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Vegetable Farming

फूलगोभी की उन्नत खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल, पैदावार

April 8, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

गोभी वर्गीय सब्जियों में फूलगोभी का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है| इसकी खेती मुख्य रूप से श्वेत, अविकसित व गठे हुए पुष्प पुंज के उत्पादन हेतु की जाती है| इसका उपयोग सब्जी, सूप, अचार, सलाद, बिरियानी, पकौड़ा आदि बनाने में किया जाता है| फूलगोभी साथ ही यह पाचन शक्ति को बढ़ाने में अत्यन्त लाभदायक है| यह प्रोटीन, कैल्शियम व विटामिन ए तथा सी का भी अच्छा स्त्रोत है|

किसान बन्धु यदि इसकी खेती वैज्ञानिक तकनीक से करें, तो इसकी फसल से अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है| इस लेख में फूलगोभी की उन्नत खेती कैसे करें, उन्नत किस्मों तथा देखभाल और पैदावार की जानकारी का उल्लेख किया गया है| फूलगोभी की जैविक खेती की जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जियों की जैविक खेती

फूलगोभी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

इसकी सफल खेती के लिए ठंडी तथा आर्द्र जलवायु सर्वोत्तम होती है| अधिक ठंढा और पाले का प्रकोप होने से फूलों को अधिक नुकसान होता है| शाकीय वृद्धि के समय तापमान अनुकूल से कम रहने पर फूलों का आकार छोटा हो जाता है| अच्छी फसल के लिए 15 से 20 डिग्री तापमान सर्वोत्तम होता है|

यह भी पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जियों की खेती कैसे करें

फूलगोभी की खेती के लिए उन्नत किस्में

उगाये जाने के समय के आधार पर फूलगोभी को विभिन्न वर्गों में बाँटा गया है| इसकी स्थानीय और उन्नत दोनों प्रकार की किस्में उगायी जाती है| इन किस्मों पर तापमान तथा प्रकाश अवधि का बहुत प्रभाव पड़ता है| इसलिए इसकी उचित किस्मों का चुनाव और समय पर बुवाई करना अत्यन्त आवश्यक है| यदि अगेती किस्म को देर से और पिछेती किस्म को जल्दी उगाया जायेगा तो दोनों में शाकीय वृद्धि अधिक होगी फलस्वरूप फूल छोटा हो जायेगा तथा फूल देर से लगेंगे| इस आधार पर फूलगोभी को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है, जैसे- अगेती, मध्यम और पिछेती|

अगेती किस्में- अर्ली कुंआरी, पूसा कतिकी, पूसा दीपाली, समर किंग, पावस और इम्पूब्ड जापानी आदि प्रमुख है|

मध्यम किस्में- पन्त शुभ्रा, पूसा शुभ्रा, पूसा सिन्थेटिक, पूसा स्नोबाल, के- 1, पूसा अगहनी, सैगनी और हिसार न- 1 आदि प्रमुख है|

पिछेती किस्में- पूसा स्नोबाल- 1, पूसा स्नोबाल- 2 और स्नोबाल- 16 आदि प्रमुख है| किस्मों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- फूलगोभी की उन्नत किस्में, जानिए उनकी विशेषताएं और पैदावार

फूलगोभी की खेती के लिए भूमि और तैयारी

फूलगोभी की खेती वैसे तो सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती, परन्तु अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट भूमि जिसमें जीवांश की प्रचुर मात्रा उपलब्ध हो, सबसे उपयुक्त है| इसकी खेती के लिए अच्छी तरह से खेत को तैयार करना चाहिए| इसके लिए खेत को 3 से 4 जुताई करके पाटा लगाकर समतल कर देना चाहिए|

फूलगोभी की खेती के लिए खाद और उर्वरक

फूलगोभी की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत में पर्याप्त मात्र में जीवांश का होना अत्यन्त आवश्यक है| खेत में 20 से 25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट रोपाई के 3 से 4 सप्ताह पूर्व अच्छी तरह मिला देना चाहिए| इसके अतिरिक्त 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टर की दर से देना चाहिये| नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्र और फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई या प्रतिरोपण से पहले खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए तथा शेष आधी नाइट्रोजन की मात्रा दो बराबर भागों में बाँटकर खड़ी फसल में 30 एवं 45 दिन बाद उपरिवेशन के रूप में देना चाहिए|

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फूलगोभी की खेती के लिए बीज और बुवाई

बीज दर- अगेती किस्मों की बीज दर 600 से 700 ग्राम तथा मध्यम एवं पिछेती किस्मों की बीज दर 350 से 450 ग्राम प्रति हेक्टेयर है|

ग्रीष्मकालीन- ग्रीष्मकालीन फसल के लिए फरवरी से मार्च में पौधशाल में बीज की बुवाई की जाती है और मार्च से अप्रैल में पौध का मुख्य खेत में रोपण किया जाता है|

अगेती किस्म- अगेती किस्मों की फसल के लिए जून से जुलाई में पौधशाल में बीज की बुवाई की जाती है और जुलाई से अगस्त में पौध का मुख्य खेत में रोपण किया जाता है|

मध्यम किस्म- मध्यम किस्मों की फसल के लिए जुलाई से अगस्त में पौधशाल में बीज की बुवाई की जाती है और अगस्त से सितम्बर में पौध का मुख्य खेत में रोपण किया जाता है|

पिछेती किस्म- पछेती किस्मों की फसल के लिए सितम्बर से अक्टूबर में पौधशाल में बीज की बुवाई की जाती है और अक्टूबर से नवम्बर में पौध का मुख्य खेत में रोपण किया जाता है|

फूलगोभी की खेती के लिए बुवाई की विधि

फूलगोभी के बीज सीधे खेत में नहीं बोये जाते हैं| इसलिए बीज को पहले पौधशाला में बुवाई करके पौधा तैयार किया जाता है| एक हेक्टर क्षेत्र में प्रतिरोपण के लिए लगभग 75 से 100 वर्ग मीटर में पौधा उगाना पर्याप्त होता है| पौधों को खेत में प्रतिरोपण करने के पहले एक ग्राम स्टेप्टोसाइक्लिन को 8 लीटर पानी में घोलकर 30 मिनट तक डुबाकर उपचारित कर लें| फिर उपचारित पौधो को खेत में लगाना चाहिए|

अगेती फूलगोभी की खेती के समय के वर्षा अधिक नहीं होती है| इसलिए इसका रोपण कतार से कतार 40 सेंटीमीटर तथा पौधो से पौधो 30 सेंटीमीटर की दूरी पर करना चाहिए| परन्तु मध्यम तथा पिछेती किस्मों में कतार से कतार 45 से 60 सेंटीमीटर एवं पौधो से पौधो की दूरी 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए और ग्रीष्मकालीन के लिए कतार से कतार की दुरी 45 सेंटीमीटर और कतार में पौधे से पौधे की 30 सेंटीमीटर दुरी रखनी चाहिए|

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फूलगोभी की खेती के लिए सिंचाई प्रबन्धन

पौधों की अच्छी बढवार के लिए मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी का होना अत्यन्त आवश्यक है| सितम्बर के बाद 10 या 15 दिनों के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए| ग्रीष्म ऋतु में 5 से 7 दिनों के अन्तर पर सिंचाई करें|

फूलगोभी की फसल में खरपतवार नियंत्रण

फूलगोभी में फूल तैयार होने तक दो से तीन निराई-गुड़ाई से खरपतवार पर नियंत्रण हो जाता है, परन्तु व्यवसाय के रूप में खेती के लिए खरपतवारनाशी दवा पेंडीमेथिलीन 3.0 लीटर को 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव रोपण के पहले काफी लाभदायक होता है|

फूलगोभी की उन्नत फसल में निराई-गुड़ाई

फूलगोभी के पौधों की जड़ों के समुचित विकास के लिए निराई-गुड़ाई अत्यन्त आवश्यक है| इस क्रिया से जड़ों के आसपास की मिट्टी ढीली हो जाती है तथा हवा का आवागमन अच्छी तरह से होता है, जिसका अनुकूल प्रभाव उपज पर पड़ता है| वर्षा ऋतु में यदि जड़ों के पास से मिट्टी हट गयी हो तो चारों तरफ से पौधों में मिट्टी चढ़ा देना चाहिए|

फूलगोभी की खेती में सूक्ष्म तत्वों का महत्व

बोरन- बोरन की कमी से फूलगोभी का खाने वाला भाग छोटा रह जाता है| इसकी कमी से शुरू में तो फूलगोभी पर छोटे-छोटे दाग या धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं एवं बाद में पूरा का पूरा फूल हल्का गुलाबी पीला या भूरे रंग का हो जाता है, जो खाने में कडुवा लगता है| फूलगोभी और फूल का तना खोखला हो जाता है तथा फट जाता हैं| इससे फूलगोभी की पैदावार और गुणवता दोनों में कमी आ जाती है| इसकी रोकथाम के लिए बोरेक्स 10 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से अन्य उर्वरक के साथ खेत में डालना चाहिए|

मॉलीब्डेनम- इस सूक्ष्म तत्व की कमी से फूलगोभी का रंग गहरा हरा हो जाता है तथा किनारे से सफेद होने लगती है, जो बाद में मुरझाकर गिर जाती है| इससे बचाव के लिए 1. 0 से 1.50 किलोग्राम मॉलीब्डेनम प्रति हेक्टर की दर से मिट्टी में मिला देना चाहिए| इससे फूलगोभी का खाने वाला भाग अर्थात फल पूर्ण आकृति को ग्रहण कर ले और रंग श्वेत अर्थात उजला तथा चमकदार हो जाय तो पौधों की कटाई कर लेना चाहिए| देर से कटाई करने पर रंग पीला पड़ने लगता है और फूल फटने लगते हैं| जिससे बाजार मूल्य घट जाता है|

