सर्रा का वास्तविक अर्थ है “सडा हुआ” क्योंकि इस बीमारी से पशु धीरे-धीरे कमजोर तथा अक्षम्य होते चले जाते है। यह रोग खून में पाए जाने वाले परजीवी ‘‘ट्रिपनोसोमा इवान्साइ” द्वारा होती है। यह जानवरों की खतरनाक बीमारियों में से है, जो कि किसानों या पशुपालकों को काफी आर्थिक हानि पहुंचाती है। यह बीमारी गाय, भैंस, ऊंट, घोडे, गधे तथा कुत्तों में पाई जाती है।
सर्रा रोग वाहक मक्खी
यह बीमारी डांस मक्खी के काटने से फैलती है, यह मक्खियां बीमार पशुओं से जीवाणु लेकर दूसरे स्वस्थ पशुओं में छोड़ देती है। यह बीमारी ज्यादातर पतझड़ के महीनों में पाई जाती है, क्योंकि इस दौरान मक्खियों का प्रकोप बढ़ जाता है।
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सर्रा रोग के लक्षण
1. घोड़ों में यह बीमारी काफी खतरनाक समझी जाती है, अगर ठीक समय पर उपचार न किया जाए तो एक सप्ताह से लेकर छ: महीने के बीच में उनकी मृत्यु हो सकती है। प्रभावित पशुओं में रुक-रुक कर बुखार चढ़ता है एवं बुखार के दौरान पशुओं के खून में जीवाणु आ जाते हैं। जानवर काफी कमजोर हो जाता है तथा उसकी टांगों को लकवा मार जाता है।
2. ऊंट में सर्रा के लक्षण अप्रत्यक्ष रहते हैं। कभी-कभी बुखार एवं सुस्ती के लक्षण पाए जाते हैं, तथा धीरे-धीरे पशु कमजोर हो जाता है। उसके शरीर के निचले भागों में सूजन आ जाती है, उसे खुजली हो जाती है तथा वह मिट्टी खानी शुरू कर देता है। ऊंटों में यह रोग लगभग तीन साल तक चलता है, इसलिए इसे ‘तिबरसा भी कहते हैं।
3. गाय तथा भैंसों में यह बीमारी आम पाई जाती है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत कम होता है। पशुओं में इस रोग के जीवाणु रहते हुए, भी काफी समय तक हानि नहीं पहुंचाते तथा ये पशु अन्य पशुओं के लिए इस बीमारी के स्रोत होते हैं। अगर कभी प्रभावित जानवर किसी दूसरी बीमारी से कमजोर हो जाए, तो इनमें भी सर्रा के लक्षण आ जाते हैं। बुखार में दांतों का किटकिटाना, मुंह से लार आना, पेट में दर्द होना इत्यादि इस रोग के लक्षण हैं।
4. कुत्तों में दूसरे लक्षणों की अपेक्षा सूजन काफी पाई जाती है, सूजन इतनी ज्यादा होती है कि गले में दर्द होता है एवं आवाज में फर्क आ जाता है। उनमें खाज हो जाती है और बाल झड़ने लगते हैं।
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सररा रोग की पहचान
सर्रा की पहचान पशु के खून की जांच द्वारा होती है, जब किसी जानवर में इस रोग के लक्षण हों तो उससे एक बूंद खुन लेकर अनुवीक्षण यंत्र द्वारा जांच की जाती है। यदि पशु में सर्रा हुई तो उसके जीवाणु काफी मात्रा में घूमते नजर आते हैं, लेकिन इस विधि से स्रोत जानवर की पहचान करना काफी कठिन होता है, क्योंकि उसके खून में जीवाणु नहीं पाए जाते है।
इन पशुओं में सर्रा की जांच के लिए उनके खून को सफेद चूहों या खरगोशों में चढ़ाया जाता है। अगर यह खून बीमार जानवरों का हो तो चूहे या खरगोश के खून में जीवाणु तीन दिन के बीच में आ जाते हैं। इस विधि के अतिरिक्त कई अन्य तरीकों से इस बीमारी की जांच प्रयोगशाला में की जाती है।
सर्रा रोग का इलाज
सर्रा की रोकथाम के लिए बीमार पशुओं की चिकित्सा के साथ-साथ मक्खियों पर नियंत्रण भी बहुत जरूरी है। सर्रा के लिए कई दवाइयों का प्रयोग होता है। इनमें ‘सुर्रामीन’ या ‘क्युनापाइरामिन’ प्रमुख है। सुर्रामीन जो कि नागानोल एन्ट्रीपोल या गिलपोल के नाम से बाजार में मिलती है, काफी पुरानी दवाई है।
इससे इलाज तो होता है, लेकिन यह शरीर में काफी जलन पैदा करती है। इसलिए इसका प्रयोग काफी सीमित है। दूसरी दवाई ‘क्यूनापाइरामिन’ जो कि एन्ट्रीसाइड के नाम से अधिक प्रख्यात है, एक बहुत ही अच्छी दवा है। इसके प्रोसाल्ट का उपयोग बचाव के लिए भी किया जाता है।
हालांकि वातावरण से डांस जाति की मक्खियों को पूरी तरह से समाप्त करना इस बीमारी से बचाव का एक बहुत अच्छा साधन है, परन्तु यह कठिन है, इसलिए सर्रा के उपचार के लिए रोगी पशुओं के इलाज के साथ-साथ मक्खियों को विभिन्न साधनों द्वारा नियंत्रण में रखना चाहिए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न?
सर्रा रोग एक परजीवी जनित बीमारी है, जो ट्रिपैनोसोमा नामक परजीवी से होती है और यह मुख्यतः मक्खियों के काटने से पशुओं में फैलती है।
यह रोग गाय, भैंस, घोड़े, ऊँट, भेड़ और बकरियों में पाया जाता है। घोड़े और ऊँट इससे अधिक प्रभावित होते हैं।
तेज बुखार, कमजोरी और सुस्ती, वजन कम होना, दूध उत्पादन में कमी, आँखों और होंठों में सूजन और एनीमिया (खून की कमी) शामिल है।
पशु के लक्षणों के आधार पर और रक्त की जाँच द्वारा इस रोग की पुष्टि की जाती है। संदेह होने पर पशु चिकित्सक से तुरंत संपर्क करना चाहिए।
यह रोग मुख्य रूप से काटने वाली मक्खियों (जैसे टेबेनिड मक्खी) के माध्यम से एक पशु से दूसरे पशु में फैलता है।
हाँ, समय पर पहचान होने पर इसका इलाज संभव है। इलाज हमेशा योग्य पशु चिकित्सक की सलाह से ही कराना चाहिए।
पशुशाला की साफ-सफाई, मक्खियों और कीटों का नियंत्रण, बीमार पशु को अलग रखना, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और पशु चिकित्सक की सलाह से निवारक उपाय अपनाना शामिल है।
तुरंत पशु चिकित्सक को दिखाएँ, स्वयं दवा न दें और बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
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