अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर बताइए।
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ज्वार का बाजार और बढ़ती मांग (Market and Rising Demand)
आज के समय में हेल्दी फूड की मांग तेजी से बढ़ रही है। लोग गेहूं और चावल के अलावा मोटे अनाज की तरफ बढ़ रहे हैं। ज्वार की बढ़ती मांग के कारण है:
ज्वार ग्लूटेन फ्री अनाज होने के कारण स्वास्थ्य जागरूक लोगों में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी जाती है, इसलिए बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
डायबिटीज मरीजों के लिए ज्वार उपयोगी भोजन माना जाता है, जिससे इसकी खपत बढ़ी है।
पशु चारे के रूप में ज्वार की मांग डेयरी और पशुपालन क्षेत्रों में अधिक रहती है।
सरकार द्वारा मिलेट्स को बढ़ावा देने से इसकी बाजार मांग और किसानों की आय बढ़ रही है।
ज्वार खाने के फायदे (Benefits of Consuming Jowar)
यह शुगर लेवल को नियंत्रित करने, पाचन में सुधार, और वजन घटाने में अत्यंत लाभदायक है:
यह फाइबर से भरपूर होती है, जिससे पाचन तंत्र स्वस्थ और मजबूत बना रहता है।
इसका सेवन शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा प्रदान करने में सहायक माना जाता है।
यह मोटापा नियंत्रित करने में मदद करती है और वजन संतुलित रखने में उपयोगी होती है।
यह मधुमेह रोगियों के लिए लाभदायक मानी जाती है क्योंकि यह धीरे पचती है।
ज्वार में मौजूद पोषक तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
ज्वार की खेती किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली शानदार फसल बनती जा रही है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में यह फसल किसी वरदान से कम नहीं है।
अगर किसान सही किस्म, संतुलित खाद, समय पर बुवाई और रोग नियंत्रण पर ध्यान दें, तो वे ज्वार की खेती से बेहतरीन उत्पादन और शानदार कमाई प्राप्त कर सकते हैं।
आज जरूरत है कि किसान आधुनिक खेती तकनीकों को अपनाएं और मोटे अनाज की बढ़ती मांग का फायदा उठाएं। आने वाले समय में ज्वार की खेती किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
👉 क्या आप अगली बार ज्वार की खेती करने की सोच रहे हैं? अगर हाँ, तो किस उद्देश्य से – अनाज, चारा या दोनों? – अपना जवाब नीचे कमेंट में जरूर दीजिए।
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ज्वार की खेती से जुड़े प्रश्न? – FAQs
ज्वार की खेती गर्म और शुष्क जलवायु में सबसे अच्छी होती है, विशेषकर खरीफ मौसम में।
खरीफ में जून-जुलाई और रबी में सितंबर-अक्टूबर में बोना सबसे उपयुक्त माना जाता है।
दोमट, बलुई दोमट और काली मिट्टी इसकी बेहतर पैदावार के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
अनाज उत्पादन के लिए 10-12 किलो और चारा उत्पादन हेतु 35-40 किलो बीज पर्याप्त रहता है।
CSV 15, CSV 20, CSH 14 और मालदांडी इसकी लोकप्रिय उन्नत किस्में मानी जाती हैं।
अंकुरण, फूल आने और दाना बनने की अवस्था में सिंचाई करना सबसे जरूरी माना जाता है।
गोबर खाद, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश संतुलित मात्रा में देना लाभदायक रहता है।
समय पर निराई-गुड़ाई और विशेषज्ञ सलाह अनुसार खरपतवारनाशक उपयोग करना प्रभावी उपाय माना जाता है।
दाना फफूंदी, तना छेदक और शूट फ्लाई Sorghum की फसल में प्रमुख नुकसान पहुंचाने वाले रोग-कीट हैं।
जब दाने सख्त हो जाएं और फसल सूखने लगे, तब कटाई करना उचित माना जाता है।
उन्नत खेती तकनीक अपनाने पर 25-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त हो सकता है।
हाँ, Sorghum कम पानी और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में आसानी से उगाई जा सकती है।
कम लागत, कम पानी और अच्छा उत्पादन Sorghum को किसानों के लिए लाभदायक फसल बनाते हैं।
ज्वार का उपयोग अनाज, पशु चारा, आटा, दलिया और हेल्दी खाद्य उत्पाद बनाने में होता है।
हाँ, गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत उपयोग करके जैविक Sorghum खेती आसानी से संभव है।
Sorghum फाइबर से भरपूर होती है और पाचन, ऊर्जा तथा स्वास्थ्य सुधार में सहायक मानी जाती है।
हाँ, ज्वार धीरे पचती है, इसलिए मधुमेह रोगियों के लिए उपयोगी भोजन मानी जाती है।
मूंग, उड़द, लोबिया और अरहर को Sorghum के साथ आसानी से उगाया जा सकता है।
खेत में जलभराव रोकना और समय पर रोग नियंत्रण करना बेहद जरूरी माना जाता है।
हेल्दी मिलेट्स और ग्लूटेन फ्री खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग से Sorghum लोकप्रिय हो रही है।
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