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फूलगोभी की फसल में कीट नियंत्रण

फूलगोभी में मुख्य रूप से लाही, गोभी मक्खी, हीरक पृष्ठ कीट, तम्बाकू की सूड़ी आदि कीड़ों का प्रकोप होता है| लाही कोमल पत्तियों का रस चूसती है| खासकर सर्दी के समय कुहासा या बदली लगी रहे तो इसका आक्रमण अधिक होता है| गोभी मक्खी पत्तियों में छेदकर अधिक मात्रा में खा जाती है| हीरक पृष्ठ कीट की सूड़ी पत्तियों की निचली सतह पर खाते हैं तथा छोटे छिद्र बना लेते हैं|

जब इसका प्रकोप अधिक होता है, तो छोटे पौधों की पत्तियाँ बिल्कुल समाप्त हो जाती है, जिससे पौधे मर जाते हैं| तम्बाकू की सूड़ी के वयस्क मादा कीट पत्तियों की निचली सतह पर झुण्ड में अण्डे देती है| 4 से 5 दिनों के बाद अण्डों से सूड़ी निकलती है और पत्तियों को खा जाती है| सितम्बर से नवम्बर तक इसका प्रकोप अधिक होता है|

उपरोक्त सभी कीटों का जैसे ही आक्रमण शुरू हो तो नुवाक्रान, रोगर, थायोडान किसी भी कीटनाशी दवा का 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर आवश्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिए|

फूलगोभी की फसल में रोग नियंत्रण

फूलगोभी में मुख्य रूप से गलन रोग, काला विगलन, पर्णचित्ती, अंगमारी, पत्ती का धब्बा रोग और मृदु रोमिल आसिता रोग लगते हैं| यह फफूंदी के कारण होता है| यह रोग पौधा से फूल बनने तक कभी भी लग सकते है| पत्तियों की निचली सतह पर जहाँ फफूंद दिखते हैं उन्हीं के ऊपर पत्तियों के ऊपरी सतह पर भूरे धब्बे बनते हैं|

जो कि रोग के तीव्र हो जाने पर आपस में मिलकर बड़े धब्बे बन जाते हैं| काला गलन नामक रोग भी काफी नुकसानदायक होता है| रोग का प्रारंभिक लक्षण ‘ट’ आकार में पीलापन लिये होता है| रोग का लक्षण पत्ती के किसी किनारे या केन्द्रीय भाग से शुरू हो सकता है, यह बैक्टीरिया के कारण होता है|

उपरोक्त रोगों से बचाव के लिए रोपाई के समय पौधों को स्ट्रेप्टोमाइसीन या प्लेन्टोमाइसीन के घोल से उपचारित कर ही खेत में लगाना चाहिए| दवा की मात्रा आधा ग्राम दवा + 1 लीटर पानी बाकी सभी रोगों से बचाव के लिए फफूदीनाशक दवा इन्डोफिल एम- 45 की 2 ग्राम या ब्लाइटाक्स की 3 ग्राम मात्रा को 1 लीटर पानी में दर से घोल कर आवश्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिए| कीट एवं रोग रोकथाम की अधिक जानकारी के लिए यहां पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जी की फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन कैसे करें

फूलगोभी की उन्नत फसल से फल कटाई 

फूलगोभी कि कटाई तब करें जब उसके फल पूर्ण रूप से विक़सित हो जाएँ, फल ठोस तथा आकर्षक होने चाहिए| फूलगोभी कि किस्मों के अनुसार रोपाई के बाद अगेती 60 से 70 दिन, मध्यम 90 से 100 दिन और पछेती 110 से 180 दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाती है|

फूलगोभी की उन्नत खेती से पैदावार

उपरोक्त तकनीक द्वारा फूलगोभी की खेती करने से प्रति हेक्टेयर 150 से 250 क्विंटल तक पैदावार मिल जाती है|

भण्डारण- फलों के साथ पत्तियां लगे रहने पर 85 से 90 प्रतिशत की आद्रता के साथ और 14 से 22 डिग्री सेल्सियस तापमान पर इन्हें एक महीने तक रखा जा सकता है|

यह भी पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जियों का बीजोत्पादन कैसे करें

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फूलगोभी की उन्नत किस्में | फूलगोभी की अच्छी किस्में कौन सी है?

April 8, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

फूलगोभी की उन्नत और संकर किस्मों की उगाये जाने वाले समय के आधार पर विभिन्न वर्गो में बांटा गया है या यु कहें की अलग-अलग समय के लिए अलग-अलग अनुमोदित किस्में है| इसकी स्थानीय और उन्नत दोनों प्रकार की किस्में उगायी जाती है| इन किस्मों पर तापमान तथा प्रकाश अवधि का बहुत प्रभाव पड़ता है| इसलिए इसकी अपने क्षेत्र की प्रचलित और अधिकतम पैदावार देने वाली किस्मों का चुनाव तथा उपयुक्त समय पर बुआई करना अत्यंत आवश्यक है| यदि अगेती किस्म को देर से और पिछेती किस्म को जल्दी उगाया जाता है, तो दोनों में वनस्पतिक वृद्धि अधिक हो जाती है|

परिणामस्वरूप फल छोटे रह जाते है, तथा फल विलम्ब से लगते हैं, जिससे इसके उत्पादन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है| इस आधार पर फूलगोभी को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है, जैसे- अगेती, मध्यम और पछेती समय की किस्में| इस लेख में फूलगोभी की किस्मों एवं उनकी विशेषताएं और पैदावार की जानकारी का उल्लेख किया गया है| फूलगोभी की खेती की विस्तृत जानकारी की लिए यहाँ पढ़ें- फूलगोभी की उन्नत खेती कैसे करें

फूलगोभी की किस्में

अगेती किस्में- अर्ली कुंआरी, पूसा कतिकी, पूसा दीपाली, समर किंग, पावस, इम्प्रूब्ड जापानी आदि प्रमुख है|

मध्यम किस्में- पंत सुभ्रा, पूसा सुभ्रा, पूसा सिन्थेटिक, पूसा स्नोबाल, के.- 1, पूसा अगहनी, सैगनी, हिसार न- 1 आदि प्रमुख है|

पिछेती किस्में- पूसा स्नोबाल- 1, पूसा स्नोबाल- 2, स्नोबाल- 16 आदि प्रमुख है|

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फूलगोभी की उन्नत किस्मों की विशेषताएं और पैदावार

पूसा दीपाली- इस फूलगोभी की किस्म को उत्तरी भारत के लिए अनुमोदित किया गया है, विशेषता दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पंजाब में उगाने के लिए सलाह दी गयी है| शीघ्र तैयार होने वाली किस्म, सघन फल, सफेद फल, मध्यम आकार तथा चिपचिपेपन से बिल्कुल मुक्त होती है| फल कटाई के लिए अक्टूबर के अंत में तैयार हो जाते है|

अर्ली कुंवारी- इस फूलगोभी की किस्म को हरियाणा, पंजाब तथा दिल्ली के लिए अनुमोदित किया गया है| यह बहुत शीघ्रता से पकने वाली किस्म है| फल समतल सतह के साथ अर्धगोल आकार में होते हैं| मध्य सितम्बर से लेकर मध्य अक्टूबर तक इसकी कटाई की जा सकती है| औसतन पैदावार 8 टन प्रति हेक्टेयर है|

पंजाब जायंट- 26- यह मुख्य मौसम की किस्म है| फल मजबूत, सफेद, मध्यम आकार के होते हैं| इसकी कटाई मध्य नवम्बर से दिसम्बर तक की जा सकती है| औसतन पैदावार 17 टन प्रति हेक्टेयर है|

पंजाब जायंट- 35- यह भी फूलगोभी की मुख्य मौसम की किस्म है| फल सफेद, सघन तथा मध्य आकार के होते हैं| इसकी कटाई मध्य नवम्बर से दिसम्बर तक की जा सकती है| औसतन पैदावार 17 टन प्रति हेक्टेयर है|

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पंत शुभ्रा- इस फूलगोभी की किस्म को उत्तरी भारत के लिए अनुमोदित किया गया है| यह शीघ्रता से तैयार होने वाली फसल है| फल सघन, थोडा शंक्वाकार तथा क्रीम सफेद होते हैं| यह कटाई के लिए नवम्बर में तैयार हो जाती है| औसतन पैदावार 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

पूसा स्नोबल- 1- यह फूलगोभी की देर से पकने वाली किस्म है| इसके फल सघन, आकार में मध्यम तथा रंग में बर्फ जैसे सफेद होते हैं| इसकी कटाई जनवरी से अप्रैल तक की जा सकती है| औसतन पैदावार 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है| यह काली सडन के प्रति संवेदनशील है|

स्नोबल- 16- यह फूलगोभी की किस्म उत्तरी भारत में ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है| यह देर से पकने वाली किस्म है| इसके फल मध्यम आकार के, संगठित तथा आकर्षक सफेद रंग के होते हैं| इसकी कटाई जनवरी से मार्च तक की जा सकती है| औसतन पैदावार 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

