बैंगन की उन्नत खेती कैसे करें

बैंगन की उन्नत खेती कैसे करें ! Brinjal Farming in Hindi

बैंगन सोलेनैसी जाति की फसल है, जो कि मूल रूप से भारत की फसल है| आमतौर पर इसकी खेती सब्जी के लिए की जाती है| हमारे देश के अलावा भी यह अन्य कई देशों की प्रमुख सब्जी की फसल है| बैंगन की फसल बाकी फसलों से ज्यादा सख्त होती है| इसके सख्त होने के कारण इसे शुष्क या कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं| यह विटामिन तथा खनिजों का अच्छा स्त्रोत है| भारत वर्ष में इसकी खेती लगभग पुरे साल की जा सकती है, यानि रबी, खरीफ और ग्रीष्मकालीन, चीन के बाद भारत दूसरा सबसे अधिक बैंगन उत्पादन वाला देश है|

हमारे देश में बैंगन उगाने वाले मुख्य राज्य पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, बिहार, महांराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान हैं| बैंगन में विटामिन ए तथा बी के अलावा कैल्शियम, फ़ॉस्फ़रस और लोहे जैसे खनीज भी होते है| यदि इसकी उन्नत वैज्ञानिक कृषि सस्य क्रियाओं के साथ उन्नत या संकर किंस्में उगाई जाये तो इसकी फ़सल से काफ़ी अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है| इस लेख में बैंगन की उन्नत खेती कैसे करें और उसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है| बैंगन की जैविक खेती की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- बैंगन की जैविक खेती कैसे करें, जानिए किस्में देखभाल और पैदावार

उपयुक जलवायु

बैगन कि खेती से अधिकतम उत्पादन लेने के लिए लम्बे तथा गर्म मौसम कि आवश्यकता होती है| इसके बीजों के अच्छे अंकुरण के 25 डिग्री सेल्सिअस तापमान उपयुक्त माना गया है और पौधों कि अच्छी बढ़वार के लिए 13 से 21 डिग्री सेल्सिअस औसत तापमान सर्वोत्तम रहता है| जब तापमान 18 डिग्री सेल्सियस से कम हो तो ऐसे समय में पौधों कि रोपाई नहीं करनी चाहिए, लम्बे फल वाली किस्मों कि अपेक्षा गोल फल वाली किस्मे पाले के लिए सहनशील होती है तथा अधिक पाले के कारण पौधे मर या झाड़ीनुमा जाते है|

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भूमि का चयन

बैंगन का पौधा कठोर होने के कारण विभिन्न प्रकार कि भूमि में उगाया जा सकता है| इसकी फसल से इच्छित उत्पादन के लिए उचित जल निकास और उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है| अगेती फसल के लिए रेतीली दोमट भूमि तथा |अधिक उपज के लिए मटियार दोमट भूमि अच्छी रहती है| मृदा का पी एच मान 5.5 से 6.5 के मध्य होना चाहिए|

खेत की तैयारी

पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करनी चाहिए, उसके बाद 3 से 4 बार हैरो या देशी हल चलाकर पाटा लगाये भूमि के प्रथम जुताई से पूर्व गोबर कि खाद सामान रूप से बिखेरनी चाहिए| यदि गोबर कि खाद उपलब्ध न हो तो खेत में पहले हरी खाद का उपयोग करना चाहिए| रोपाई करने से पूर्व सिचाई सुबिधा के अनुसार क्यारियों तथा सिचाई नालियों में विभाजित कर लेते है|

उन्नत किस्में

किसानों को अपने क्षेत्र की प्रचलित और अधिक उपज देने वाली किस्म का उपयोग करना चाहिए तथा साथ ही किस्मों का चयन बाजार की मांग व लोकप्रियता के आधार पर करना चाहिये| बैंगन की दो प्रकार की किस्में पायी जाती है, लम्बे व गोल आकार वाली, जैसे-

लम्बे फल- पूसा परपल लोंग, पूसा परपल क्लसटर, पूसा क्रान्ति, पन्त सम्राट, आजाद क्रांति, एस- 16, पंजाब सदाबहार, ए आर यू 2-सी और एच- 7 आदि प्रमुख है|

गोल फल- पूसा परपल राउन्ड, एच- 4, पी- 8, पूसा अनमोल, पन्त ऋतु राज, टी- 3, एच- 8, डी बी एस आर- 31, पी बी- 91-2, के- 202-9, डीबी आर- 8 और ए बी- 1 आदि प्रमुख है|

छोटे गोल फल- डी बी एस आर- 44 और पी एल आर- 1 प्रमुख है|

संकर किस्में- अर्का नवनीत और पूसा हाइब्रिड- 6 प्रमुख है|

लम्बे फल- ए आर बी एच- 201 प्रमुख है|

गोल फल- एन डी बी एच- 1, ए बी एच- 1, एम एच बी- 10, एम एच बी- 39, ए बी- 2 और पूसा हाइब्रिड- 2 आदि प्रमुख है|