पूसा अर्ली सिंथेटिक- यह फूलगोभी की मुख्य मौसम की किस्म है| इसके फल थोड़े क्रीम सफेद एवं सघन होते हैं| इसकी कटाई मध्य दिसम्बर से मध्य जनवरी तक की जा सकती है| औसतन पैदावार 11 टन प्रति हेक्टेयर है|

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पंत गोभी- 2- यह फूलगोभी की शीघ्र पकने वाली किस्म है| इसके फल सघन, क्रीम सफेद होते हैं| इसकी कटाई नवमबर से दिसम्बर तक की जा सकती है| औसतन पैदावार 12 टन प्रति हेक्टेयर है|

पंत गोभी- 3- यह फूलगोभी की शीघ्र पकने वाली किस्म है| इसके फल मध्यम आकार के और सफेद संगठित होते हैं| इसकी कटाई अक्टूबर से की जा सकती है| औसतन पैदावार 10 टन प्रति हेक्टेयर है|

दनिया कलिंपोंग- आमतौर पर इसे भारत के पूर्वी भागों में उगाया जाता है| विलंबित मौसम की फसल है| इसके फल मध्य से लेकर बड़े, शघन, आकर्षित और सफेद होते हैं| यह वातावरण में होने वाले उतार चड़ाव के प्रति कम संवेदनशील है| इसकी कटाई जनवरी से अप्रैल तक की जा सकती है| औसतन पैदावार 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

पूसा कार्तिकी- यह भी एक अल्पकालीन किस्म है, फल बंधे हुए अच्छे छोटे आकार के व सफ़ेद रंग के होते है| इसके फल नवम्बर में उपलब्ध हो जाते है| यह लगभग 12 से 13 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार देती है| यह किस्म अन्य प्रचलित किस्मों में अच्छी मानी गई है|

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पूसा अगहनी- इस किस्म के बीज की बुवाई जुलाई के अंतिम सप्ताह से 15 अगस्त तक की जाती है, फुल बड़े आकार के ठोस व सफ़ेद होते है| यह किस्म 130 दिनों में फल देने शुरू कर देती है| फल नवम्बर से दिसंबर में कटाई के योग्य हो जाते है| यह प्रति हेक्टेयर 15 से 18 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार दे देती है|

पटना मध्यकालीन- यह बिहार राज्य के लिए अनुमोदित किस्म है, लेकिन इसे उत्तरी भारत में भी उगाया जाता है| फल अधिक बड़े व सुगठित होते है, फल मध्य नवम्बर से मध्य दिसंबर तक उपलब्ध रहते है, यह प्रति हेक्टेयर 15 से 17 टन तक पैदावार दे देती है|

हिसार न- 1- इस किस्म के पौधों की बुवाई अगस्त के दुसरे पखवाड़े में की जाती है| पौधा बड़े आकार वाला होता है, फुल मध्यम आकार के ठोस, सुडौल तथा सफ़ेद रंग के होते है| यह किस्म 130 से 150 दिन में फल देना शुरू कर देती है|

जापानी इम्प्रूव्ड- यह विदेशी किस्म भारत के करीब सभी क्षत्रों के लिए अनुमोदित है| इस किस्म का पौधा छोटा होता है, यह किस्म 100 से 110 दिन में फल देना शुरू कर देती है, इसके फल ठोस हल्के पीले तथा मध्यम आकार के होते है| यह प्रति हेक्टेयर 17 से 19 टन तक पैदावार दे देती है|

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पत्ता गोभी की उन्नत खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल, पैदावार

April 7, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

देश के मैदानी और पहाड़ी दोनों क्षेत्रों में पत्ता गोभी (बंद गोभी) की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है| पत्ता गोभी में स्टोरेज क्षमता अधिक होने के कारण इसको बाज़ार की आवश्यकतानुसार कुछ समय तक खेत में रोक भी सकते हैं, अर्थात देर से कटाई कर सकते हैं| कटी हुई पत्ता गोभी का उपयोग सब्जी, कढ़ी, सलाद, अचार, पकौड़ा बनाने में किया जाता है| पत्तागोभी में पाचन शक्ति को बढ़ाने की क्षमता होती है साथ ही मधुमेह रोगियों के लिये भी लाभदायक है| इसमें प्रचुर मात्रा में खनिज, जल तथा विटामिन पाये जाते है|

पत्ता गोभी में 91.9 प्रतिशत नमी, 1.8 प्रतिशत प्रोटीन, 0.1 प्रतिशत वसा, 4.6 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 0.039 प्रतिशत कैल्शिम, 0.044 प्रतिशत फास्फोरस, 0.0 08 प्रतिशत लोहा, साथ ही साथ विटामिन ए, विटामिन बी- 1, बिटामिन बी- 2 और विटामिन- सी पाया जाता है| किसान बन्धु वैज्ञानिक तकनीक से इसकी खेती कर के इसकी अधिकतम पैदावार प्राप्त कर सकते है| इस लेख में पत्ता गोभी की उन्नत खेती कैसे करें, तथा उसकी उन्नत किस्मों एवं देखभाल और पैदावार की जानकारी का उल्लेख किया गया है| पत्ता गोभी की जैविक खेती की पूरी जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जियों की जैविक खेती

पत्ता गोभी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

पौधों की अच्छी बढवार लिए ठंडी तथा आर्द्र जलवायु अच्छी होती है| अधिक ठंड और पाले के प्रकोप से गाठों को नुकसान होता है| वर्षा के समय तापमान अनुकूल से कम रहने पर गाठों का आकार छोटा हो जाता है और गांठ का स्वाद भी खराब हो जाता है| इसकी अच्छी पैदावार के लिए 15 से 20 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान सर्वोत्तम होता है|

यह भी पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जियों की खेती कैसे करें

पत्ता गोभी की खेती के लिए उन्नत किस्में

पत्ता गोभी की किस्मों को इसके रंग, रूप एवं आकार के आधार पर तीन भागों में बाँटा गया है| पहली अगेती किस्में, दूसरी मध्यम किस्में और तीसरी, पिछेती किस्में जो इस प्रकार है, जैसे-

अगेती किस्में- गोल्डेन एकर, प्राइड आफ इंडिया, पूसा मुक्ता आदि प्रमुख है|

मध्यम किस्में- अर्ली ड्रमहेड, पूसा मुक्त आदि प्रमुख है|

पछेती किस्में- पूसा ड्रमहेड, लेट ड्रमहेड- 3 गणेश गोल, हरी रानी गोल आदि प्रमुख है| किस्मों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- पत्ता गोभी की किस्में, जानिए विशेषताएं और पैदावार

पत्ता गोभी की खेती के लिए भूमि और तैयारी

पत्ता गोभी की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है| परन्तु अच्छी जल निकास वाली दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो, इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होती है|

पत्ता गोभी की खेती के लिए खाद और उर्वरक

पत्ता गोभी की अच्छी पैदावार के लिए खेत में पर्याप्त मात्रा में जीवांश का होना अत्यंत आवश्यक है| इसलिए खेत में 20 से 25 टन गोबर की खड़ी खाद या कम्पोस्ट तथा 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता होती है| नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा, फॉसफोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए| शेष नाइट्रोजन की मात्रा को दो बराबर भागों में बाँट कर खड़ी फसल में 30 एवं 45 दिनों पर देनी चाहिए|

यह भी पढ़ें- गांठ गोभी की उन्नत खेती कैसे करें

पत्ता गोभी की खेती के लिए बीज की मात्रा

पत्ता गोभी की अगेती किस्मों के लिए 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है| पछेती खेती के लिए 300 से 400 ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है| पत्तागोभी की अगेती खेती में कुछ पौधों के मरने की संभावना रहती है| इसलिए अधिक बीज की आवश्यकता होती है|

पत्ता गोभी की खेती के लिए बुवाई का समय

पत्ता गोभी की अगेती खेती के लिए अगस्त के अंतिम सप्ताह सितम्बर मध्य तक नर्सरी में बीज की बुवाई कर देनी चाहिए| मध्यम एवं पछेती किस्मों लिए 15 सितम्बर से अक्टूबर अंत तक बीज की बुवाई कर देनी चाहिए| बीज की बुवाई यदि समय पर की जाती है तो इसका सीधा प्रभाव उपज पर देखने को मिलता है|

पत्ता गोभी की खेती के लिए नर्सरी लगाना

एक हेक्टेयर खेत में पौधा रोपन के लिए 75 से 100 वर्गमीटर की पौधाशाला में बीज की बुवाई करनी चाहिए| पौधाशाला किसी ऊँचे स्थान पर बनाएं जहाँ जल जमाव न हो| पौधशाला की मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए तथा पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी हुई खाद या वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करना चाहिए|

पत्ता गोभी की खेती के लिए पौधा रोपण

पौधा रोपण के पूर्व खेत को क्यारियों में बाँट लें| इससे निराई-गुड़ाई में सुविधा होगी। सिंचाई के लिए भी क्यारियाँ सुविधाजनक होती है| तैयार पौधा को 45 सेंटीमीटर कतार से कतार और 45 सेंटीमीटर पौधे से पोधे की दूरी पर सायं काल में पौधा की रोपाई कर सिंचाई कर देनी चाहिए|

यह भी पढ़ें- ब्रोकली की उन्नत खेती कैसे करें

पत्ता गोभी की उन्नत फसल में सिंचाई प्रबंधन

पत्ता गोभी के पौधों की अच्छी बढवार के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी का होना अत्यंत आवश्यक है| वर्षा ऋतु में यदि पर्याप्त नमी नही हो तो सिंचाई करते रहना चाहिए| सितम्बर के बाद 10 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई अवश्य करते रहना चाहिए|

पत्ता गोभी की फसल में खरपतवार नियंत्रण

पत्ता गोभी में दो से तीन निकाई-गुड़ाई करने से खरपतवार का नियत्रंण हो जाता है, परन्तु व्यावसायिक स्तर पर खेती के लिए खरपतवारनाशी पेंडीमेथालिन 3 लीटर को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव रोपने के पहले काफी लाभदायक होता है|

पत्ता गोभी की खेती के लिए निकाई-गुड़ाई 

पौधों की जड़ों के समुचित विकास के लिए निकाई-गुड़ाई अत्यंत आवश्यक है| ऐसा करने से जड़ों के पास की मिट्टी ढीली होती है तथा हवा का आवागमन अच्छी तरह से होता है| जिसका प्रभाव उपज पर पड़ता है| वर्षा ऋतु में यदि जड़ों के पास से मिट्टी हट गयी हो तो चारों तरफ से हल्की मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए|

पत्ता गोभी की फसल में कीट रोकथाम

पत्ती भक्षक कीट- इसमें आरा मक्खी, फली बीटल, पत्ती भक्षक लटें, हीरक तितली, गोभी की तितली, तम्बाकू की इल्ली मुख्य है| ये कीट पत्ता गोभी की पत्तियों को खाकर काफी नुकसान पहुंचाते है|

रोकथाम- इन कीटों की रोकथाम के लिए नीम बीज अर्क (4 प्रतिशत) या बी टी 1 ग्राम प्रति लीटर या स्पिनोसैड 45 एस सी 1.0 मिलीलीटर प्रति 4 लीटर या एमामेक्टिन बेंजोएट 5 एस सी 1.0 ग्राम प्रति 2.0 लीटर या क्लोरऐन्ट्रसनिलिम्रोल 18.5 एस सी 1.0 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर या फेनवैलरेट 20 ई सी 1.5 मिलीलीटर प्रति 2 लीटर पानी का छिड़काव करें|

मोयला- ये कीट पत्ता गोभी की पत्तियों से रस चूसकर हानि पहुंचाते है| जिससे पौधे कमजोर हो जाते है और पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है|

रोकथाम- डाइमेथोएट 30 ई सी 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल, 1.0 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी का छिड़काव करें|

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पत्ता गोभी की फसल में रोग रोकथाम

आई गलन (डम्पिंग ऑफ)- यह रोग गोभी की अगेती किस्मों में नर्सरी अवस्था में होता है| जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पड़कर कमजोर हो जाता है और नन्हें पौधे गिरकर मरने लगते हैं|

रोकथाम- बुवाई से पूर्व पत्ता गोभी के बीजों को थाइम या कैप्टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये| रोग के लक्षण दिखाई देने पर बोर्डो मिश्रण 2:2:50 या कॉपर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करें|

काला सड़न- बीजों की क्यारी में नई पौध पर यह रोग अधिक लगता है| पौधों की पत्तियों के किनारों पर जगह जगह पीले चकत्ते दिखाई देते हैं व शिरायें काली दिखाई देते है| उग्रावस्था में यह रोग गोभी के अन्य भागों पर भी दिखाई देता है| जिसमें फूल का डंठल अन्दर से काला पड़ जाता है|

रोकथाम- पत्ता गोभी के बीजों को बुवाई से पूर्व स्ट्रेओसाइक्लिन 250 ग्राम या बाविस्टिन एक ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में 2 घण्टे तक भिगोकर छाया में सुखावें व बुवाई करें| पौध रोपण के पर्व पौध की जड़ों को स्ट्रेप्टोसाइक्लिन एवं बाविस्टिन के घोल में एक घण्टे तक डुबोकर लगावे तथा फसल में रोग के लक्षण दिखने पर उपरोक्त दवाओं का छिड़काव करें| कीट एवं रोग रोकथाम की अधिक जानकारी के लिए यहां पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जी की फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन कैसे करें

पत्ता गोभी फसल के फलों की तुड़ाई और पैदावार

ठोस तथा पूर्ण विकसित पत्ता गोभी तुड़ाई के योग्य मानी जाती है| अगेती फसल की पैदावार प्रति हैक्टेयर 200 से 300 क्विंटल तथा पिछेती किस्म की पैदावार 300 से 400 क्विंटल प्रति हैक्टेयर के बीच होती है| संकर किस्मों से तैयार होने वाली गोभी समान आकार की व एक ही समय में तुड़ाई लायक हो जाती है| इसके अलावा शत प्रतिशत गोभी प्राप्त होती है| जो खेत में लम्बे समय तक बिना फटे टिक पाती है| इन किस्मों से 400 से 550 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की पैदावार आसानी से प्राप्त की जा सकती है|

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पत्ता गोभी की किस्में | पत्ता गोभी की अच्छी किस्में कौन सी है?

April 6, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

यह गोभी वर्गीय महत्वपूर्ण सब्जी की एक फसल है| पत्ता गोभी (बंद गोभी) की खेती विभिन्न ऋतुओं में लगभग पुरे वर्ष हमारे देश में की जाती है| किसानों को कृषि सस्य क्रियाओं, पोषक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और पौध संरक्षण के साथ साथ पत्ता गोभी की अपने क्षेत्र की प्रचलित व उन्नत तथा अधिक पैदावार देने वाली किस्म के चयन पर भी ध्यान देना चाहिए| ताकि उनको अधिकतम पैदावार प्राप्त हो सके| पत्तागोभी की बहुमुखीयता को इसके फल के रंग तथा परिपक्वता के आधार पर विभाजित किया जा सकता है|

भारत में, सफेद पत्तागोभी लोकप्रिय है| पत्तागोभी की किस्में नोकदार, गोल व चपटे आकार की होती हैं| पत्तागोभी की सामान्य रूप से उगाई जाने वाली किस्में तथा उनकी विशेषताएं अलग-अलग हैं| इस लेख में पत्ता गोभी की किस्मों एवं उनकी विशेषताओं और पैदावार की जानकारी का उल्लेख है| पत्ता गोभी की उन्नत खेती की पूरी जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- पत्ता गोभी की उन्नत खेती कैसे करें

पत्ता गोभी की उन्नत किस्में

अगेती किस्में- प्राइड ऑफ इण्डिया, गोल्डन एकर क्रांति, एवं मित्रा (संकर) आदि प्रमुख किस्में हैं, इनकी बुवाई का समय सितम्बर माह हैं|

मध्यम व पछेती किस्में- पूसा ड्रम हैड, लेट ड्रम हैड, कोपेनहेगेन मार्किट, सितम्बर अर्ली, मिडसीजन मार्किट, श्री गणेश गोल, क्विस्टो, हरी रानी गोल, सलेक्शन- 8, हाईब्रिड- 10 (संकर) आदि प्रमुख किस्में हैं, इनके बोने का समय अक्टूम्बर माह हैं|

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पत्ता गोभी की किस्मों की विशेषताएं और पैदावार

गोल्डन एकर- यह पत्ता गोभी की जल्दी तैयार होने वाली छोटे गोल फल वाली किस्म होती है, पत्तों का रंग बाहर से हल्का हरा तथा अंदर से गहरा हरा होता है| प्रत्येक पत्तागोभी के फल का वजन 1 से 1.5 किलोग्राम तक होता है, यह रोपण से 60 से 65 दिनों के अंदर तैयार हो जाती है| कटाई देर से करने पर पत्तागोभी के सिरों में दरारें आने लगती हैं| औसत पैदावार 20 से 24 टन प्रति हक्टेयर है|

प्राइड ऑफ इंडिया- यह पत्ता गोभी की जल्दी तैयार होने वाली, मध्य से बड़े आकार के फल, जिसका वजन 1 से 1.5 किलोग्राम होता है, वाली किस्म है| यह रोपण से 70 से 80 दिनों में तैयार हो जाती है| औसत पैदावार 20 से 28 टन प्रति हेक्टयेर है|

कोपेनहेगेन मार्किट- यह पत्ता गोभी की देर से पकने वाली किस्म है| यह किस्म पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय है| इसके फल का आकार बहुत बड़ा होता है| इसका वजन 2.5 से 3 किलोग्राम तक होता है| यह रोपण के बाद 75 से 80 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है|

पूसा मुक्ता- इस पत्ता गोभी की किस्म का आकार सपाट गोल होता है, यह मध्यम आकार की होती है तथा बाहर के पत्ते हल्के हरे रंग के होते हैं| प्रत्येक फल का वजन 1.5 से 2 किलोग्राम तक होता है| यह काली सडन रोग के प्रति सहनशील होती है| औसत पैदावार 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

पूसा सिंथेटिक- इस पत्ता गोभी की किस्म का आकार मध्यम होता है| यह अत्याधिक पैदावार देने वाली किस्म है| औसत उपज 43 से 45 टन प्रति हेक्टेयर तक है|

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मिडसीजन मार्किट- यह पत्ता गोभी की मध्य मौसम की किस्म है| इसके फल गोल होते हैं तथा वजन 2 से 4 किलोग्राम तक होता है| यह रोपण के बाद 80 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है|