छोटी पत्ती रोगी रोधी किस्में- एस- 16 और ए बी- 2 प्रमुख है| बैंगन की किस्मों की अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- बैंगन की संकर व उन्नत किस्में, जानिए विशेषताएं और पैदावार

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बीज की मात्रा

एक हैक्टेयर में पौध रोपाई के लिये 400 से 500 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है, और संकर किस्मों का 250 से 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज उपयुक्त होता है|

पौध तैयार करना

जहां पर नर्सरी बनानी हो, वहां पर अच्छी प्रकार खुदाई करके खरपतवारों को निकालें तथा अच्छी सड़ी हुई गोबर या कम्पोस्ट की खाद आवश्यकतानुसार डालें| नर्सरी में बुवाई से पूर्व बीजों को थाइम या केप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें| अगर सूत्रकृमि रोग (निमेटोड) की समस्या हो तो 8 से 10 ग्राम कार्बोफ्यूरॉन 3 जी प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से भूमि में मिलावें|

एक हैक्टेयर की पौध तैयार करने के लिये एक मीटर चौडी और तीन मीटर लम्बी करीब 15 से 20 क्यारियों की आवश्यकता होती है| बीज की 1 से 1.5 सेन्टीमीटर की गहराई पर, 3 से 5 सेन्टीमीटर के अन्तर पर कतारों में बुवाई करें और बुवाई के बाद गोबर की बारीक खाद की एक सेन्टीमीटर मोटी परत से ढक दें तथा फव्वारें से सिंचाई करें|

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खाद और उर्वरक

नर्सरी में बीज बोने के साथ खेत की तैयारी भी शुरू कर देनी चाहिये| इसके लिए खेत की 3 से 4 जुताई करें, प्रथम जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करनी चाहिये| इस समय 200 से 250 क्विंटल गोबर या कम्पोस्ट की खाद खेत में अच्छी तरह बिखेर कर जुताई करें| अन्तिम जुताई से पूर्व 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फॉस्फोरस और 60 किलोग्राम पोटाश को प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में समान रूप से मिलाकर जुताई कर पाटा लगा दें, और क्यारियां या नाले बना लें| संकर किस्मों में 60 से 70 किलोग्राम नाइट्रोजन अन्तिम जुताई के समय दें और फॉस्फोरस तथा पोटाश की मात्रा पूर्ववत् रखें|

बुवाई का समय

बैंगन की फसल को वर्ष में तीन बार लिया जा सकता है, ताकि वर्ष भर बैंगन मिलते रहें| जो इस प्रकार है, जैसे-

वर्षाकालीन फसल- नर्सरी तैयार करने का समय फरवरी से मार्च और मुख्य खेत में रोपाई का समय मार्च से अप्रेल उचित है|

शरदकालीन फसल- नर्सरी तैयार करने का समय जून से जुलाई और मुख्य खेत में रोपाई का समय जुलाई से अगस्त उचित है|

बसंतकालीन समय- नर्सरी तैयार करने का समय दिसम्बर और मुख्य खेत में रोपाई का समय दिसम्बर से जनवरी उचित है|

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पौध की रोपाई और दूरी

जब पौधे नर्सरी में 10 से 15 सेंटीमीटर ऊंचाई के या 30 से 40 दिन के हो जाएँ तब उन्हें सावधानी से निकाल कर तैयार खेत में शाम के समय रोपाई करें| कतार से कतार की दूरी 60 से 70 सेंटीमीटर और कतार में पौधे से पौधे की दूरी 60 सेंटीमीटर रखें|

टोप ड्रेसिंग- पौध रोपण के 20 दिन बाद और फूल लगने के समय 20-20 किलोग्राम नाइट्रोजन को बुरकाकर कर फसल में दो बार देना चाहिए| संकर किस्मों में यह मात्रा 30-30 किलोग्राम रखे|

सिंचाई- गर्मी की ऋतु में 4 से 5 दिन की अन्तराल पर और सर्दी की ऋतु में 10 से 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए| वर्षा ऋतु में सिंचाई आवश्यकतानुसार करें|

प्रमुख कीट

हरा तेला, मोयला, सफेद मक्खी और जालीदार पंख वाली बग- ये कीडे पत्तियों के नीचे या पौधे के कोमल भाग से रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देते हैं| इससे पैदावर पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं| कभी-कभी ये कीट व रोगों का प्रसार में सहायक होते हैं|

रोकथाम- डाईमिथोएट 30 ई सी या मैलाथियान 50 ई सी या मिथाईल डिमेटोन 25 ई सी कीटनाशकों में से किसी एक की एक मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिडके| आवश्यकतानुसार इस छिडकाव को 15 से 20 दिन बाद दोहराये| एपीलेक्ना बीटल- इस कीट का प्रकोप आमतौर पर सीमित होता हैं| उपरोक्त कीटनाशक यदि प्रयोग में लिये गये हो तो इसक नियंत्रण स्वतः ही हो जाता है|