सितम्बर अर्ली- यह पत्ता गोभी की मध्य मौसम की फसल है| जो नीलगिरी में प्रसिद्ध है| फल ठोस, नीले हरे पत्तों के साथ चपटा दीर्घाकार होता है| इसका वजन 4 से 6 किलोग्राम तक होता है| यह रोपण के 105 से 110 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है| यह काली सडन रोग के प्रति संवेदनशील है| इसकी औसत पैदावार 40 से 50 टन प्रति हेक्टयेर है| इस किस्म को पकने के बाद, कटाई से पहले खेत में रखा जा सकता है, इसके फल में कोई दरारें नहीं पडती|

पूसा ड्रम हेड- यह पत्ता गोभी की मौसम की विलंबित किस्म है| इसके फल बड़े, चपटे, कुछ हद तक ढीले तथा ड्रम के आकार के होते हैं| प्रत्येक फल का वजन 3 से 5 किलोग्राम तक होता है| बाहर के पत्ते हल्के हरे रंग के होते है, जिन पर उभरी हुई नसें होती है| अच्छी फसल के लिए लम्बी सर्दी का मौसम चाहिए| यह ब्लैक लैग रोग के प्रति सहनीय है| औसत उपज 50 से 54 टन प्रति हेक्टयेर है|

अर्ली ड्रम हेड- यह पत्ता गोभी की जल्दी पकने वाली, चपटे फल, मध्य-बड़ी, 2 से 3 किलोग्राम वजन वाली किस्म है| औसत पैदावार 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

लेट लार्ज ड्रम हेड- यह पत्ता गोभी की देर से पकने वाली घनी, चपटी, तथा आकार में बराबर किस्म है| रोपण के बाद से 100 से 110 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है| औसत पैदावार 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

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के- 1- इस पत्ता गोभी के फल बड़े आकार के होते है, और अंदर के पत्ते सफेद रंग के होते हैं| यह काले सडन रोग के प्रति सहनीय होती है| इसकी औसत पैदावार 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

क्विस्टो- यह पत्ता गोभी की रोपाई के 80 से 85 दिन बाद तैयार होने वाली संकर किस्म है| इसके फल का वजन 3 से 5 किलोग्राम तक गोलाकार व बहुत सख्त होता है| इसकी महत्वपूर्ण विशेषता यह है, कि यह अपनी अवधि 80 से 85 दिनों तक बिना खिले व फटे उत्तम अवस्था में रह सकती है| प्रति हैक्टेयर औसत पैदावार 35 से 40 टन है|

श्री गणेश गोल- यह पत्ता गोभी की किस्म रोपण के लगभग 80 दिन बाद तैयार हो जाती है| इसके फल आकार में काफी बड़े गोलाकार ठोस व अधिक पैदावार देने वाले होते हैं, जो तैयार होने के बाद बहुत दिनों तक नहीं फटते तथा प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 35 टन है|

हरी रानी गोल- पत्ता गोभी की यह संकर किस्म रोपण के 90 से 95 दिन बाद तैयार हो जाने वाली है| इसके फल का औसतन वजन 2 से 3 किलोग्राम तक होता है| औसत पैदावार 35 से 40 टन प्रति हैक्टेयर है|

क्रांति- यह पत्ता गोभी की किस्म रोपाई के 60 से 65 दिन में तैयार होने वाली संकर किस्म है| इसके फल का वजन लगभग 1 किलोग्राम होता है| इस किस्म को खेत में कम दुरी पर लगाते हैं| इसकी औसत पैदावार लगभग 20 टन प्रति हेक्टेयर है|

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गांठ गोभी की उन्नत खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल, पैदावार

April 6, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

गांठ गोभी को देश में कई नामों से जाता है| इसकी खेती काश्मीर, बंगाल, महाराष्ट्र आसाम, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में की जाती है| गांठ गोभी का गोभी वर्गीय सब्जियों में महत्त्वपूर्ण सब्जी है, परन्तु काफी कम क्षेत्र में इसकी खेती हो रही है| देश के पहाड़ी क्षेत्रों की लोकप्रिय सब्जी है, क्योंकि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इसका खेती सम्भव है|

किसान बन्धु वैज्ञानिक तकनीक से इसकी खेती कर के इसके अच्छी गुणवता के फल और अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते है| इस लेख में गांठ गोभी की उन्नत खेती कैसे करें एवं इसकी किस्मों, देखभाल और पैदावार की जानकारी का उल्लेख किया गया है| अन्य गोभी वर्गीय सब्जियों की वैज्ञानिक तकनीक से खेती की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जियों की खेती कैसे करें, जानिए उन्नत तकनीक

गांठ गोभी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

गांठ गोभी के लिए ठण्डी और गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है| पौध वृद्धि तथा गाठों के गठन के लिए औसत तापमान 15 से 20 डिग्री सेंटीग्रेट अच्छा माना गया है|

गांठ गोभी की उन्नत खेती के लिए भूमि का चयन

गांठ गोभी की लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में इसकी खेती सम्भव है, लेकिन जीवांश पदार्थों की मात्रा प्रचुर होनी चाहिए| अगेती फसल के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है| भूमि का पी एच मान 5.5 से 6.5 उचित माना गया है|

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गांठ गोभी की खेती के लिए खेत की तैयारी

गांठ गोभी की खेती के लिए 3 से 4 जुताई की आवश्यकता होती है| पहली जुताई मिट्टी पहटने वाले हल से शेष कलटीवेटर से करनी चाहिए| प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिए| इससे मिट्टी भुरभुरी तथा खेत समतल बन जाता है| खेत तैयार होने के बाद सुविधानुसार क्यारियाँ बना लें, जिससे सिंचाई और निराई गुड़ाई में सुविधा हो|

गांठ गोभी की खेती के लिए उन्नत किस्में

गांठ गोभी की अभी तक अधिक किस्मों का विकास नहीं हुआ है, हवाईट वियना, परपल वियना लार्ज ग्रीन किंग नाम की प्रमुख किस्में हैं|

लार्ज ग्रीन- हरी व गोल, हरे गोल उभार वाली, अगेती, छोटे शिखर, बड़े आकार की, कोमल और सुगंधित, गूदा सफेद, करीब 75 दिन में तैयार, औसत पैदावार 225 से 250 किंवटल प्रति हैक्टेयर, मध्य और ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म है|

किंग ऑफ नार्थ- छोटे पौधे की किस्म हैं, लगभग 20 से 30 सेंटीमीटर पौधे की ऊँचाई होती है| इसकी पत्तियाँ गाढ़ी हरी और इसकी गाठें चपटा गोल आकार की होती है| फसल 60 से 65 दिन में तैयार हो जाती है|

परपल वियना- यह भी छोटी किस्म है, गॉठे मध्यमा आकार की होती है| पौध रोपण के 55 से 65 दिन पर गाठें बनना प्रारम्भ होती है| इसकी काफी अच्छी पैदावार प्राप्त होती है|

व्हाईट विआना- सफेद, उभरे स्थानों और छोटे शिखर वाली, मध्य आकार, हल्का हरा या सफेद रंग, नरम, थोड़ी गंध, 50 से 60 दिन में गांठ बनना शुरू, औसतन पैदावार 150 से 200 किंवटल प्रति हैक्टेयर, मध्य एवं ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म है|

पालम टैन्डरनोब- छोटे हरे पत्ते, गांठे गोल, समतल, पतली, रेशेरहित तथा गूदेदार, अगेती, व्हाईट विआना किस्म से एक सप्ताह पहले तैयार, औसत पैदावार 250 से 275 किंवटल प्रति हैक्टेयर, सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म है|

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गांठ गोभी की खेती के लिए बुवाई का समय

गांठ गोभी की पर्वतीय क्षेत्रों में बीज की बुवाई तथा रोपाई के समय का निर्धारण क्षेत्र विशेष के उपरोक्त सुझाए गए तापमान एवं वातावरणीय परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए, जैसे-

मैदानी क्षेत्रों में- अगस्त से अक्टूबर उपयुक्त है|

मध्य क्षेत्रों में- जुलाई से अक्टूबर उपयुक्त है|

ऊँचे क्षेत्रों में- मार्च से जुलाई उपयुक्त है|

बीज की मात्रा- गाँठगोभी के लिए 1 से 1.5 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है|

गांठ गोभी की खेती के लिए पौधशाला की तैयारी

जमीन से 15 सेंटीमीटर उठी हुयी नर्सरी की क्यारी में अच्छी सड़ी हुयी गोबर या कम्पोस्ट खाद तथा 50 से 60 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से सिंगल सुपर फास्फेट मिलाकर भूमि की तैयारी करनी चाहिए| पौधशाला में भूमिगत कीटों और व्याधियों से बचाव के लिए निम्न में से कोई एक उपाय अपनाया जा सकता है, जैसे-

1. फार्मेलिन नामक रसायन का 2 प्रतिशत अर्थात् 20 मिलीलीटर दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर तैयार नर्सरी की क्यारियों में मिट्टी की दो से तीन परतों में छिड़काव करना चाहिए| इसके लिए क्यारी की मिट्टी को लगभग 6 इंच गहराई से बाहर निकालकर इसकी निचली सतह पर छिड़काव करना चाहिए, फिर मिट्टी की एक परत बिछाकर दोबारा घोल का छिड़काव करें तथा मिट्टी की दूसरी परत बिछाकर पुनः छिड़काव करें| तत्पश्चात् पॉलीथीन शीट से ढक कर इसे अच्छी प्रकार चारों ओर से दबा दें, ताकि अन्दर की गैस बाहर न निकलने पाए|

तीन दिन बाद पॉलीथीन को हटाकर क्यारियों की हल्की गुड़ाई कर खुला छोड़ दें, जिससे गैस उड़कर निकल जाये इसके एक-दो दिन बाद क्यारी को समतल करके बीज को 5 से 7 सेंटीमीटर की दूरी पर बनायी गयी कतारों में बुवाई कर बारीक मिट्टी या छनी हुई गोबर या कम्पोस्ट खाद से ढक कर हल्के हाथों से मिट्टी को थपथपाकर दबा दें तथा हल्की सिंचाई करें| अधिक वर्षा के समय क्यारीयों को छप्पर या पॉलीथीन से ढंकने का प्रबन्ध करना चाहिए|

2. क्यारी में 3 से 5 ग्राम डायथेन एम- 45 एवं थीमेट या क्लोपाइरीफास प्रति वर्गमीटर की दर से अच्छी प्रकार मिलाकर 5 से 7 सेंटीमीटर की दूरी पर 1.5 से 2.0 सेंटीमीटर गहरी कतारें निकालें, तत्पश्चात् कवकनाशी रसायन कार्बेन्डाजिम या थाइरम 2 से 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से शोधित बीज की बुवाई करें तथा हल्की सिंचाई करें, अधिक वर्षा से बचाव के लिए नर्सरी की क्यारी को घासफूस की छप्पर या पॉलीथीन शीट से ढकने का प्रबन्ध रखना चाहिए, 25 से 30 दिन की पौध रोपाई हेतु उपयुक्त होती है|

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गांठ गोभी की खेती के लिए खाद और उर्वरक

गांठ गोभी की फसल में उर्वरकों का प्रयोग मिटटी परीक्षण के आधार पर करना उपयुक्त रहता है| अच्छी पैदावार के लिए 20 से 25 टन गोबर या कम्पोस्ट की खाद, 100 से 120 किलोग्राम, नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस और 80 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है| आखरी जुताई के समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा की भूमि में अच्छी प्रकार से मिला दें|

गांठ गोभी की खेती के लिए रोपाई और दूरी

गांठ गोभी की रोपाई के लिए 25 से 30 दिन की पौध उपयुक्त होती है| तत्पश्चात् कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर तथा पौध से पौध की दूरी 20 सेंटीमीटर रखते हुए पौध रोपाई कर हल्की सिंचाई करें| यदि कुछ पौधे मर गये हों या बढ़वार अच्छी न हो, तो उनके स्थान पर नई पौध की पुनः रोपाई एक हफ्ते के अन्दर कर दें| रोपाई के एक माह बाद शेष आधी नत्रजन की मात्रा छिटककर पौधों के चारों तरफ मिट्टी चढ़ायें|

गांठ गोभी की फसल में खरपतवार नियंत्रण

गांठ गोभी की फसल में आवश्यकतानुसार हल्की निराई-गुड़ाई कर खरपतवार खेत से निकालते रहें| क्योंकि मुख्य फसल को दिये जाने वाले पोषक तत्वों को लेकर खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं| जिससे मुख्य फसल का विकास रूक जाता है और बढवार ठीक ढंग से नहीं हो पाती है| इसलिए रोपाई के 25 से 30 दिन तक खेत से खरपतवार निकालते रहना चाहिए, जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी हो और उत्तम गुणवत्ता वाली गांठे प्राप्त हों| रसायनिक नियंत्रण के लिए पेंडी मेथिलीन 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खरपतवारों के नियंत्रण के उपयोग करना चाहिए, लेकिन उपयोग से पूर्व वैज्ञानिक सलाह जरूर लेना चाहिए|

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गांठ गोभी की फसल में सिंचाई प्रबंधन

गांठ गोभी की आवश्यकतानुसार या लगभग10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए| गांठों के बनते समय सिंचाई के अंतराल में परिवर्तन हो सकता है|

गांठ गोभी की उन्नत खेती की देखभाल 

गांठ गोभी में कीट एवं रोगों का प्रकोप काफी कम होता है, कुछ प्रमुख कीट व रोग का नियंत्रण इस प्रकार कर सकते हैं, जैसे-

कीट एवं रोकथाम-

कैबेज सेमीलूपर- मादा कीट पत्तियों की निचली सतह पर अण्डे देती है, और इससे शिशु निकलकर गांठ गोभी की पत्तियों को काट कर खा जाता है| जिससे पौधा का विकास प्रभावित होता है|

रोकथाम- इसके नियंत्रण के लिए नीम सीड कर्नेल एक्सटॅक्ट 1 ग्राम पति लीटर पानी में घोल तैयार कर छिड़काव लाभदायक पाया गया है|

आरा मक्खी- व्यस्क कीट नारंगी रंग का होता है, मादा कीट पत्तियों के किनारे पर अण्डे देती है, जिससे 3 से 5 दिन में शिशु निकल आते हैं| ये बड़ी तेजी से पत्तियों को खाते हैं| जिससे पत्तियों में छेद बन जाते हैं, इसके प्रकोप से पत्तियों में बनने वाला क्लोरोफिल प्रभावित होता है, जिससे पौधों की वृद्धि रूक जाती है|

रोकथाम- नियंत्रण के लिए 5 प्रतिशत नीम तेल का छिड़काव करना चाहिए| संतुलित मात्रा में उर्वरक का प्रयोग करें, साथ ही प्रकोप की अवस्था पर सिंचाई करने पर प्रकोप कम हो जाता हैं|

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रोग एवं रोकथाम-

लीफस्पाट- इसमें पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, धब्बे अधिक बनने और बढ़ने पर पत्तियाँ झुलस जाती है|

रोकथाम- नियंत्रण के लिए बीज क्षेत्र को ट्राईकोडरमा से उपचारित करें तथा बीज को मैंकोजेब- 75 प्रतिशत चूर्ण 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल तैयार कर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए|

डैपिंग ऑफ- इस रोग के कारण बीज का अंकुरण कम हो जाता है| बीज की जड़ और तना सड़ जाते हैं| पौधे के तने का भाग गलने से नवांकुरित पौधे गिर जाते हैं तथा धीरे-धीरे सूख जाते है|

रोकथाम- इसके नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत चूर्ण का 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल तैयार कर बीज क्षेत्र को उपचारित करना चाहिए| खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करें, साथ ही फसल चक्र अपनाना चाहिए| कीट एवं रोग रोकथाम की अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जी की फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन कैसे करें

गांठ गोभी की उन्नत खेती में फल कटाई

गांठ गोभी फल की कटाई लगभग 5 से 8 सेंटीमीटर परिधि की गांठ बन जाने पर कटाई करना लाभदायक रहता है|

गांठ गोभी की उन्नत खेती से पैदावार

उपरोक्त वैज्ञानिक तकनीक से खेती करने पर विभिन्न किस्मों से 12 से 30 टन गांठ गोभी का उत्पादन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होना चाहिए|

यह भी पढ़ें- सब्जियों का पाले से बचाव कैसे करें, जानिए उपयोगी जानकारी

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ब्रोकली की उन्नत खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल और उत्पादन

April 5, 2019 by Bhupender Choudhary Leave a Comment

स्प्राउटिंग ब्रोकली (हरी गोभी) एक गोभी वर्गीय सब्जी है| ब्रोकली की खेती ठीक फूलगोभी के समान ही की जाती है| इसके बीज व पौधे देखने में लगभग फूलगोभी की तरह ही होते हैं| इसके पौधों में गोभी के समान फूल लगते हैं, इस फूल को हम सब्जी के रुप में इस्तेमाल करते हैं| ब्रोकली का खाने वाला भाग छोटी-छोटी बहुत सारी हरे फूल कलिकाओं का गुच्छा होता है| फूल गोभी में जहां एक पौधे से एक फूल मिलता है, वहीं ब्रोकली के पौधे से एक मुख्य गुच्छा काटने के बाद भी, पौधे से कुछ शाखाएं निकलती हैं और इन शाखाओं से बाद में ब्रोकली के छोटे फूल प्राप्त किए जाते है| ब्रोकली फूलगोभी की तरह ही होती है, लेकिन इसका रंग हरा होता है इसलिए इसे हरी गोभी कहा जाता है|

हमारे देश में ब्रोकली की खेती विगत कुछ वर्षों से ही शुरू की गई है| अभी इसकी खेती आमतौर पर महानगरों और पर्यटक स्थलों तक ही सीमित है| पांच सितारा होटलों तथा पर्यटक स्थलों पर इस सब्जी की मांग बहुत है और शहरों के समीप किसान इसकी खेती करके बहुत अधिक लाभ कमा रहे हैं| ब्रोकली का बाजार भाव 60 से 90 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है| ब्रोकली अन्य गोभी वर्ग की सब्जियों की अपेक्षा अधिक मात्रा में प्रोटीन, विटामिन्स व खनिज पदार्थ होते हैं| इसमें फूलगोभी से 130 गुणा और गांठगोभी से 22 गुणा विटामिन ‘ए’ होता है|

ब्रोकली में सल्फोराफेन नामक यौगिक बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है, जो कैंसर रोगियों के लिए लाभदायक होता है और स्वस्थ लोगों में कैंसर होने की संभावना कम करता है| ब्रोकली हृदय रोगियों के लिए भी फायदेमंद होती है| क्योंकि इसके खाने से रक्त में सीरम कालेस्ट्रोल का स्तर घट जाता है| ब्रोकली की पौष्टिकता को देखते हुए आम लोगों में इसकी मांग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है तथा आने वाले समय में इसकी खेती महानगरों के समीप व पर्यटक स्थलों तक ही सीमित न रहकर पूरे देश में होने लगेगी एवं किसानों के लिए इसकी खेती बहुत लाभकारी सिद्ध होगी| अन्य गोभी वर्गीय सब्जियों की वैज्ञानिक तकनीक से खेती की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जियों की खेती कैसे करें