रोकथाम- मैलाथियान 5 प्रतिशत या कार्बोरिल 5 प्रतिशत चूर्ण का 20 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भूरकाव करें|

फल और तना छेदक- इस कीट के आक्रमण से बढती हुई शाखाएं मुरझा कर नष्ट हो जाती हैं और फलों में छेद हो जाते हैं, इसके फलस्वरूप फलों की विपणन गुणवत्ता कम हो जाती हैं|

रोकथाम- प्रभावित शाखाओं और फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए| फल बनने पर कार्बोरिल 50 डब्ल्यू पी 4 ग्राम या फार्मेथियान 50 ई सी 1 मिलीलीटर या एसीफेट 75 एस पी 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिडके| आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन बाद छिड़काव दोहरावें| दवा छिडकने के 7 से 10 दिन बाद फल तोड़ने चाहिए|

मूल ग्रन्थी सूत्र कृमि (निमेटोड)- इसकी वजह से बैंगन की जड़ों पर गांठे बन जाती हैं और पौधों की बढ़वार रूक जाती है तथा पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं|

रोकथाम- नर्सरी में पौध तैयार करते समय 10 से 12 ग्राम की कार्बयूरॉन 3 जी प्रति वर्गमीटर की दर से तथा खेत की पौध रोपाई के समय 25 किलोग्राम कार्बयूरॉन 3 जी प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि उपचार करें या पौध की रोपाई के स्थान पर डालकर पौधों की रोपाई करें|

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रोग रोकथाम 

छोटी पत्ती रोग- यह बैंगन का एक माइकोप्लाज्मा जनित विनाशकारी रोग हैं| इस रोग के प्रकोप से पत्तियां छोटी रह जाती हैं और गुच्छे के रूप में तने के ऊपर उगी हुई दिखाई देती हैं| पूरा रोगग्रस्त पौधा झाड़ीनुमा लगता हैं| ऐसे पौधों पर फल नहीं बनते है|

रोकथाम- रोग ग्रस्त पौधे को उखाडकर नष्ट कर देना चाहिये| यह रोग हरे तेले (जेसिड) द्वारा फैलता हैं| इसलिए इसकी रोकथाम के लिए एक मिलीलीटर डाईमेथोएट 30 ई सी प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें तथा 15 दिन बाद दोहरावें|

झुलसा रोग- इस रोग के प्रकोप से पत्तियों पर विभिन्न आकार के भूरे से गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं| धब्बों में छल्लेनुमा धारियां दिखने लगती हैं|

रोकथाम- मैन्कोजेब या जाईनेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करें| यह छिड़काव आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अन्तराल से दोहरावें|

आद्रगलन (डेम्पिंग ऑफ)- यह रोग पौधे की छोटी अवस्था में होता हैं| इसके प्रकोप से जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पड़कर कमजोर हो जाता है और पौधे गिरकर मरने लगते हैं| यह रोग भूमि एवं बीज के माध्यम से फैलता हैं|

रोकथाम- बीजों को 3 ग्राम केप्टॉन प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें| नर्सरी में बुवाई से पूर्व थाईरम या केप्टॉन 4 से 5 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से भूमि में मिलावें| नर्सरी, आसपास की भूमि से 7 से 10 इंच उठी हुई भूमि में बनावें| बैंगन फसल के कीट और रोग रोकथाम की अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- बैंगन की फसल में समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आई पी एम) कैसे करें

पैदावार

जब फसल बाजार भेजने लायक हो जावें, तब फलों की तुडाई करें| उपरोक्त विधि से खेती करने पर बैंगन की खेती से लगभग 250 से 350 क्विंटल पैदावार प्रति हैक्टेयर होती हैं| किन्तु संकर किस्मों के बीज से खेती करने पर 350 से 500 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक पैदावार प्राप्त की जा सकती हैं|

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4 thoughts on “बैंगन की उन्नत खेती कैसे करें ! Brinjal Farming in Hindi”

  1. सर् नमस्ते
    मै राजकुमार मरावी छत्तीसगढ़ से हूँ।
    मै बैगन की खेती करता हू ।
    बै की खेती मे समस्या है:
    1. तना एवं फल छेदक।
    2. पौधो का मुरझा जाना (प्रारम्भिक आवस्था)
    3.कीडे जाल बिछाकर पत्ते को मोड लेता है।

  2. Mai Manoj Kumar ,mai bagan ki kheti karta hu sir,
    Bagan ke tna me kit pad gya h aur tna kabhi daily murkh ja rha aur
    Fal me bhi kit pad ja rha h.
    Kitnasak dva bhi kaphi use kiya koi prabhav nhi hua
    Please kuchh upay btaye.

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