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ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

ब्रोकली के लिए ठन्डी जलवायु की आवश्यकता होती है| देश के अधिकतर भागों में इसकी खेती रबी मौसम में की जाती है, जबकि अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती गर्मी के मौसम में भी की जा सकती है| ब्रोकली की अच्छी वृद्धि के लिए 10 से 18 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान की आवश्यकता होती है|

ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए भूमि का चयन

ब्रोकली की सफल खेती के लिए अच्छी जल धारण क्षमता वाली और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर दोमट व बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है| भूमि का पी एच मान 6.0 से 6.8 के बीच होना चाहिए| भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि खेत में पानी खड़ा रहने से पौधों की जड़ों को हानि पहुंच सकती है|

ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए खेत की तैयारी

ब्रोकली की फसल के लिए खेत तैयार करने के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या हैरो से करें, इसके बाद 2 से 3 जुताई देशी हल या कल्टी वेटर से करनी चाहिए| अन्तिम जुताई करने से पहले खेत में 10 से 15 टन प्रति हैक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी-गली खाद डाल कर मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें और पाटा लगाकर खेत को ढेले रहित व समतल बना लें|

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ब्रोकली की खेती के लिए उन्नत किस्मों का चुनाव

ब्रोकली की अच्छी उपज लेने के लिए बुवाई का समय व उगाये जाने वाले क्षेत्र के अनुसार सही किस्मों का चुनाव अति आवश्यक है| बीज हमेशा किसी विश्वसनीय संस्था जैसे- राष्ट्रीय बीज निगम, राज्य कृषि विभाग या कृषि विश्वविद्यालय आदि से ही खरीदें| इसकी किस्मे तीन प्रकार की श्वेत, हरी और बैंगनी होती है, इनमें से हरे रंग की गठे हुए शीर्ष वाली किस्में अधिक पसंद की जाती है| ब्रोकली की कुछ उन्नत किस्में इस प्रकार हैं, जैसे-

के टी एस- 1 (पूसा ब्रोकली)- इस किस्म का सिरा हल्के हरे रंग का, फल गुंथा हुआ तथा 250 से 400 ग्राम वजन का होता है| यह किस्म रोपाई के उपरान्त 80 से 90 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 120 से 140 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है|

के टी एस 59- इस किस्म का सिरा गुंथा हुआ, फल हरे रंग का होता है और इसकी औसत पैदावर 90 से 100 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है|

पालम समृद्धि- इस किस्म का सिरा हरा, गुंथा हुआ, पीले धब्बों और पत्तियों से युक्त होता है| फूल का वजन 300 से 400 ग्राम होता है| यह किस्म 85 से 95 दिन में तैयार हो जाती है और पैदावार 150 से 180 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक मिल जाती है|

ग्रीन स्प्राउटिंग ब्रोकली- इस किस्म का सिरा गहरे हरे रंग का गुंथा हुआ होता है| जिसका वजन 200 से 250 ग्राम होता है| इसके पौधे शाखायुक्त होते हैं, यह किस्म रोपाई के उपरान्त 90 से 100 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी पैदावार 120 से 150 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है|

पंजाब ब्रोकली- इसके पौधे शाखायुक्त, चिकनी पत्तियां और अत्यधिक फुटाव वाले होते हैं| सिरा मध्यम आकार, हल्की गुथी हुई हरी कलियां युक्त और फल 150 से 200 ग्राम वजन के होते हैं| यह किस्म रोपाई के 60 से 70 दिन उपरान्त तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 60 से 75 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है|

इन किस्मों के अतिरिक्त कुछ विदेशी कम्पनियां भारत में अब ब्रोकली की संकर किस्मों का बीज भी बेच रही हैं| जिनमें से कुछ संकर किस्में इस प्रकार हैं, जैसे- पैकमैन, कैप ओवन, बैकलस, ग्रीन लोफी, लैण्ड स्टार, ग्रीन मेल, ग्रीन डोम, शिगमरी आदि है|

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ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए बीज और बुवाई

ब्रोकली की एक हेक्टेयर की पौध तैयार करने के लिए लगभग 350 से 450 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है| नर्सरी में बीज की बुवाई उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में सितम्बर से अक्टूबर में की जाती है| पहाड़ी क्षेत्रों में बुवाई जुलाई से अगस्त में जबकि अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में बीज की बुवाई मार्च से अप्रैल में की जाती है|

ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए नर्सरी तैयार करना

ब्रोकली की सफल खेती के लिए स्वस्थ बीज और स्वस्थ निरोग नर्सरी का होना अत्यन्त आवश्यक है| नर्सरी तैयार करने के लिए स्थान का चुनाव करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे- नर्सरी खेत के किनारे पर लगानी चाहिए जहां धूप लगती हो, पेड़ों की छाया न हो, सिंचाई की उचित व्यवस्था हो, मिट्टी में कंकड़-पत्थर न हों| नर्सरी ऊंचे स्थान पर हो जहां पर पानी का जमाव बिल्कुल न हो| प्रत्येक वर्ष नर्सरी नई जगह पर उगानी चाहिए, जिससे कीटाणु एवं रोगजनक की संख्या अधिक न होने पाये|

नर्सरी वाले खेत की अच्छी प्रकार से जुताई करके 3 मीटर लम्बी, 0.75 मीटर चौडी तथा 15 सेंटीमीटर ऊंची उठी हुई क्यारियां बना ली जाती हैं| क्यारियों की लम्बाई आवश्यकतानुसार व भूमि की उपलब्धतानुसार बढ़ाई जा सकती है, किन्तु चौड़ाई तथा ऊंचाई इतनी ही रखनी चाहिए| दो क्यारियों के बीच में 30 से 45 सेंटीमीटर का अन्तर रखें ताकि फालतू पानी का निकास हो सके और क्यारियों की निराई-गुड़ाई करने में सुविधा हो|

प्रत्येक क्यारी में 20 से 25 किलोग्राम भली भांति सड़ी हुई गोबर की खाद डालकर, उसे मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें, इसके अतिरिक्त 200 ग्राम, सिंगल सुपर फास्फेट, 50 ग्राम यूरिया और 50 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति क्यारी की दर से मिट्टी में मिला दें| क्यारियों में बीज की बुवाई करने से पहले क्यारियों की भूमि का रोगाणु रहित करना अति आवश्यक है, इसके लिए थीरम या कैप्टान नामक कवकनाशी की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर बुवाई से 1 से 2 दिन पूर्व भूमि को उपचारित करना चाहिए|

उपचारित क्यारियों में 10 सेंटीमीटर की दूरी पर 1 से 1.5 सेंटीमीटर गहरी लाइनें बना लेते हैं| इन लाइनों में बीज की बुवाई लगभग 5 सेंटीमीटर की दूरी पर की जाती है| बुवाई के पश्चात् इन लाइनों को सड़ी हुई बारीक गोबर की खाद से ढक कर सूखी घास या सूखी पत्तियों को क्यारियों के ऊपर बिछा देना चाहिए| ढकने के पश्चात् क्यारियों की फव्वारे से हल्की सिंचाई कर दें|

अंकुरण होने पर घास या पत्तियों को हटा दें| नर्सरी में जैसे ही खरपतवार दिखाई दें उन्हें हाथ या अन्य यंत्र से निकाल दें और समय-समय पर आवश्यकतानुसार हल्की, सिंचाई करते रहें| इस प्रकार बीज बोने के लगभग 4 से 5 सप्ताह में ब्रोकली की पौध खेत में रोपाई करने योग्य हो जाती है|

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ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए पौध की रोपाई

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में ब्रोकली पौध की रोपाई अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह, पहाड़ी क्षेत्रों में अगस्त के अन्तिम सप्ताह से मध्य अक्टूबर और अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में मई में की जाती है| नर्सरी में जब पौधे 10 से 12 सेंटीमीटर या 4 से 5 सप्ताह के हो जाएं तो उनकी खेत में रोपाई कर देनी चाहिए| ब्रोकली की रोपाई पंक्तियों में की जाती है, किस्मों के अनुसार पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 60 सेंटीमीटर और पंक्ति में पौधे से पौधे के बीच का अंतर 40 सेंटीमीटर रखते हैं| पौध 3 से 4 सेंटीमीटर से अधिक गहरी नहीं लगानी चाहिए| खेत में नमी होनी चाहिए और पौध की रोपाई के बाद हल्की सिंचाई अवश्य कर दें| पौध की रोपाई दोपहर बाद या शाम के समय ही करें|

ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए खाद और उर्वरक

आमतौर पर ब्रोकली की खेत से अच्छी पैदावार लेने के लिए 10 से 15 टन गोबर की सड़ी गली खाद रोपाई से 20 से 25 दिन पहले खेत में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए| इसके साथ-साथ 100 से 125 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस और 50 से 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से देने की सिफारिश की जाती है|

फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा एवं नाइट्रोजन की एक-तिहाई मात्रा रोपाई करने से पहले खेत में समान रूप से डालकर मिट्टी में मिला देनी चाहिए| नाइट्रोजन की बाकी बची हुई दो-तिहाई मात्रा पौध रोपाई के 25 तथा 50 दिन बाद बराबर हिस्सों में बांटकर खड़ी फसल में समान रूप से छिड़क दें| नाइट्रोजन डालने के बाद खेत में सिंचाई अवश्य कर दें|

ब्रोकली में मुख्य पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश) के अतिरिक्त कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे बोरोन व मोलिब्डिनम की कमी के लक्षण भी देखे गए हैं| इसलिए इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने के लिए रोपाई से पहले खेत की तैयारी के समय 10 से 15 किलोग्राम बोरेक्स और 500 ग्राम अमोनियम मोलब्डेट का प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें|

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ब्रोकली की उन्नत खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन

पहली हल्की सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए| ब्रोकली पौध की रोपाई के 6 से 7 दिन बाद खेत में घूम कर देख लें कि पौधे सही तरह से खड़े हो गये हैं, या मर गये हैं, यदि किसी कारणवश कुछ पौधे उखड़ गये हों या मर गये हों तो उसके स्थान पर दूसरे पौधे लगाकर (गैप फिलिंग) पौधों की संख्या पूरी कर लें|

इसके बाद हल्की सिंचाई अवश्य कर दें, बाद में आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अन्तराल पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए| इस प्रकार ब्रोकली की अच्छी पैदावार लेने के लिए 5 से 6 सिंचाइयां पर्याप्त होती हैं| सिंचाई के लिए फसल की प्रारंभिक वृद्धि अवस्था और सिरा विकास अवस्था क्रान्तिक अवस्थाएं हैं| अतः इन अवस्थाओं पर खेत में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए|

ब्रोकली की फसल में खरपतवार प्रबंधन

खरपतवार फसल के साथ पोषक तत्वों, नमी, प्रकाश और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, फलस्वरूप फसल की पैदावार व गुणवत्ता में कमी आ जाती है| इसके अतिरिक्त खरपतवार फसल में लगने वाले रोगों के जीवाणुओं तथा कीट व्याधियों को भी आश्रय देते हैं| इसलिए ब्रोकली की अच्छी पैदावार लेने के लिए खेत को रोपाई के 25 से 30 दिन बाद तक खरपतवार मुक्त रखना चाहिए| खरपतवार नियंत्रण के लिए बेसालिन या ट्राईफ्लूरेलिन नामक खरपतवार नाशक की 1.0 लीटर सक्रिय तत्व की मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से रोपाई के पहले खेत में छिड़काव करके मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें|

इसके अतिरिक्त फसल में 2 से 3 उथली निराई-गुड़ाई 15 दिन के अन्तराल पर करें| निराई-गुड़ाई करने से खरपतवारों की रोकथाम के साथ-साथ भूमि में वायु संचार भी होता है| जिससे फसल वृद्धि पर अच्छा प्रभाव पड़ता है| निराई-गुड़ाई करते समय ध्यान रहे कि इससे पौधों की जड़ों को हानि न पहुंचे| अंतिम निराई-गुड़ाई के बाद पौधों पर हल्की मिट्टी चढ़ा दें जिससे पौधे न गिरें|

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ब्रोकली की फसल में कीट नियंत्रण

कीट डायमण्ड बैक मोथ- ब्रोकली का यह बहुत हानिकारक कीट है| इसकी मादा कीट पत्तियों की निचली सतह पर अण्डे देती है| जिनसे 3 से 10 दिनों में सूडियां निकल आती हैं| ये सूड़ियां, पत्तियों के सम्पूर्ण हरे भाग को काटकर अत्यधिक क्षति पहुंचाती हैं जिससे पत्तियां छलनी की भांति दिखाई देने लगती हैं|

कटुआ कीट- पौध रोपण के कुछ समय बाद इस कीट की सुंडियां पौधों के मुलायम तनों को जमीन के पास से काट देती हैं| जिससे पौधे सूखकर नष्ट हो जाते हैं|

तंबाकू की सूड़ी- इस कीट की सूड़ियां भी पौधे की मुलायम जड़ों व पत्तियों को काटती हैं, जिससे फसल को अत्यधिक हानि होती है|

कैबेज तना छेदक- यह ब्रोकली की फसल का अत्यन्त हानिकारक कीट है| गिड़ार शुरू की अवस्था में पत्तियों को खाकर विकसित होती है, जो बाद में ब्रोकली के तने के अगले भाग में प्रवेश कर मुलायम तने को गोलाई में काट देती हैं| जिससे पौधों में विकृति उत्पन्न हो जाती है तथा पैदावार में काफी कमी आ जाती है|

नियंत्रण-

1. रोपाई से पूर्व खेती की गहरी जुताई कर कुछ दिनों के लिए धूप में खुला छोड़ दें, जिससे कि इन कीटों की जमीन में छिपी विभिन्न अवस्थाओं जैसे- सुंडी, प्यूपा को तेज धूप व जैविक कारकों (परभक्षी एवं परजीवियों) द्वारा नष्ट किया जा सके|

2. खेत में उगे खरपतवारों व अन्य फसलों के अवशेषों को जलाकर या भूमि में दबाकर नष्ट कर दें, जिससे कि उनमें छिपे विभिन्न कीटों के अण्डों, सूड़ियों व प्यूपा अवस्थाओं को नष्ट किया जा सके|

3. कीटों के अण्डों को खड़ी फसल में पत्तियों की निचली सतह पर ध्यानपूर्वक देखें तथा दिखाई देने पर पत्तियों सहित काटकर मिट्टी में दबा दें, फसल में उपरोक्त कीटों का प्रकोप होने पर एण्डोसल्फान या क्वीनालफॉस कीटनाशी की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 10 दिनों के अन्तराल पर 2 से 3 बार छिड़काव करें|

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ब्रोकली की फसल में रोग नियंत्रण

आद्रगलन- यह नर्सरी में उगे छोटे पौधों में होने वाला फफूंद जनित रोग है, जो अधिक नमी व उच्च तापमान के कारण उत्पन्न होता है| रोग प्रभावित पौधे भूमि की सतह से सड़कर गिर जाते हैं|

नियंत्रण-

1. नर्सरी में बीज बोने से पहले भूमि का उपचार किसी फफूंदनाशक दवा जैसे- कैप्टान या थीरम से बुवाई के दो सप्ताह पूर्व करें, बीज को कैप्टान या बाविस्टीन से 2.5 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित करके बुवाई करें|

2. नर्सरी की क्यारियों को खेत की सामान्य सतह से 15 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर रखें और जल निकास का उचित प्रबंध रखें|

3. पौधों में रोग के लक्षण दिखायी देने पर (बीज जमाव के 15 से 20 दिन बाद) बाविस्टीन या डायथेन एम- 45 का 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर पौध पर छिड़काव करें|

चेपा (माहू)- यह हरे मटमैले व छोटे आकार के कीट होते हैं| जो कि पौधों की पत्तियों का रस चूस लेते हैं, जिससे पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं और प्रभावित पौधों की उत्पादन क्षमता कम हो जाती है|

नियंत्रण- चेपा के प्रभावी नियंत्रण के लिए मेलाथियान, या एण्डोसल्फान दवा 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर पौधों पर अच्छी प्रकार छिड़काव करना चाहिए|

काला विगलन- मौसम में अधिक आद्रता और अधिक तापमान होने पर यह रोग तेजी से फैलता है| रोगी पौधों की पत्तियों के किनारे पर पीले रंग के धब्बे बनने लगते हैं| जो आकार में वृद्धि कर मध्यशिरा तक फैल जाते हैं| जिससे पत्तियों की शिराओं का रंग काला या भूरा हो जाता है तथा पत्तियां गिर जाती हैं| कीट एवं रोग नियंत्रण की अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- गोभी वर्गीय सब्जी की फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन कैसे करें

नियंत्रण-

1. ब्रोकली का प्रमाणित बीज बोयें|

2. रोग रोधी किस्में उगायें|

3. बीज बोने से पहले इसे 52 डिग्री सेल्सियस तापमान पर आधे घंटे तक पानी में डालकर उपचारित करें|

4. स्ट्रेप्टोसाइक्लीन का 100 से 200 पी पी एम का घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें|

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ब्रोकली की फसल के फलों की कटाई

फसल में जब हरे रंग की कलियों का मुख्य सिरा (मन हैड) बनकर तैयार हो जाये तो इसे लगभग 12 से 15 सेंटीमीटर लंबे डंठल के साथ तेज चाकू या दराती से कटाई कर लें| मुख्य सिरा काटने के बाद पौधों के तनों से दूसरी छोटी-छोटी कलियां निकलती हैं तथा ये कलियां उप सिरा (सब हैड) के रूप में तैयार हो जाती हैं| इन उप सिरों को भी 8 से 10 सेंटीमीटर लंबे डंठल सहित उचित समय पर कलियां खिलने से पहले कटाई करें|

ध्यान रखें कि कटाई के समय सिरा (हैड) खूब गुंथा हुआ हो| तथा उसमें कोई कली खिलने न पाये| ब्रोकली तैयार होने के बाद कटाई में देरी करने से वह ढीली होकर बिखर जायेगी तथा कली खिलकर पीला रंग दिखाने लगेंगी| ऐसी अवस्था में कटाई करने पर ब्रोकली की गुणवत्ता कम हो जाती है और इसका सही बाजार भाव नहीं मिलता|

ब्रोकली की उन्नत खेती से पैदावार

इस प्रकार ब्रोकली की खेती यदि उपरोक्त उन्नत सस्य विधियां अपनाकर की जाये तो साधारण किस्मों से 75 से 100 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तथा संकर किस्मों से 120 से 180 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है|

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